नरेन्द्र मोदी के खिलाफ बने महागठबंधन के दलों में क्यों हैं अंतरविरोध?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महागठबंधन को महामिलावटी गठबंधन कहा है। एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि उमर अबदुल्ला कहते हैं कि देश में दो प्रधानमंत्री होने चाहिए। अब कांग्रेस पार्टी को जबाव देना पड़ेगा कि आपका साथी कह रहा है कि दो प्रधानमंत्री होने चाहिए तो आपका स्टैंड क्या है? फिर उसके साथ क्यों चलते हो? एनसी का एक कैंडिडेट, उम्मीदवार जो कांग्रेस समर्थन से चुनाव लड़ रहा है वो कहता है अगर कोई पाकिस्तान को गाली देगा तो मैं हिंदुस्तान को सौ गाली दूंगा। उसके साथ आप चुनाव में भागीदार हैं, ये महामिलावट है।' पीएम मोदी का महामिलावट के संदर्भ में यह भी कहना था कि यूपी में दो शत्रु दल सपा और बसपा का गठबंधन भी महाविलावट नहीं है तो क्या है।
 
 
उन्होंने कश्मीर में पीडीपी के साथ भाजपा के गठबंधन के संदर्भ में कहा, 'एक प्रकार से मिलावट वाला ही कार्यक्रम था हमारा। लेकिन कोई सिचुएशन ही नहीं थी कि कोई सरकार बन पाए। महबूबा जी का एक अलग काम करने का तरीका था। हमारी कोशिश थी, अच्छा करें, कुछ कमी रह गई हम नहीं कर पाए। नहीं कर पाए तो हम जम्मू-कश्मीर की जनता पर बोझ नहीं बनना चाहते थे, हमने कहा भाई नमस्ते, हमें जाने दीजिए।' हालांकि मोदी ने इससे पहले यह कहा कि जब हमने पीडीपी से गठबंधन किया था तब मुफ्ती मोहम्मद सईद साहब जिंदा थे। वे समझदार और मैच्योर थे। लेकिन जब वे चले गए तो हमने इस गठबंधन को कैसे चलाए इस पर तीन महीने विचार करके एक कॉमन एजेंडा बनाया था, लेकिन वह नहीं चल सका। हम चाहते थे कि पंचायत चुनाव हो लेकिन महबूबा मुफ्‍ती नहीं चाहती थी। बस यहीं से हमारे रास्ते अलग हो गए।
 
 
इसी संदर्भ में यह संदेह जाहिर किया जा रह है कि यदि महागठबंधन को बहुमत मिला तो कैसे वह किसी कॉमन एजेंड पर काम करेंगे और किस व्यक्ति को सभी की सहमति से पीएम पद के योग्य मानेंगे? यह भी सवाल है कि क्या वे पूरे पांच साल देश को चला पाएंगे? क्या वे सभी दल एक दूसरे को पांच साल तक बर्दाश्त कर लेंगे जो कि एक दूसरे के धुर विरोधी है, लेकिन इस वक्त मोदी के खिलाफ एकजुट हो गए हैं? हालांकि यह भी सही है कि जिस तरह कांग्रेस ने सभी गठबंधन को साथ लेकिन मनमोहनसिंह को पीएम बनाकर  सफलतापूर्वक जिस तरह 10 साल देश चलाया क्या उसी तरह चलाया जा सकता है? इसके लिए जरूरी यह होगा कि पहले विपक्ष या महागठबंधन एक ऐसा चेहरा तय करें जिस पर की सभी की सहमति हो। हालांकि महागठबंधन के अं‍तरविरोध के चलते यह कैसे संभव होगा। अब बात करते हैं महागठबंधन के अंतरविरोध की।
 
