पंडित नेहरू के लिए देशहित से ऊपर थे निजी आदर्श

भारत को एक लोकतांत्रिक देश बनाने और 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले दिन से ही देश में लोकतंत्र की एक पुख़्ता नींव डालने में नेहरूजी के अतुल्य योगदान की जितनी भी सराहना की जाय, कम है। पर, यह भी सच है कि अपने शासनकाल में उन्होंने कुछ ऐसी बड़ी ग़लतियां भी की हैं, जिनकी सज़ा देश को अभी लंबे समय तक भुगतनी पड़ सकती है। दरअसल, नेहरू ने काफ़ी समय तक चीन के प्रति अपनी निजी भावनाओं और अपने निजी आदर्शों को देशहित से ऊपर रखा।
 
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‘चीन की क़ीमत पर नहीं’
अमेरिका को यह सावधानी भी बरतनी थी कि भारत की तरफ़ झुकने से पाकिस्तान को कहीं यह न लगने लगे कि उसके सिर पर से अमेरिका का हाथ उठने जा रहा है या उसके क़ब्ज़े वाला कश्मीर भी शायद उसके हाथ से निकल जायेगा। यह सब सोचे बिना प्रधानमंत्री नेहरू का अनौपचारिक उत्तर था, 'भारत कई कारणों से सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के सुयोग्य है। किंतु हम इसे चीन की क़ीमत पर नहीं चाहते।

कहा जाता है कि सोवियत और चीनी साम्यवाद की रोकथाम के लिए अमेरिका ने उस समय ‘सीएटो’ (साउथ एशिया ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) और ‘सेन्टो’ (सेन्ट्रल ट्रीटी ऑर्गनाइज़ेशन) नाम के जो सैन्य संगठन बना रखे थे, उनमें में 1954-55 में पाकिस्तान को भी शामिल करने के पीछे अमेरिका का यही नया आकलन था कि नेहरू की सोच कम्युनिस्टों से बहुत भिन्न नहीं है।

नेहरू ने काफ़ी समय तक चीन के प्रति अपनी निजी भावनाओं और अपने निजी आदर्शों को देशहित से ऊपर रखा। उनका कहना था कि चीन एक ‘महान देश’ है, इसलिए उसे उसका उचित स्थान मिलना चाहिए। पता नहीं उन्होंने यह कैसे मान लिया कि महान चीन इतना दब्बू या दीन-हीन भी है कि अपने उचित स्थान के लिए स्वयं लड़ नहीं सकता! यह भला भारत का नैतिक कर्तव्य क्यों होना चाहिए था कि वह स्वयं भूखा रह कर भी चीन को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ता? भारत के स्वतंत्रता संग्राम में चीन ने ऐसा कोई योगदान भी नहीं दिया था कि भारत पर उसके प्रति कृतज्ञता जताने का कोई नैतिक भार रहा हो।

चीन ने तिब्बत को निगल लिया
नेहरू, और अमेरिका में भारत की राजदूत उनकी बहन विजयलक्ष्मी पंडित के बीच यह पत्रव्यवहार जब हुआ था, लगभग उन्हीं दिनों चीन तिब्बत पर आक्रमण की भूमिका रच रहा था। सितंबर 1950 में दलाई लामा का एक प्रतिनिधिमंडल दिल्ली में था। 16 सितंबर के दिन वह दिल्ली में चीनी राजदूत से मिला। चीनी राजदूत ने कहा कि तिब्बत को चीन की प्रभुसत्ता स्वीकार करनी ही पड़ेगी। 7 अक्टूबर 1950 को चीनी सेना ने तिब्बत पर धावा बोल दिया। तिब्बत के साथ हुई ज़ोर-ज़बरदस्ती को देखते और जानते हुए भी नेहरू मान रह रहे थे कि भारत की चुप्पी-भरी भलमनसाहत का बदला चीन भी भलमनसाहत से ही देगा।

होना तो यह चाहिए था कि भारत के प्रति अमेरिकी सद्भावना की आहट पाते ही नेहरू एक अभियान छेड़ देते। वे कहते कि उपनिवेशवाद-पीड़ितों, नवस्वाधीन देशों, अविकसित ग़रीब देशों तथा गुटनिरपेक्ष देशों का सुरक्षा परिषद में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है; भारत उनकी आवाज़ बनेगा। वे कहते कि ब्रिटेन और फ्रांस के रूप में अमेरिका के दो यूरोपीय साथी पहले ही सुरक्षा परिषद में पदासीन हैं। सोवियत संघ कम्युनिस्ट देशों के हितरक्षक की भूमिका निभा रहा है। इसलिए एक और कम्युनिस्ट देश चीन के बदले, उससे कुछ ही कम जनसंख्या वाले, और अब विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन रहे भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता मिलने का कहीं अधिक औचित्य बनता है। इसके बदले भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की रट बनी रही कि ‘पहले चीन’, तब भारत।

