कोटा में सुनहरे सपनों के बीच दम तोड़ती जिंदगियां

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019 (12:00 IST)
राजस्थान का कोटा शहर मेडिकल और इंजीनियरिंग की कोचिंग के लिए एक बड़ा गढ़ है। लेकिन एक महीने के भीतर वहां चार छात्रों की आत्महत्याएं बताती हैं कि सुनहरे भविष्य की अंधी दौड़ में कैसे जिंदगियां दम तोड़ रही हैं। कोटा शहर कई वर्षो से कोचिंग कर रहे छात्रों की आत्महत्याओं के कारण सुर्खियों में रहा है। पिछले साल वहां कुल 19 छात्रों ने मौत को गले लगाया। पुलिस के अनुसार आत्महत्या की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है।
 
 
कोटा में पुलिस, प्रशासन, कोचिंग संस्थान ने छात्र-छात्राओं में पढ़ाई का तनाव कम करने के बहुत से प्रयास किए लेकिन घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं। इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में नामांकन कराने के लिए होने वाली प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने के लिए देशभर से हर साल करीबन दो लाख छात्र कोटा आते हैं और यहां के विभिन्न निजी कोचिंग सेंटरों में दाखिला लेकर तैयारी में लगे रहते हैं। लेकिन चिंता की बात यह है कि एंट्रेस टेस्ट पास करने के दबाव में पिछले कुछ वर्षो में काफी छात्रों ने आत्महत्या की है, जिसके लिए अत्यधिक मानसिक तनाव को कारण माना जा रहा है।
 
 
कोटा शहर के हर चौक-चौराहे पर छात्रों की सफलता के बड़े-बड़े होर्डिग्स बताते हैं कि कोटा में कोचिंग ही सब कुछ है। यह हकीकत है कि कोटा में सफलता का स्ट्राइक तीस फीसदी से ऊपर रहता है और इंजीनियरिंग और मेडिकल की प्रतियोगी परीक्षाओं में टॉप10 में से कम से पांच छात्र कोटा के ही रहते हैं। लेकिन कोटा का एक और सच भी है जो बेहद भयावह है। एक बड़ी संख्या उन छात्रों की भी है जो नाकाम हो जाते हैं और उनमें से कुछ ऐसे होते हैं जो अपनी असफलता बर्दाश्त नहीं कर पाते।
 
 
कोचिंग की मंडी बन चुका राजस्थान का कोटा शहर अब आत्महत्याओं का गढ़ बनता जा रहा है। यहां शिक्षा के बजाय सपने बेचने का कारोबार हो रहा है जो मौत में तब्दील हो रहा है। कोटा एक तरफ जहां मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं में बेहतर परिणाम देने के लिए जाना जाता है, वहीं इन दिनों छात्रों की आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में है।
 
 
कोटा पुलिस के अनुसार साल 2018 में 19 छात्र, 2017 में सात छात्र, 2016 में 18 छात्र और 2015 में 31 छात्रों ने मौत को गले लगा लिया। वर्ष 2014 में कोटा में 45 छात्रों ने आत्महत्या की थी, जो 2013 की अपेक्षा लगभग 61.3 प्रतिशत ज्यादा थी।
 
 
एक अनुमान के मुताबिक कोटा कोचिंग सुपर मार्केट का सालाना टर्नओवर 1,800 करोड़ रुपये का है। कोचिंग सेन्टर सरकार को अनुमानत: सालाना 100 करोड़ रुपये से अधिक टैक्स के तौर पर देते हैं। देश के तमाम नामी गिरामी संस्थानों से लेकर छोटे मोटे 200 कोचिंग संस्थान यहां चल रहे हैं, जो प्रवेश परीक्षा का प्रशिक्षण दे रहे हैं। आज की तारीख में यहां लगभग डेढ़ से दो लाख छात्र इन संस्थानों से कोचिंग ले रहे हैं।
 
 
कोटा में कोचिंग संस्थानों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ आत्महत्याओं के ग्राफ में भी वृद्धि हो रही है। दो वर्ष पहले आत्महत्या करने वाली कोचिंग छात्रा कीर्ति त्रिपाठी के सुसाइड नोट में कुछ और बातें सामने आई थी। अपने सुसाइड नोट में कीर्ति ने लिखा था कि भारत सरकार और मानव संसाधन विकास मंत्रालय को जल्द से जल्द इन कोचिंग संस्थानों को बंद कर देना चाहिए, क्योंकि यहां बच्चों को तनाव मिल रहा है। उसने लिखा था कि मैंने कई लोगों को तनाव से बाहर आने में मदद की, लेकिन कितना हास्यास्पद है कि मैं खुद को इससे नहीं बचा पाई।
 
