भारत की अर्थव्यवस्था में 'सुधार' के नायक मनमोहन सिंह या नरसिंह राव?

BBC Hindi

रविवार, 25 जुलाई 2021 (09:23 IST)
रेहान फ़ज़ल, बीबीसी संवाददाता
बात वर्ष 2015 की है। मनमोहन सिंह के प्रेस सलाहकार रहे संजय बारू हैदराबाद मैनेजमेंट असोसिएशन की बैठक को संबोधित कर रहे थे। अचानक उन्होंने वहाँ मौजूद लोगों से सवाल पूछा, 'वर्ष 1991 का आप लोगों के लिए क्या मतलब है?' लोगों ने तुरंत जवाब दिया इसी साल सरकार ने नई आर्थिक नीति लागू करके भारतीय अर्थव्यवस्था को खोल दिया था। बारू ने दूसरा सवाल किया, इसका ज़िम्मेदार कौन था? लोगों ने फिर बिना झिझक जवाब दिया "मनमोहन सिंह।"
 
बारू बोले, 'ये सही है कि 24 जुलाई, 1991 को अपना बजट भाषण देने के बाद मनमोहन सिंह नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण का चेहरा बन गए थे। लेकिन उस दिन एक और ऐतिहासिक चीज़ हुई थी। इसका अता-पता है आपको?'
 
कुछ ने जवाब दिया 'डीलाइसेंसिंग', यह सही था कि नई औद्यौगिक नीति मनमोहन सिंह के बजट भाषण का हिस्सा नहीं थीं। उनके भाषण से चार घंटे पूर्व उद्योग राज्य मंत्री पीजी कुरियन ने कुख्यात लाइसेंस परमिट राज को ख़त्म करने का वक्तव्य संसद के पटल पर रखा था।
 
बारू का अगला सवाल था, 'क्या आप भारत की औद्योगिक नीति में आमूल-चूल परिवर्तन करने वाले उद्योग मंत्री का नाम बता सकते हैं?'
 
थोड़ी देर चुप्पी छाई रही। फिर पीछे की तरफ़ से किसी ने कहा, 'मनमोहन सिंह।' बारू ने कहा, 'ग़लत।' कुछ ने कहा चिदंबरम। कुछ बोले कमलनाथ, लेकिन हैदराबाद के उस समारोह में मौजूद कोई व्यक्ति ये याद नहीं कर सका कि उस नीति के जनक और कोई नहीं उनके अपने शहर हैदराबाद में अपनी ज़िंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा बिताने वाले पीवी नरसिम्हा राव थे, जो उस समय प्रधानमंत्री पद के साथ-साथ उद्योग मंत्रालय का काम भी देख रहे थे।
 
24 जुलाई, 1991 को चूँकि बजट पेश होना था, किसी सांसद का ध्यान असली सुधार की ओर नहीं गया जिसने नेहरू और इंदिरा गाँधी की औद्योगिक नीति को सिरे से पलट दिया था।
 
दशकों का ढंग बदल गया
मनमोहन सिंह की पत्नी गुरशरन कौर ने मशहूर अर्थशास्त्री ईशर अहलुवालिया को बताया था, "अक्सर मनमोहन सिंह जब दफ़्तर जाने के लिए तैयार हो रहे होते थे तो दसवें सिख गुरु का अपना पसंदीदा शबद गुनगुनाया करते थे...
 
देह शिवा बर मोहे, सुभ करमन ते कबहूँ न टरों
न डरों अरि सों जब जाए लरों, निसचै करि अपनी जीत करौं।"
 
मोंटेक सिंह अहलूवालिया अपनी आत्मकथा 'बैकस्टेज द स्टोरी बिहाइंड इंडियाज़ ग्रोथ इयर्स' में लिखते हैं, 'मनमोहन सिंह के लिए धर्म निहायत ही निजी विषय भले ही हो, लेकिन उनके शरीफ़ व्यक्तित्व के पीछे एक सिख शख़्स मौजूद है जो अपनी सारी ताक़त गुरबानी से लेता है।'
 
24 जुलाई, 1991 के दिन जब नेहरू जैकेट और आसमानी पगड़ी बाँधे मनमोहन सिंह अपना बजट भाषण देने खड़े हुए तो पूरे देश की निगाहें उनके उन पर थीं। दर्शक दीर्घा में मोंटेक सिंह सिंह अहलुवालिया, ईशेर अहलूवालिया, बिमल जालान और देश के चोटी के आर्थिक पत्रकार बैठे हुए थे।
 