‘पहले चीन’
यही रट उन्होंने 1955 में तब भी लगाई, जब तत्कालीन सोवियत प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन ने, अमेरिका की ही तरह, उनका मन टटोलने के लिए सुझाव दिया कि भारत यदि चाहे तो उसके लिए सुरक्षा परिषद में सीटों की संख्या पांच से बढ़ा कर छह भी की जा सकती है। नेहरू ने बुल्गानिन को भी यही जवाब दिया कि कम्युनिस्ट चीन को उसकी सीट जब तक नहीं मिल जाती, तब तक भारत भी सुरक्षा परिषद में अपने लिए कोई स्थायी सीट नहीं चाहता।

बुल्गानिन और सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन सर्वोच्च नेता निकिता ख्रुश्चेव, नवंबर 1955 में पहली बार, एकसाथ भारत आए थे। बुल्गानिन तो दिल्ली के बाद पंजाब, कश्मीर, बंबई, कलकत्ता, मद्रास, बंगलौर और दक्षिण भारत के प्रसिद्ध हिल स्टेशन ऊटी भी गए। कोयम्बटूर के एक निकटवर्ती गांव में नारियल-पानी पीने के लिए उनके रुकने से उस गांव का नाम ही ‘बुल्गानिन थोट्टम’ पड़ गया। भारत के प्रति सोवियत लगाव का इससे बड़ा कोई दूसरा प्रमाण नहीं हो सकता था।
 

सुरक्षा परिषद में भारत के लिए छठीं सीट
बुल्गानिन ने एक सम्मेलन में कहा, 'हम सामान्य अंतरराष्ट्रीय स्थिति और तनावों में कमी लाने के बार में बातें कर रहे हैं और यह सुझाव देना चाहते हैं कि भारत को छठें सदस्य के रूप में सुरक्षा परिषद में शामिल किया जा सकता है।' इस पर नेहरूजी की प्रतिक्रिया थी, 'बुल्गानिन शायद जानते हैं कि अमेरिका में कुछ लोग सुझाव दे रहे हैं कि सुरक्षा परिषद में चीन की सीट भारत को दी जानी चाहिए। यह तो हमारे और चीन के बीच खटपट करवाने वाली बात होगी। हम इसके सरासर ख़िलाफ़ हैं। हम कोई आसन पाने के लिए अपने आप को इस तरह आगे बढ़ाने के विरुद्ध हैं, जो परेशानी पैदा करने वाला है और भारत को विवाद का विषय बना देगा।'

नेहरू ने जोर देकर कहा, 'भारत को यदि सुरक्षा परिषद का सदस्य बनाया जाता है तो पहले संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना होगा। हमारा समझना है कि ऐसा तब तक नहीं किया जाना चाहिए, जब तक पहले चीन की और संभवतः कुछ दूसरों की सदस्यता का प्रश्न हल नहीं हो जाता। मैं समझता हूं कि हमें पहले चीन की सदस्यता पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। (संयुक्त राष्ट्र) चार्टर में संशोधन करने के बारे में बुल्गानिन का क्या विचार है? हमारे विचार से इसके लिए सही समय अभी नहीं आया है।'

स्वयं एक कम्युनिस्ट नेता बुल्गानिन ने जब देखा कि नेहरू अब भी चीन समर्थक राग ही अलाप रहे हैं, तो वे इसके सिवाय और क्या कहते कि हमने सुरक्षा परिषद में भारत की सदस्यता का प्रश्न इसलिए उठाया, ताकि हम आपके विचार जान सकें। हम भी सहमत हैं कि यह सही समय नहीं है, सही समय की हमें प्रतीक्षा करनी होगी। इस प्रकार हमारे परमप्रिय प्रथम प्रधानमंत्रीजी ने चीन के प्रति अपने प्रेम के चलते दूसरा सुअवसर भी गंवा दिया। सही समय की प्रतीक्षा का तभी से कोई अंत ही नहीं आ रहा है।

नेहरू की अदूरदर्शिता
बुल्गानिन को दिए गए नेहरू के उत्तर से इस बात की पुष्टि होती है कि अमेरिका ने कुछ समय पहले सचमुच यह सुझाव दिया था कि सुरक्षा परिषद में चीन वाली सीट, जिस पर उस समय ताइवान बैठा हुआ था, भारत को दी जानी चाहिए। पुष्टि इस बात की भी होती है कि पहले अमेरिकी सुझाव और बाद में सोवियत सुझाव को भी साफ़-साफ़ ठुकरा कर नेहरू ने उस देशहितकारी दूरदर्शिता का परिचय नहीं दिया, जिसकी अपेक्षा तब वे स्वयं ही करते, जब देश का प्रधानमंत्री उनके बदले कोई दूसरा व्यक्ति रहा होता।