 
कोचिंग संस्थान भले ही बच्चों पर दबाव न डालने की बात कह रहे हों लेकिन कोटा के प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में तैयारी करने वाले बच्चे दबाव महसूस न करें, ऐसा संभव नहीं। कोचिंग में प्रतिदिन डेढ़-डेढ़ घंटे की तीन क्लास लगती हैं। पांच घंटे कोचिंग में ही चले जाते हैं। कभी-कभी तो सुबह पांच बजे कोचिंग पहुंचना होता है तो कभी कोचिंग वाले अपनी सुविधानुसार दोपहर या शाम को क्लास के लिए बुलाते हैं। एक तय समय नहीं होता जिस कारण एक छात्र के लिए अपनी दिनचर्या के साथ तालमेल बिठाना मुश्किल हो जाता है।
 
 
छात्र अपने लिए पढ़ाई और मनोरंजन की गतिविधियों के लिए एक निश्चित समय निर्धारित ही नहीं कर पाते, जिससे उन पर तनाव हावी होता है। ऊपर से 500-600 बच्चों का एक बैच होता है, जिसमें शिक्षक और छात्र का तो इंटरेक्शन हो ही नहीं पाता। अगर एक छात्र को कुछ समझ न भी आए तो वह इतनी भीड़ में पूछने में भी संकोच करता है। विषय को लेकर उसकी जिज्ञासाएं शांत नहीं हो पातीं और धीरे-धीरे उस पर दबाव बढ़ता जाता है। ऐसे ही अधिकांश छात्र आत्महत्या करते हैं।
 
 
कोटा में काम कर चुके एक जिला कलेक्टर ने शहर के कोचिंग संस्थानों को एक पत्र भेजा था जिसे हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में अनूदित कर छात्रों के माता पिता को भेजा गया था। युवा छात्रों की खुदकुशी की घटनाओं का हवाला देते हुए उस पत्र में जिला कलेक्टर ने लिखा कि उन्हें बेहतर प्रदर्शन के लिए डराने धमकाने के बजाय आपके सांत्वना के बोल और नतीजों को भूलकर बेहतर करने के लिए प्रेरित करना, उनकी कीमती जानें बचा सकता है।
 
 
मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक मोबाइल पोर्टल और ऐप लाने का इरादा जताया है, ताकि इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए कोचिंग की मजबूरी खत्म की जा सके। चूंकि इंजीनियरिंग के पाठ्यक्रम, आयु, अवसर और परीक्षा का ढांचा कुछ ऐसा है कि छात्रों के सामने कम अवधि में कामयाब होने की कोशिश एक बाध्यता होती है इसलिए वे सीधे-सीधे कोचिंग संस्थानों का सहारा लेते हैं। अगर मोबाइल पोर्टल और ऐप की सुविधा उपलब्ध होती है, तो इससे इंजीनियरिंग में दाखिले की तैयारी के लिए विद्यार्थियों के सामने कोचिंग के मुकाबले बेहतर विकल्प खुलेंगे।
 
 
कोटा में सफलता की बड़ी वजह यहां के शिक्षक हैं। आईआईटी और एम्स जैसे इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र बड़ी-बड़ी कंपनियों और अस्पतालों की नौकरियां छोड़कर यहां कोचिंग संस्थाओं में पढ़ाने आ रहे हैं, क्योंकि यहां तनख्वाह कहीं ज्यादा है। अकेले कोटा शहर में 75 से ज्यादा आईआईटी स्टूडेंट छात्रों को पढ़ा रहे हैं।
 
 
कोटा की पूरी अर्थव्यवस्था कोचिंग पर ही टिकी है। इस शहर की एक तिहाई आबादी कोचिंग से जुड़ी हैं। ऐसे में कोचिंग सिटी के सुसाइड सिटी में बदलने से यहां के लोगों में घबराहट है कि कहीं छात्र कोटा से मुंह न मोड़ लें। इसे देखते हुए प्रशासन, कोचिंग संस्थाएं और आम शहरी इस कोशिश में लग गए हैं कि आखिर छात्रों की आत्महत्याओं को कैसे रोका जाए। अगर जल्द ही आत्महत्या की घटनाओं पर रोक नहीं लग पाई तो यहां का एक बार फिर वही हाल होगा जो कुछ साल पहले यहां के कल-कारखानों में तालाबन्दी होने के चलते व्याप्त हुए आर्थिक संकट के कारण हुआ था।
 
-- रमेश सर्राफ धमोरा/आईएएनएस

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