 
नरेन्द्र मोदी के विरोध में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), तेलुगुदेशम, राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी), जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई), मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा), नेशनल कॉन्फ्रेंस, आम आदमी पार्टी (आप), द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा या एनसीपी), वंचित बहुजन अघाड़ी (वीबीए), मुस्लिम लीग और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) आदि अनेक पार्टियां लामबंद हैं। वाईएसआर कांग्रेस के जगन मोहन रेड्डी, टीआरएस के नेता चंद्रशेखर राव या बीजेडी के नवीन पटनायक अभी खेल को देख रहे हैं। वे चुनाव बाद ही खेल खेलेंगे या बिगाड़ेंगे।
 
 
अब इनमें से किसका किसके साथ गठबंधन है, किसने क्यों किससे दूरी बना रखी है और किसने क्यों मजबूरी में भी गठबंधन कर रखा है? यह जानना जरूरी है। यूपी में सपा-बसपा-रालोद, कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस, महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी, तमिलनाडु में डीएमके-कांग्रेस, बंगाल में कांग्रेस-वामपंथ गठबंधन में हैं। लेकिन यूपी में कांग्रेस सपा और बसपा के खिलाफ लड़ रही है, तो बंगाल में तृणमूल के खिलाफ, कर्नाटक और केरल में वामपंथ के खिलाफ तो उसने वाईएसआर कांग्रेस, टीआरएस और बीजेडी के खिलाफ भी मोर्चा खोल रखा है।
 
 
दूसरी ओर कांग्रेस का एक धड़ा दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और गोवा में आम आदमी पार्टी से गठबंधन नहीं चाहता। उसका मानना है कि इससे कांग्रेस को नुकसान होगा। कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों ने ही एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा था। आम आदमी पार्टी तो दिल्ली के तख्त पर कांग्रेस के भ्रष्ट कार्यकाल का विरोध करके ही बैठी थी। ऐसे में आम आदमी पार्टी के भीतर भी इस गठबंधन को लेकर असंतोष देखा जा सकता है।
 
 
अब यदि उत्तरप्रदेश की बात करें तो उत्तरप्रदेश में कांग्रेस गठबंधन में शामिल होना चाहती है लेकिन सपा और बसपा ने उसे गठबंधन से दूर ही रखा है। अगर कांग्रेस यूपी में महागठबंधन का हिस्सा होती तो मोदी विरोधी मोर्चा बहुत मजबूत हो सकता था। मायावती की पार्टी को लगता है कि कांग्रेस से गठबंधन करने से उसे नुकसान होगा और उसका वोट कांग्रेस में शिफ्ट हो जाएगा।
 
हालांकि बसपा ने गठबंधन करते वक्त यह क्यों नहीं सोचा कि सपा उसकी कट्टर दुश्मन रही है? इसका कारण यह था कि उसने गोरखपुर व कैराना आदि जगहों पर जो प्रयोग किया था, वह सफल रहा। इससे उसे यह समझ में आ गया कि मुस्लिम और हिन्दू दलितों का वोट यदि कांग्रेस में गया तो हमें नुकसान होगा। इसलिए शायद उसने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस को गठबंधन में शामिल नहीं किया। हालांकि कांग्रेस का एक धड़ा यह मानता है कि यदि कांग्रेस गठबंधन में शामिल होती तो उसे ज्यादा सीटें नहीं मिलतीं, ऐसे में कांग्रेस का वजूद ही खतरे में होता।
 
 
अब बात करें बंगाल की तो कांग्रेस ने बंगाल में उस सीपीएम पार्टी से गठबंधन किया जिसके खिलाफ वह पूर्व में चुनाव लड़ती रही है। जब कांग्रेस ने सीपीएम से गठबंधन किया तो स्वाभाविक रूप से ममता बनर्जी को कांग्रेस से दूरी बनाना ही थी जबकि मोदी विरोधी गठबंधन में ममता बनर्जी की आवाज अन्य से ज्यादा बुलंद नजर आती है। यह बहुत विरोधाभास है कि मोदी के खिलाफ एक ओर कांग्रेस और तृणमूल साथ-साथ हैं और दूसरी ओर वे बंगाल में एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव भी लड़ेंगे।
 