भारत में जो गिने-चुने लोग संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता के बारे में अमेरिका और सोवियत संघ के इन दोनों सुझावों को जानते हैं, वे उस समय की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में नेहरू की प्रतिक्रिया को सही ठहराते हैं। पर देखा जाए तो नेहरू के जीवनकाल में ही घटी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने चीन के प्रति उनके मोह या उसके साथ टकराव से बचने की उनकी भयातुरता को अतिरंजित ही नहीं, अनावश्यक भी ठहरा दिया।
 
चीन ने नेहरू के सामने ही न केवल तिब्बत को हथिया लिया और वहां भीषण दमनचक्र चलाया, खुद अपने यहां भी ‘लंबी छलांग’ और नेहरू के निधन के बाद ‘सांस्कृतिक क्रांति’ जैसे सिरफिरे अभियान छेड़ कर अपने ही करोड़ों देशवासियों की बलि भी ली। माओ के सनकी अभियानों के कारण चीन में जितनी मौतें हुईं, उतनी मौतें द्वितीय विश्वयुद्ध में भी नहीं हुई हैं।

चीन ने भारत को सबक सिखाया
नेहरू तो चीन की महानता बखानते रहे जबकि 1962 में उसने भारत पर हमला कर भारत को करारी हार का कड़वा ‘सबक सिखाया।’ इस सबक का आघात डेढ़ साल के भीतर ही नेहरू की मृत्यु का भी संभवतः मुख्य कारण बना। लद्दाख का स्विट्ज़रलैंड के बराबर एक हिस्सा तभी से चीन के क़ब्ज़े में है। अरुणाचल प्रदेश को भी वह अपना भूभाग बताता है। क्षेत्रीय दावे ठोक कर सोवियत संघ और वियतनाम जैसे अपने कम्युनिस्ट बिरादरों से भी लड़ चुका है। अब तो ताइवान को भी बलपूर्वक निगल जाने की धमकी दे रहा है।

जो लोग यह कहते हैं कि 1955 में सोवियत प्रधानमंत्री निकोलाई बुल्गानिन का यह सुझाव हवाबाज़ी था कि भारत के लिए सुरक्षा परिषद में छठीं सीट भी बनाई जा सकती है, वे भूल जाते हैं या नहीं जानते कि चीन में माओ त्से तुंग की तानशाही शुरू होते ही उस समय के सोवियत तानाशाह स्टालिन के साथ भी चीन के संबंध खट्टे होने लगे थे।

रूस-चीन के सैद्धांतिक मतभेद
माओ और स्टालिन कभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हुआ करते थे। स्टालिन की 5 मार्च 1953 को मृत्यु होते ही माओ त्से तुंग अपने आप को कम्युनिस्टों की दुनिया का ‘सबसे वरिष्ठ नेता’ मानने और सोवियत संघ को ही उपदेश देने लगे। दूसरी ओर सोवियत संघ के नए सर्वोच्च नेता निकिता ख़्रुश्चेव, स्टालिन के नृशंस अत्याचारों का कच्चा चिठ्ठा खोलते हुए उस स्टालिनवाद का अंत कर रहे थे, जो चीन में माओ की कार्यशैली बन चुका था। 1955 आने तक माओ और ख्रुश्चेव के बीच दूरी इतनी बढ़ चुकी थी कि चीन उस समय के पूर्वी और पश्चिमी देशों वाले गुटों के बीच ख्रुश्चेव की ‘शांतिपूर्ण सहअस्तित्व’ वाली नीति को मार्क्स के सिद्धान्तों को भ्रष्ट करने वाला ‘संशोधनवाद’ बता रहा था। दोनों पक्ष एक-दूसरे की निंदा-आलोचना के नए-नए शब्द और मुहावरे गढ़ रहे थे। एक-दूसरे को ‘पथभ्रष्ट,’ ‘विस्तारवादी’ और ‘साम्राज्यवादी’ तक कहने लगे थे।

भारत सोवियत संघ की नज़र में अधिक भरोसेमंद था
मतभेदों के कारण ही सोवियत नेताओं को इस बात में विशेष रुचि नहीं रह गई थी कि सुरक्षा परिषद में चीन के नाम वाली स्थायी सीट भविष्य में माओ त्से तुंग के चीन को ही मिले। 1950 वाले दशक के आरंभ में वे चीन वाली सीट पर से ताइवान को हटा कर भारत को बिठाने के अमेरिकी प्रयास का या तो विरोध नहीं करते या कम्युनिस्ट चीन की सांत्वना के लिए कुछ समय तक विरोध का केवल दिखावा करते।