भाषण की शुरुआत में ही उन्होंने स्वीकार किया कि वो इस समय बहुत अकेलापन महसूस कर रहे हैं क्योंकि उनके सामने राजीव गाँधी का सुंदर, मुस्कराता हुआ चेहरा नहीं है। उनके भाषण में उस परिवार का बार-बार ज़िक्र किया गया, जिसकी नीतियों को वो सिरे से ख़ारिज कर रहे थे।
 
बजट का पहला मसौदा नरसिंह राव ने किया नामंज़ूर
इससे पहले सत्तर के दशक में कम-से-कम सात बजटों को तैयार करने में मनमोहन सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। 1991 का बजट पहला बजट था जिसे न सिर्फ़ उन्होंने अंतिम रूप दिया था बल्कि इसका बहुत बड़ा हिस्सा अपने हाथों से ख़ुद लिखा था और अब वो उसे स्वयं पेश करने जा रहे थे।
 
जाने-माने लेखक विनय सीतापति ने नरसिम्हा राव की जीवनी 'हाफ़ लायन' में लिखा है, "मनमोहन सिंह जुलाई के मध्य में अपने टॉप सीक्रेट बजट का मसौदा लेकर नरसिंह राव के पास गए थे। उस समय एक बहुत वरिष्ठ अधिकारी और एक भारतीय राजनयिक भी नरसिंह राव के पास बैठे हुए थे। उन्हें याद है कि जब मनमोहन सिंह ने नरसिंह राव के सामने एक पेज में बजट का सारांश रखा तो उन्होंने उसे बहुत ध्यान से पढ़ा था। इस बीच मनमोहन सिंह लगातार खड़े ही रहे। फिर नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह की तरफ़ देख कर कहा था, "अगर मैं यही बजट चाहता तो मैंने आपको ही क्यों चुना होता?"
 
इस बात को सबूत के साथ नहीं कहा जा सकता कि मनमोहन सिंह के बजट का पहला मसौदा शायद इतना सुधारवादी नहीं था जितना वो बाद में दिखाई दिया था। लेकिन ये बात तो जगज़ाहिर है कि मनमोहन सिंह के बजट को बनाने में सहायता देने वाले वित्त मंत्रालय के दो चोटी के अधिकारी एसपी शुक्ला और दीपक नैयर मनमोहन सिंह की विचारधारा से सहमत नहीं थे। लेकिन इस विवरण से साफ़ है कि नरसिंह राव ने मनमोहन सिंह को और दिलेर होने का संदेश दे दिया था।
 
बजटीय घाटे को पूरा ढाई फ़ीसदी कम किया
मनमोहन सिंह के 18 हज़ार शब्दों के बजट भाषण की सबसे ख़ास बात थी कि वो बजटीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद के 8.4 फ़ीसदी से घटा कर 5.9 फ़ीसदी पर ले आए। बजटीय घाटे को करीब ढाई फ़ीसदी कम करने का मतलब था सरकारी ख़र्चों में बेइंतहा कमी करना।
 
उन्होंने अपने बजट में न सिर्फ़ जीवंत पूँजी बाज़ार की नींव रखी, बल्कि खाद पर दी जाने वाली सब्सिडी को 40 फ़ीसदी घटा दिया। चीनी और एलपीजी सिलेंडर के दामों में भी वृद्धि की गई। उन्होंने दोबारा थोड़ी देर पहले घोषित औद्योगिक नीति की चर्चा की। यहाँ भी वो वृहद और विविध औद्योगिक संरचना के लिए नेहरू, इंदिरा और राजीव गाँधी का धन्यवाद करना नहीं भूले।
 
मनमोहन सिंह ने अपने भाषण का अंत विक्टर ह्यूगो के मशहूर उद्धरण से किया था, 'दुनिया की कोई ताकत उस विचार को नहीं रोक सकती जिसका समय आ पहुंचा है। दुनिया में भारत का एक बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उदय एक ऐसा ही विचार है। पूरी दुनिया ये साफ़ तौर पर सुन ले कि भारत जाग चुका है। वी शैल प्रिवेल। वी शैल ओवरकम।'
 