 
कांग्रेस ने जहां बंगाल में सीपीआई से गठबंधन कर रखा है, वहीं राहुल गांधी और उनकी पार्टी केरल में उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहे हैं। दूसरी ओर सीपीएम कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन के खिलाफ लड़ रही है। एक ओर जहां केरल के वायनाड में राहुल के खिलाफ सीपीएम ने अपना प्रत्याशी उतारा है, तो दूसरी ओर उसने कर्नाटक के चिकबल्लापुर से कांग्रेस-जेडीएस के साझा उम्मीदवार और वरिष्ठ नेता वीरप्पा मोइली के खिलाफ अपना उम्मीदवार उतारा है।
 
 
यह बहुत ही दिलचस्प है कि एक ओर तो आप सीपीएम के समर्थक हैं, तो दूसरी ओर विरोधी। केरल में कांग्रेस का मुस्लिम लीग से गठबंधन रहा है, लेकिन उसने ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन से आंध्र और तेलंगाना में दूरी बनाए रखी है हालांकि वे एक-दूसरे का विरोध नहीं करते हैं।
 
बसपा ने एक ओर जहां कांग्रेस और भाजपा को नागनाथ एवं सांपनाथ की उपाधि देते हुए उत्तरप्रदेश में उनसे दूरी बना रखी है, वहीं उसने मध्यप्रदेश और राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस को समर्थन दे रखा है। महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी का गठबंधन है लेकिन उन्होंने अन्य विपक्षी पार्टियों को गठबंधन से अलग कर रखा है।
 
 
दरअसल, महागठबंधन में शामिल मायावती भाजपा के साथ ही कांग्रेस को भी रोकना चाहती हैं। लेफ्ट (वामपंथी) भी कांग्रेस से गठबंधन करके भाजपा के साथ ही उस तृणमूल कांग्रेस को भी रोकना चाहता है, जो कि भाजपा के विरुद्ध बने अनधिकृत महागठबंधन में शामिल है। दूसरी ओर कांग्रेस, भाजपा के अलावा उस आम आदमी पार्टी को भी रोकना चाहती है, जो कि मोदी के खिलाफ महागठबंधन में शामिल है।
 
दरअसल, जो महागठबंधन बना है उसके कई दल ऐसे हैं, जो कि पूर्व में एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं। ऐसे में उनका आपस में गठबंधन होना थोड़ा असहज जरूर है, क्योंकि दो विरोधी दलों का लगता है कि यदि हमने गठबंधन किया तो हमारे वोटबैंक को इससे नुकसान होगा। दूसरा यह भी कि कोई भी दल एक-दूसरे को ज्यादा सीट देने के चक्कर में नहीं है।
 
 
मान लो, यदि कांग्रेस उत्तरप्रदेश में सपा और बसपा के आगे झुक जाती है तो वह मात्र 7 सीटों पर ही सिमटकर रह जाएगी। वैसे भी कांग्रेस उत्तरप्रदेश में अपने खोए हुए जनाधार को पुन: प्राप्त करना चाहती है, उसी तरह जिस तरह बसपा भी चाहती है। दोनों के ही लिए यह अपने वजूद को बनाए रखने की लड़ाई है। उत्तरप्रदेश इसीलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटें हैं।
 
 
ऐसे में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ये दल अपनी दोस्ती और दुश्मनी में कैसे संतुलन बनाए रखते हैं, जैसे कि बसपा ने मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस को समर्थन दे रखा है, वहीं उसने उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। जैसे बंगाल में कांग्रेस ने वामपंथ को समर्थन दे रखा है, वहीं उसने केरल और कर्नाटक में वामपंथ के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।
 
सचमुच यह चुनाव महागठबंधन के लिए एक चुनौती है। चुनाव के बाद उनके लिए और भी बड़ी चुनौती होगी। देश में किसी की भी सरकार बने लेकिन जन‍भावना कहती है कि वह सरकार पूरे पांच साल रहकर अच्छे कार्य करे। अस्थिर सरकार से देश का नुकसान ही होगा। जनता नहीं चाहती है कि बार-बार चुनाव हो।
 

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