ताइवान को मिली हुई सीट भारत को देने पर संयुक्त राष्ट्र का चार्टर बदलना भी नहीं पड़ता। संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो-तिहाई बहुमत ही इसके लिए काफ़ी होता। चार्टर में संशोधन की बात तभी आती, जब सुरक्षा परिषद में सीटों की संख्या बढ़ानी होती। बुल्गानिन के कहने के अनुसार, सोवियत संघ 1955 में इसके लिए भी तैयार था। यह संशोधन क्योंकि भारत के लिए होता, जिसे अमेरिका खुद ही 1953 तक सुरक्षा परिषद में देखना चाहता था, इसलिए बहुत संभव था कि वह भी संशोधन का ख़ास विरोध नहीं करता।

1950 वाले दशक में संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना आज की अपेक्षा आसान ही रहा होता। उस समय आज के क़रीब 200 की तुलना में आधे से भी कहीं कम देश संयुक्त राष्ट्र के सदस्य थे। उन्हें मनाना-पटाना आज जितना मुश्किल नहीं रहा होता। सोवियत नेता भी ज़रूर जानते रहे होंगे–  जैसा कि नेहरू ने 1955 में बुल्गानिन से स्वयं कहा भी – कि अमेरिका और उसके छुटभैये ब्रिटेन व फ्रांस भी कुछ ही साल पहले ताइवान को हटा कर उसकी सीट भारत को देना चाहते थे। अतः यह मानने के पूरे कारण हैं कि सोवियत नेता भारत की सदस्य़ता को लेकर गंभीर थे, न कि हवाबाज़ी कर रहे थे।

किसिंजर की गुप्त बीजिंग यात्रा
ताइवान 1971 तक कम्युनिस्ट चीन वाली सीट पर बैठा रहा। उस साल अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान होते हुए नौ जुलाई को गुप्त रूप से बीजिंग पहुंचे। घोषित यह किया गया कि वे अगले वर्ष राष्ट्रपति निक्सन की चीन यात्रा की तैयारी करने गये हैं. बीजिंग में वार्ताओं के समय तय हुआ कि निक्सन की यात्रा से पहले ताइवान को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट से हटा कर उसकी सीट कम्युनिस्ट चीन को दी जायेगी. इस निर्णय से यह भी सिद्ध होता है कि  1970 वाले दशक में भी अमेरिका सुरक्षा परिषद में अपनी पसंद के अनुसार उलट-फेर कर सकता था।

इस बार कम्युनिस्ट चीन को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता देने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा में 25 अक्टूबर 1971 को मतदान हुआ। संयुक्त राष्ट्र के उस समय के 128 सदस्य देशों में से 76 ने चीन के पक्ष में और 35 ने विपक्ष में वोट डाले। 17 ने मतदान नहीं किया। दो-तिहाई के अवश्यक बहुमत वाले नियम से प्रस्ताव पास हो गया। ताइवान से न केवल सुरक्षा परिषद में उसकी सीट छीन ली गई, संयुक्त राष्ट्र की उसकी सदस्यता भी सदा के लिए छिन गई।

चीन भारत की राह का सबसे बड़ा रोड़ा
ताइवान की सीट पर 15 नवंबर 1971 से कम्युनिस्ट चीन का प्रतिनिधि बैठने लगा। नेहरू ने देशहित की चिंता की होती, तो कम से कम 60 वर्षों से भारत का प्रतिनिधि भी वीटो-अधिकार के साथ सुरक्षा परिषद में बैठ रहा होता। कश्मीर समस्या भी शायद कब की हल हो चुकी होती। सोवियत संघ को भारत की लाज बचाने के लिए सौ से अधिक बार अपने वीटो-अधिकार का प्रयोग नहीं करना पड़ता।

आज स्थिति यह है कि भारत चाहे जितनी एड़ी रगड़ ले, वह तब तक सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन सकता, जब तक इस परिषद का विस्तार नहीं होता और चीन भी उसके विस्तार तथा भारत की स्थायी सदस्यता की राह में अपने किसी वीटो द्वारा रोड़े नहीं अटकाता। चीन भला क्यों चाहेगा कि वह एशिया में अपने सबसे बड़े प्रतिस्पर्धी भारत के लिए सुरक्षा परिषद में अपनी बराबरी में बैठने का मार्ग प्रशस्त करे? 1950 के दशक जैसा सुनहरा मौका न तो भारत के लिए और न हिंदी के लिए दुबारा आयेगा। सुरक्षा परिषद की स्थायी सीट हिंदी को अपने आप एक विश्वभाषा बना देती।

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