विनय सीतापति लिखते हैं, 'महज़ एक दिन के अंदर राव और मनमोहन ने मिलकर नेहरू युग के तीन स्तंभों, लाइसेंस राज, सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार और विश्व बाज़ार से भारत के अलगाव को समाप्त कर दिया। जैसे ही मनमोहन सिंह ने अपना भाषण समाप्त किया दर्शक दीर्घा में बैठे बिमल जालान ने जयराम रमेश की आँखों में आँखें मिलाकर थम्स अप का इशारा किया।'
 
आबिद हुसैन ने अमेरिका से फ़ोन कर की तारीफ़
मनमोहन सिंह के साथ योजना आयोग में काम कर चुके आबिद हुसैन उस समय अमेरिका में भारत के राजदूत थे।
 
मोंटेक सिंह अहलुवालिया लिखते हैं कि 'उन्होंने हमें वॉशिंगटन से फ़ोन करके कहा कि मनमोहन ने बेहतरीन बजट पेश किया है। फिर उन्होंने मेरी पत्नी ईशर से कहा कि वो वित्त मंत्री को उनकी तरफ़ से गले लगा लें और उन्हें 'जागृति' फ़िल्म का वो गाना याद दिलाएं। फिर आबिद ने फ़ोन पर ही वो गाना हमें गा कर सुनाया 'दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल/साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।'
 
हालांकि ये गाना महात्मा गांधी के लिए लिखा गया था लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में मनमोहन सिंह पर भी पूरी तरह लागू होता था। आबिद ने एक और महत्वपूर्ण बिंदु पकड़ा। मनमोहन सिंह की सादगी और किफ़ायत से ज़िंदगी जीने के तरीके ने उन्हें उदारवाद की वकालत करने के लिए सशक्त बनाया। उन पर ये आरोप नहीं चिपक पाया कि उन्होंने उपभोक्तावाद और आलीशान ज़िदगी के प्रति मोह के कारण उदारवाद का समर्थन किया है।
 
सोने पर सुहागा तब हुआ जब जेनेवा में साउथ कमिशन की नौकरी में कमाए गए डॉलरों की क़ीमत रुपये के अवमूल्यन के कारण बढ़ गई तो उन्होंने सारे अतिरिक्त पैसे को जोड़कर प्रधानमंत्री सहायता कोष में जमा करवा दिया।
 
कांग्रेस पार्टी के भीतर भारी विरोध
आम लोगों ने तो बजट का स्वागत किया था लेकिन मनमोहन सिंह के राजनीतिक साथी और वामपंथी इस बजट से ख़ुश नहीं थे। 'औद्योगिक नियंत्रण की चिता जलाए जाने' और पिछले एक दशक में यूरिया के दामों में 40 फ़ीसदी की बढ़ोतरी उनके गले नहीं उतर रही थी।
 
जयराम रमेश अपनी किताब 'टू द ब्रिंक एंड बैक इंडियाज़ 1991 स्टोरी' में लिखते हैं, 'जब मैंने नरसिंह राव को कांग्रेस सांसदों के मूड के बारे में बताया तो उनकी एक ही टिप्पणी थी, तुम लोगों को एक राजनीतिक सिस्टम के अंतर्गत काम करना आना चाहिए। उन्होंने यहाँ तक कहा कि मनमोहन को बजट बनाने में और सावधानी बरतनी चाहिए थी। वो ये भूल गए कि प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने ही मनमोहन सिंह को दिलेर फ़ैसले लेने की सलाह दी थी और मनमोहन सिंह के बजट भाषण पर स्वीकृति की मुहर नरसिंह राव ने ही लगाई थी।'
 
सांसदों को अपनी बात कहने की आज़ादी
कांग्रेस के अख़बार 'नेशनल हेरल्ड' ने राव सरकार की चुटकी लेते हुए कहा था, 'इस बजट ने मध्यम वर्ग को करारे कॉर्न फ़्लेक्स और झाग वाले ड्रिंक्स ज़रूर उपलब्ध कराए हैं लेकिन हमारे देश के संस्थापकों की ये प्राथमिकता कभी नहीं रही।'
 
बजट को लेकर कांग्रेस सांसदों में इतना रोष था कि एक अगस्त, 1991 को कांग्रेस संसदीय दल की बैठक बुलाई गई जिसमें वित्त मंत्री ने अपने बजट का बचाव किया।
 
