एनआरसी में कैसे शामिल हुए बांग्लादेशियों के नाम?

DW

सोमवार, 9 नवंबर 2020 (08:23 IST)
रिपोर्ट : प्रभाकर मणि तिवारी
 
एनआरसी के मुद्दे पर असम में भारी हिंसा हो चुकी है और कई लोग आत्महत्या भी कर चुके हैं। बावजूद इसके, एनआरसी पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है।
 
असम में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों की शिनाख्त कर उनको निकालने के लिए शुरू हुई नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस यानी एनआरसी पर शुरू से ही विवाद रहा है। एनआरसी की अंतिम सूची से 19 लाख लोगों के नाम बाहर रखे गए थे। पहले इसके सटीक होने का दावा किया गया। लेकिन उसके बाद राज्य में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार ने ही इसे कठघरे में खड़ा कर दिया। इससे एनआरसी की पहेली सुलझने की बजाय लगातार उलझती जा रही है।
 
इससे पहले गुवाहाटी हाईकोर्ट ने भी एनआरसी की कवायद पर सवाल उठाते हुए 3 सप्ताह के भीतर इस पर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया था। सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट से एनआरसी की अंतिम सूची में 15 फीसदी नामों के दोबोरा सत्यापन की अनुमति देने की मांगी है। उसका कहना है कि सूची में अवैध बांग्लादेशी नागरिकों के नाम भी शामिल हैं। इससे एनआरसी की पूरी कवायद कठघरे में है। पहले भी तमाम पार्टियां और संगठन ऐसे आरोप लगाते रहे हैं। वरिष्ठ मंत्री और बीजेपी नेता हिमंत बिस्वा सरमा ने माना है कि अंतिम सूची में कई अवैध बांग्लादेशियों के नाम शामिल हैं।
 
उलझी समस्या
 
तमाम विवादों और आरोपों के बीच तैयार एनआरसी की अंतिम सूची भी असम में बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या का समाधान नहीं कर सकी है। उलटे इस सूची ने घुसपैठ के मुद्दे को और उलझा दिया है। अब राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि अंतिम सूची में शामिल कम से कम 15 फीसदी नामों का दोबारा सत्यापन जरूरी है।
 
इस बीच असम के वरिष्ठ बीजेपी नेता और राज्य के वित्तमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एनआरसी को मौलिक रूप से गलत बताते हुए कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने अनुमति दी तो विधानसभा चुनावों के बाद दोबारा नए सिरे से एनआरसी की कवायद शुरू की जाएगी।
 
सरमा ने अवैध बांग्लादेशियों को 'आधुनिक मुगल' करार दिया है। वे कहते हैं कि ऐसे मुगल असमिया जनजीवन के हर पहलू में प्रवेश कर चुके थे और उनको रोकने के लिए एक लंबी राजनीतिक लड़ाई जरूरी थी। अगले 5 साल तक इसे जारी रखने की स्थिति में उनको हराया जा सकेगा। इस लड़ाई में एनआरसी और परिसीमन सबसे मजबूत हथियार हैं।
 
दरअसल, एनआरसी की अंतिम सूची में बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशियों के नाम निकलकर सामने आए हैं। इसी के बाद असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अंतिम सूची में शामिल नामों का दोबारा सत्यापन करने और 10 प्रतिशत नामों को हटाने की अनुमति मांगी है। हिमंत का आरोप है कि एनआरसी के तत्कालीन प्रदेश संयोजक प्रतीक हजेला ने पूरी प्रक्रिया को गलत तरीके से संचालित किया था। यही तमाम विवादों की जड़ है।
 
असम सरकार पहले से ही कहती रही है कि वह एनआरसी की अंतिम सूची के दोबारा सत्यापन के लिए कृतसंकल्प है। खासकर सीमावर्ती इलाकों में शामिल लोगों में से 20 फीसदी नामों का दोबारा सत्यापन जरूरी है। मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने डिब्रूगढ़ में एक रैली में कहा था कि हम सही एनआरसी चाहते हैं। अभी तैयार एनआरसी की सूची में कई गलतियां हैं। राज्य के लोग इसे कभी स्वीकार नहीं करेंगे। इसमें कई अवैध विदेशियों के नाम भी शामिल हैं।
 
गुवाहाटी हाईकोर्ट की लताड़
 
इससे पहले बीते महीने के आखिर में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान एनआरसी के प्रदेश संयोजक को जमकर लताड़ते हुए सवाल उठाया था कि आखिर इतनी कड़ी प्रक्रिया के बावजूद एनआरसी में विदेशियों के नाम कैसे शामिल हो गए? अदालत ने हलफनामे के जरिए 3 सप्ताह के भीतर इस सवाल का जवाब मांगा है।
 
न्यायमूर्ति मनोजित भुइयां और न्यायमूर्ति सौमित्र सैकिया की खंडपीठ ने एनआरसी के प्रदेश संयोजक को उन वजहों को बताने का निर्देश दिया है जिनके चलते अयोग्य लोगों के नाम भी सूची में शामिल हो गए। यह याचिका नलबाड़ी जिले की रहीमा बेगम ने दायर की थी। विदेशी न्यायाधिकरण ने उनको विदेशी घोषित कर दिया था लेकिन उसके बाद घोषित एनआरसी की अंतिम सूची में उनका नाम शामिल था।
 
दूसरी ओर, बीते साल 31 अगस्त को जारी एनआरसी की अंतिम सूची से जिन 19 लाख लोगों के नाम बाहर रखे गए थे उन्हें अब तक इससे संबंधित कागजात यानी रिजेक्शन स्लिप नहीं दिए गए हैं। नतीजतन उनका भविष्य भी अनिश्चित है। इस कागजात के मिलने के बाद ही ऐसे लोग विदेशी न्यायाधिकरणों में अपील कर सकते हैं। एनआरसी अधिकारियों की दलील है कि कोरोना की वजह से अब तक यह स्लिप जारी नहीं की जा सकी है। इसके साथ ही राज्य सरकार ने भी फिलहाल इस मामले की जांच पूरी नहीं होने तक स्लिप जारी करने पर रोक लगा दी है।
 
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि असम में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान यह सबसे प्रमुख मुद्दे के तौर पर उभरेगा। एक पर्यवेक्षक जितेन हजारिका कहते हैं कि बीजेपी इस मुद्दे को चुनावों तक खींचना चाहती है। इसके जरिए वह खुद को राज्य के लोगों की सबसे बड़ी हितैषी साबित कर इसका सियासी फायदा उठाना चाहती है। साथ ही इसके गलत होने का दावा कर वह विपक्ष के हाथों से उसके मजबूत हथियार की धार को कुंद करने का भी प्रयास करेगी।

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