अनिल त्रिवेदी (एडवोकेट)

लेखक वरिष्ठ अभिभाषक हैं

स्वदेशी का अर्थ देशज होना है

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020
हमारी लोक समझ हमें सिखाती है कि जो देशज है, स्थानीय है, वे देशी हैं। इस तरह लोक मान्यता अनुसार स्वदेशी का अर्थ विदेशी...

अष्ट चंग पे

शनिवार, 17 अक्टूबर 2020
बाल जीवन के आनंद और कल्पनाशीलता का कोई ओर-छोर नहीं है। भारत और एशिया के बच्चों के खेलकूद की सादगी और कल्पनाशीलता का कोई...
पोरबंदर में 2 अक्टूबर 1869 को यानी आज से डेढ़ सौ साल पहले जो बालक जन्मा था। वह डेढ़ सौ साल बाद भी आज समूची मनुष्यता के लिए...

हर दिन नई ज़मीन, हर दिन नया आसमान

शुक्रवार, 11 सितम्बर 2020
11 सितम्बर 1895 को जन्मे संत विनोबा भावे का आज (11 सितंबर 2020) 125वां जयंती वर्ष पूरा हो रहा हैं। गांधी 150 में विनोबा 125। महात्मा...
जो जितना महंगा है वह उतना अच्छा ही हो, यह हमेशा जरूरी नहीं है। किस वस्तु की क्या कीमत हो, यह तय करने का कोई पैमाना और मापदंड...
मुक्त समाज भी अभिव्यक्ति को शत-प्रतिशत सह नहीं पाता। शब्द विचार और भाषा मर्यादा से मुक्त नहीं हो सकते और यह अलिखित सभ्यता...
अच्छा होना अपने आप अच्छा है या बुरा होने से अच्छे होने का अस्तित्व है। जैसे कभी रात हो ही नहीं तो शायद दिन की पूछताछ में...

निर्भयता स्वाधीनता का मूल है

शुक्रवार, 14 अगस्त 2020
आज़ादी, स्वाधीनता, फ्रीडम, स्वतंत्रता और मुक्ति का सच्चा अर्थ, आज हमारे कहे- लिखे हुए केवल बोल चाल के शब्द ही है या वास्तविक...
संत विनोबा भावे कहते थे- वर्तमान शिक्षा यानी पढ़ना-लिखना और कुर्सी पर बैठकर हुक्म चलाना। पढ़ना सीखने का मतलब काम छोड़ना।...

छ:सौ अरब बनाम 5 रुपए रोज

शुक्रवार, 7 अगस्त 2020
60 से 70 के दशक में देश की लोकसभा में पहुंचे भारत की आजादी तथा समाजवादी आंदोलन के नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने लोकसभा में...
जीवन क्या है? क्या नहीं है? यह तय करना सरल भी है और चुनौतीपूर्ण! एक समझ यह भी है कि जीवन केवल जीवन है, उससे कम या ज्यादा कुछ...
सब लोग एक समान आर्थिक परिस्थिति के नहीं होते हैं। आज की हमारी दुनिया में अति संपन्न से लेकर अति विपन्न आर्थिक परिस्थिति...
आजकल बच्चे मजे में हैं। बड़े बहुत परेशान हैं। महामारी से नहीं, माथापच्ची और बेबात की मारामारी से। बड़ों को इस समय बच्चों...
आज की दुनिया के लोग पैसों के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर पाते हैं। इसी से मनुष्यों के सारे व्यवहार, आचार, विचार सब कुछ...
सनातन समय से हम यानी मनुष्यों को आध्यात्मिक वृत्ति के दार्शनिक चिंतक-विचारक समझाते रहे हैं कि हमें वर्तमान में जीना...
मनुष्य का आकार एक निश्चित क्रम में होता है। जीव के जीवन में गति होती है। जीव के जीवन में स्पंदन होता है। प्रकृति सनातन...

राजा का बाजा बजा

बुधवार, 8 जुलाई 2020
राजा का बाजा बजाना यह सदियों से कई मनुष्यों का मनपसंद काम है। जब तक राजा की सत्ता कायम है, प्रजा के अधिकांश प्राणप्रण...
मनुष्य अपने विचारों को अपना मौलिक गुण मानता है। मानवीय सभ्यता का विस्तार मनुष्य के अंतहीन विचार प्रवाहों से हुआ, ऐसा...

शिकायतविहीन समाज

मंगलवार, 16 जून 2020
क्या कभी यह संभव है कि दुनिया के लोग इतने स्वस्थ और प्रसन्न हो जाएं कि उनके दिमाग में कभी कोई शिकायत ही न आए। पर इसका आशय...

घुमक्कड़ी का आनंद

शुक्रवार, 19 जून 2020
कुदरत ने हम सबको घुमक्कड़ी करने के लिए ही दो पैर दिए हैं, पर ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के विस्तार ने पैर- पैदल घुमक्कड़ी...