राव इस बैठक से दूर रहे और उन्होंने मनमोहन सिंह को अपने बल पर सांसदों के गुस्से को झेलने दिया। 2 और 3 अगस्त को कांग्रेस सांसदों की और बैठकें हुईं लेकिन इन बैठकों में प्रधानमंत्री राव खुद मौजूद थे।
 
जयराम रमेश ने लिखा, "यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि नेहरू के समय को छोड़ दिया जाए तो कांग्रेस संसदीय दल इतना सक्रिय कभी नहीं रहा, जितना 1991 में। प्रधानमंत्री शायद अपने तरीके से चाह रहे थे कि सांसदों को अपनी बात कहने की आज़ादी तो दे दी जाए, लेकिन अंतिम फ़ैसला उनका अपना हो। अब मुझे लगता है कि ये हालात से निपटने का होशियारी भरा तरीका था, हालांकि उस समय न ही मुझे और न ही वित्त मंत्री को ये तरीका पसंद आ रहा था। लेकिन जब मनमोहन सिंह खुद प्रधानमंत्री बने और मैं पहले सांसद और फिर केंद्रीय मंत्री बना तब हमें समझ में आया कि ऐसी स्थिति से निपटने का इससे बेहतर तरीका नहीं था।"
 
मंत्रिमडल के सदस्य तक खिलाफ़ थे नई आर्थिक नीतियों के
कांग्रेस संसदीय दल की उन दिनों हो रही बैठकों में मनमोहन सिंह बिल्कुल अलग-थलग पड़े हुए थे। आलम ये था कि सिर्फ़ दो सांसद तमिलनाडु से चुन कर आए मणिशंकर अय्यर और राजस्थान के वरिष्ठ कांग्रेस नेता नाथूराम मिर्धा ही खुलकर मनमोहन सिंह के समर्थन में आए। विरोध करने वालों में कृषि मंत्री बलराम जाखड़, संचार मंत्री राजेश पायलट और रसायन और खाद राज्य मंत्री चिंतामोहन थे जो अपनी ही सरकार के प्रस्तावों की खुलेआम आलोचना कर रहे थे।
 
50 कांग्रेस सांसदों ने कृषि संसदीय मंच के झंडे तले वित्त मंत्री को पत्र लिखा जिसमें बजट प्रस्तावों की खुलेआम आलोचना की गई। दिलचस्प बात ये थी कि इस मंच के अध्यक्ष महाराष्ट्र के वरिष्ठ सांसद प्रतापराव भोंसले थे जिन्हें राव का करीबी माना जाता था। तुर्रा ये था कि इस पत्र पर दक्षिण मुंबई के सांसद मुरली देवड़ा ने भी दस्तख़त किए थे जो उद्योगपतियों के करीबी माने जाते थे। लेकिन राव इस राजनीतिक दबाव के आगे नहीं झुके।
 
एक पखवाड़े बाद सुदीप चक्रवर्ती और आर जगन्नाथन ने इंडिया टुडे के अंक में लिखा, "राव ने वो किया जो प्रधानमंत्री के रूप में राजीव गाँधी करना भूल गए। उन्होंने भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात ज़रूर की लेकिन वो वर्तमान सदी के बाहर नहीं निकल पाए राव और मनमोहन ने जहाँ एक तरफ़ नेहरू के समाजवाद के क़सीदे पढ़े लेकिन दूसरी तरफ़ देश का गिरेबान पकड़ कर कहा आगे बढ़ो वर्ना हम सब मर जाएंगे।"
 
सवाल उठता है कि 1991 में हुए बदलाव का श्रेय राव को दिया जाना चाहिए या उनके वित्त मंत्री मनमोहन सिंह को?
 
संजय बारू लिखते हैं, "राव की मौत से कुछ साल पहले एक पत्रकार ने उनसे यही सवाल पूछा था। राव ने मनमोहन सिंह की तारीफ़ तो की और आर्थिक सुधारों में उनके योगदान को माना भी। लेकिन साथ ही ये भी कहा कि भारत में वित्त मंत्री शून्य अंक की तरह है। उसकी ताकत इस बात पर निर्भर करती है कि उसके आगे कितने शून्य लगाए जाएँ। कहने का मतलब ये कि वित्त मंत्री की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे प्रधानमंत्री का कितना समर्थन प्राप्त है।"
 

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