कांग्रेस को आस, पर दिल्ली अभी दूर

मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले 3 विधानसभा चुनावों में भाजपा से पटखनी खाने वाली कांग्रेस इस साल दिसंबर में होने वाले चुनावों को लेकर उत्साहित है। मप्र में 2017 में 2 सीटों अटेर और चित्रकूट के उपचुनाव जीतने के बाद इस साल हाल में हुए कुछ निकाय चुनावों में मिली सफलता ने उसमें आशा की किरण फूंकी है। कांग्रेस की इन सफलताओं के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ जैसे दिग्गजों की सक्रियता के साथ प्रभारी महासचिव दीपक बावरिया के रणनीतिक कौशल को श्रेय दिया जा सकता है।
 
मध्यप्रदेश पर 14 वर्षों से राज करने वाली भाजपा खासतौर से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के लिए कांग्रेस की सफलता को खतरे का संकेत माना जाने लगा है। ऐसे में फरवरी माह में होने वाले 2 अन्य उपचुनाव ज्यादा महत्वपूर्ण बन गए हैं। खुदा न खास्ता, शिवपुरी के कोलारस और अशोकनगर जिले के मुंगावली में होने वाले ये चुनाव अगर भाजपा हारती है तो पार्टी आलाकमान राज्य में नेतृत्व परिवर्तन पर विचार करने को मजबूर हो सकता है जिसकी सुगबुगाहट पिछले दिनों से सुनाई पड़ने लगी है। तलवार केवल शिवराज पर ही नहीं, बल्कि पार्टी अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान पर भी लटक रही है। अध्यक्ष पद के लिए कैलाश विजयवर्गीय और नरेन्द्र सिंह तोमर के नाम उछाले जा चुके हैं।
 
कोलारस और मुंगावली सीटें वैसे भी कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के प्रभाव क्षेत्र में आती हैं। ये दोनों ही नेता इन दिनों काफी सक्रीय भी हैं। ज्योतिरादित्य लगातार दौरे कर शिवराज की नीतियों के जमीनी असर को लेकर सवाल उठा रहे हैं और कमलनाथ उनकी बखिया उधेड़ रहे हैं। दूसरी ओर दिग्विजय सिंह की नर्मदा परिक्रमा भी सुर्खियां हासिल कर रही हैं। दिग्विजय की यात्रा का आकर्षण उनकी दूसरी पत्नी अमृता सिंह भी हैं, जो पत्रकार रह चुकी हैं और जानती हैं कि सुर्खियां कैसे बनती हैं?
 
यात्रा के 122वें दिन मुख्यमंत्री के सीहोर जिले के पैतृक गांव जैत में शिवराज के भाई नरेन्द्र सिंह ने दिग्विजय सिंह को अपने घर चाय पर बुलाकर सबको चौंका दिया। हालांकि नरेन्द्र सिंह ने स्पष्ट कर दिया नर्मदा परिक्रमावासी तो हमारे अतिथि होते ही हैं, फिर दिग्विजय सिंह तो मेरे बड़े भाई जैसे ही हैं। नरेन्द्र सिंह ने कहा कि मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं हूं, भले ही भाजपा का कार्यकर्ता हूं।
 
देखा जाए तो दिग्विजय सिंह की यात्रा के अब राजनीतिक मायने भी निकाले जाने लगे हैं। जानकारों का मानना है कि यह यात्रा दिग्विजय सिंह के सक्रिय राजनीति में लौटने के लिए प्लेटफॉर्म तैयार कर रही है और आश्चर्य नहीं कि यात्रा के समापन पर वे इसकी घोषणा कर दें। वैसे यह यात्रा इसके पहले शिवराज सिंह द्वारा की गई नर्मदा परिक्रमा के जवाब के तौर पर प्रारंभ की गई थी।
 
हाल के परिणामों और कांग्रेस की तैयारियों से सहमी भाजपा चुनाव का रोड मैप युद्धस्तर पर बनाने में जुट गई है। इसके तहत मुख्यमंत्री ने मंत्रियों और अफसरों के 14 ग्रुप बनाकर नई रणनीति का खाका खींचा। जिसके अनुसार 2 विकास यात्राएं निकाले जाने का निर्णय लिया गया। पहला चरण 1 से 30 नवंबर 2017 के बीच पूरा किया गया, जबकि दूसरा चरण 1 से 30 जून 2018 के बीच चलाया जाएगा।
 
कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी के रूप में ज्योतिरादित्य को पेश किए जाने की संभावना के मद्देनजर भाजपा युवा वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति के साथ आगे बढ़ रही है। इसी के तहत सरकारी कॉलेजों में 3 सालों से मोबाइल फोन बंटवाए जा रहे हैं।
 
इस साल 8 राज्य : गुजरात और हिमाचल प्रदेश की जीत के साथ ही उत्साहित भाजपा ने 2018 में होने वाले 8 राज्यों में जीत की तैयारी प्रारंभ कर दी थी। इनमें से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान भाजपा शासित हैं। नगालैंड में भाजपा सरकार में शामिल है। कर्नाटक, मेघालय और मिजोरम में कांग्रेस की सरकार है। देश के इकलौते कम्युनिस्ट शासित राज्य त्रिपुरा में भी 2018 में चुनाव होने हैं।
 
'कांग्रेस मुक्त भारत' अभियान में जुटे नरेन्द्र मोदी ने गुजरात से निवृत्त होकर पहला दौरा मेघालय और मिजोरम का करके साफ संकेत दे दिए थे कि अब वे इन राज्यों को कांग्रेस से छीनने के जी-तोड़ प्रयास करेंगे। कर्नाटक में पहले भी भाजपा की सरकार रह चुकी है, जो येदियुरप्पा पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद बदली और अब वहां कांग्रेस राज कर रही है। अगर ये 3 राज्य जीतने में भाजपा कामयाब होती है तो ताबूत में अंतिम कील के लिए सिर्फ पंजाब रह जाएगा जिसे कांग्रेस ने 2017 में ही अकाली-भाजपा गठबंधन से छीना है।
 
छग व राजस्थान : जहां तक छत्तीसगढ़ और राजस्थान का सवाल है तो भाजपा शासित इन राज्यों में कांग्रेस का सत्ता में लौटना अभी मुमकिन नहीं लगता, खासतौर से छग में। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी के कांग्रेस से अलग होने के बाद से विपक्ष और भी कमजोर पड़ गया है। रमन सरकार को अब कोई बड़ी चुनौती नहीं दिखाई दे रही। कांग्रेस अगर भितरघात की आस लगाए बैठी है तो वह बेमाने ही साबित होगी।
 
राजस्थान में अवश्य वसुंधरा राजे सरकार को कमजोर आंका जा रहा है। वसुंधरा विरोधी स्वर प्राय: तीव्र होते रहे हैं इसलिए वहां भितरघात की आशंका भी है। इन दिनों राहुल गांधी के करीबी माने जा रहे पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजस्थान में जोर लगा रहे हैं। युवा कांग्रेस नेता सचिन पायलट भी अपने लिए राजस्थान में जगह बना रहे हैं।

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