अक्टूबर : फिल्म समीक्षा

शूजीत सरकार की फिल्म 'अक्टोबर' की कहानी धागे से भी पतली है। यह एक किरदार की फिल्म है जिसमें होने वाले बदलावों, भावनाओं और उसके सोचने-समझने के तरीके को दर्शाया गया है जिसे दर्शक, किरदार के मन के भीतर चल रही हलचल को महसूस कर सकते हैं। 
 
दिल्ली की एक पांच सितारा होटल में डैन (वरुण धवन) होटल मैनेजमेंट ट्रैनी है। यह काम उसे खास पसंद नहीं है और वह बात-बात में चिढ़ता है। तौलियों से वह जूते पोंछ कर गुस्सा निकालता है। होटल में आए ग्राहकों पर भी वह आपा खो बैठता है और अक्सर अपने सीनियर्स से डांट खाता है। 
 
शिउली (बनिता संधू) भी उसके साथ ट्रैनी है। दोनों के बीच कोई खास रिश्ता नहीं है। एक‍ दिन पार्टी करते हुए शिउली तीसरी मंजिल से नीचे गिर जाती है और कोमा में पहुंच जाती है। अस्पताल में डैन उससे अनिच्छा से मिलने जाता है। उसकी हालत देख वह परेशान हो जाता है और रोजाना उससे मिलने जाने लगता है। 
 
शिउली के भाई, बहन और मां से वह कभी नहीं मिला था, लेकिन धीरे-धीरे वह उनके करीब आकर फैमिली मेम्बर की तरह बन जाता है। 
 
'अक्टूबर' में डैन के हमें दो रूप देखने को मिलते हैं। वह दुनियादारी और नियम-कायदों से चलने पर चिढ़ता है। वह ऐसी राह पर था जिस पर चलना उसे पसंद नहीं है, लिहाजा वह बात-बात पर उखड़ने लगता है। उसे किसी तरह का दबाव पसंद नहीं है और दबाव पड़ने पर वह फट जाता है। 
 
होटल में उसके काम करने की शैली से उसके व्यवहार की झलक हमें मिलती है। उसके इसी व्यवहार के कारण उसे कोई बहुत ज्यादा पसंद नहीं करता और दोस्त भी उसे प्रेक्टिकल होने के लिए कहते हैं। 
 
दोस्तों से डैन को पता चलता है कि ऊपर से नीचे गिरने के पहले शिउली ने पूछा था कि डैन कहां है? यह बात उसके दिल को छू जाती है। उसे महसूस होता है कि किसी ने उसके बारे में भी पूछा है तो वह नि:स्वार्थ भाव से शिउली की अस्पताल में सेवा करता है। यह जानते हुए भी कि शिउली कोमा में हैं वह उससे बात करता है और उसके प्रयासों से ही शिउली में इम्प्रूवमेंट देखने को मिलता है। 
 
डैन का होटल से अलग रूप हॉस्पिटल में देखने को मिलता है। यहां उसकी अच्छाइयां नजर आती हैं। वह शिउली के ठीक होने की आशा उसके परिवार वालों में जगाए रखता है। होटल में नियम तोड़ने वाले डैन को जब हॉस्पिटल में बिस्किट खाने से रोका जाता है तो वह मुंह से बिस्किट निकाल लेता है। होटल के व्यावसायिक वातावरण में शायद उसका दम घुटता था, जहां दिल से ज्यादा दिमाग की सुनी जाती है। हॉस्पिटल में दिल की ज्यादा चलती थी इसलिए वह नर्स और गार्ड से भी बतिया लेता था। 
 
जूही चतुर्वेदी ने फिल्म की स्टोरी, स्क्रीनप्ले और डायलॉग लिखे हैं। जूही ने 'अक्टूबर' के माध्यम से कहने की कोशिश की है कि व्यक्ति का व्यवहार पूरी तरह से परिस्थितियों पर निर्भर करता है और इसलिए उसका आंकलन करते समय सभी बातों पर गौर करना चाहिए। 
 
फिल्म में घटनाक्रम और संवाद बेहद कम हैं। साथ ही कहानी भी बेहद संक्षिप्त है, इसलिए निर्देशक शूजीत सरकार के कंधों पर बहुत ज्यादा भार था। शूजीत की तमाम कोशिशों के बावजूद भी यह फिल्म दो घंटे से कम होने के बावजूद लंबी लगती है और फिल्म की स्लो स्पीड से कई लोगों को शिकायत हो सकती है। लेकिन शूजीत, डैन के मन में उमड़ रहे भावनाओं के ज्वार से दर्शकों का कनेक्शन बैठाने में कामयाब रहे हैं। निश्चित रूप से यह बात बेहद कठिन थी। 
 
जुड़वां 2 और मैं तेरा हीरो जैसी फॉर्मूला फिल्मों के बीच वरुण धवन 'बदलापुर' और 'अक्टूबर' जैसी फिल्में भी करते रहते हैं जो यह दर्शाता है कि लीक से हट कर फिल्म करने की चाह उनमें मौजूद है। यह पूरी फिल्म उनके ही कंधों पर थी और उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया है। हर सिचुएशन में उनके किरदार की प्रतिक्रिया और सोच एकदम अलग होती है और इस बात को उन्होंने अपने अभिनय से निखारा है। बनिता संधू ने बमुश्किल एक-दो संवाद बोले होंगे। ज्यादातर समय उन्हें मरीज बन कर बिस्तर पर लेटना ही था, लेकिन उन्होंने काफी अच्छे एक्सप्रेशन्स दिए। 
 
शिउली की मां के रूप में गीतांजलि राव और डैन के सीनियर के रूप में प्रतीक कपूर का अभिनय भी जोरदार है। अविक मुखोपाध्याय की सिनेमाटोग्राफी शानदार है। ठंड और कोहरे में लिपटी दिल्ली, आईसीयू और फाइव स्टार के माहौल को उन्होंने कैमरे से बखूबी पकड़ा है। 
 
शूजीत सरकार की फिल्मों से जो अपेक्षा रहती हैं उस पर भले ही फिल्म पूरी नहीं उतर पाती हो, लेकिन देखी जा सकती है। टेस्ट क्रिकेट को देखने वाले धैर्य की जरूरत इस फिल्म को देखते समय भी पड़ती है। 
 
बैनर : राइजि़ंग सन फिल्म्स प्रोडक्शन
निर्माता : रॉनी लाहिरी, शील कुमार
निर्देशक : सुजीत सरकार
संगीत : शांतुनु मोइत्रा, अनुपम रॉय, अभिषेक अरोरा
कलाकार : वरुण धवन, बनिता संधू, गीतांजलि राव, प्रतीक कपूर
सेंसर सर्टिफिकेट : यू * 1 घंटा 55 मिनट 30 सेकंड 
रेटिंग : 3/5 

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