महाभारत में विदुर की बात सत्य निकली, तो जंगल भी बच जाते

महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया। इस युद्ध में कौरवों ने 11 अक्षौहिणी तथा पांडवों ने 7 अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर लड़ाई लड़ी थी। कुल अनुमानित 45 लाख की सेना के बीच महाभारत का युद्ध 18 दिनों तक चला। महाभारत के युद्ध के पश्चात कौरवों की तरफ से 3 और पांडवों की तरफ से 15 यानी कुल 18 योद्धा ही जीवित बचे थे।
 
 
इस युद्ध से पूर्व महात्मा विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र को एक उदाहरण देकर समझाया था कि यह युद्ध रोक लो अन्यथा दोनों पक्ष का विनाश हो जाएगा। परंतु धृतराष्ट्र ने पुत्र मोह में विदुर की बात नहीं मानी। यदि वह बात मान लेते तो पांडवों सहित कौरव भी बच जाते। अर्थात जंगल भी बच जाते।
 
महात्मा विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं:-
न स्याद् वनमृते व्याघ्रान् व्याघ्रा न स्युर्ऋते वनम् ।
वनं हि रक्षते व्याघ्रैर्व्याघ्रान् रक्षति काननम् ।।46।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागपर्व)
 
अथात श्लोक में यह कहा गया कि बाघों के बिना वन का अस्तित्व संभव नहीं और न ही बिना वन के बाघ रह सकते हैं। वन की रक्षा तो बाघ करते हैं और बदले में वन उनकी रक्षा करते हैं। यह उदाहरण देकर महात्मा विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हैं कि अपने पुत्रों और पांडवों के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहिए अन्यथा दोनों ही नष्ट हो जाएंगे।
 
 
धार्तराष्ट्रा वनं राजन् व्याघ्रा पाण्डुसुता मताः ।
मा छिन्दि सव्याघ्रं मा व्याघ्रान् नीनशन् बनात् ।।45।। (महाभारत, उद्योगपर्व के अंतर्गत प्रजागपर्व)
 
अर्थात् आपके पुत्र (धार्तराष्ट्र) वन के समान हैं और पाण्डुपुत्र उनके सह-अस्तित्व में रह रहे बाघ हैं। बाघों समेत इन वनों को समाप्त मत करिए अथवा उन बाघों का अलग से विनाश मत करिए। वनों तथा बाघों की भांति दोनों पक्ष एक-दूसरे की रक्षा करें इसी में सभी का हित है।
 
 
युद्ध का परिणाम : सभी जानते हैं कि सारे कौरव अपने पुत्रों सहित मारे हो गए थे। इसके अलावा मात्र पांच गांव के खातिर लड़े गए इस युद्ध से आखिर में पांडवों को क्या हासिल हुआ? पांडव वंश में अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु की पत्नी के उत्तरा के गर्भ में पल रहा उनका एक मात्र पुत्र बचा था जिसे श्रीकृष्ण ने बचाया था। इसका नाम परीक्षित था। पांडव युद्ध जीतने के बाद भी हार ही गए थे क्योंकि फिर उनके पास कुछ भी नहीं बचा था। प्रत्येक पांडव के 10-10 पुत्र थे लेकिन सभी मारे गए। द्रौपदी के भी पांचों पुत्र मारे गए थे।
 
 
गांधारी, कुंती, धृतराष्‍ट्र, विदुर, संजय आदि सभी जंगल चले गए थे। जंगल में धृतराष्‍ट्र और गांधारी एक आग में जलने से मर गए। ऐसी लाखों महिलाएं विधवा हो गई थी जिनके पतियों ने युद्ध में भाग लिया था। उनमें कर्ण, दुर्योधन सहित सभी कौरवों की पत्नियां भी थीं।
 
अंत: में युद्ध के बाद युधिष्ठिर संपूर्ण भारत वर्ष के राजा तो बन गए लेकिन सब कुछ खोकर। किसी भी पांडव में राजपाट करने की इच्छा नहीं रही थी। सभी को वैराग्य प्राप्त हो गया था। यह देखते हुए युधिष्ठिर ने राजा का सिंहासन अर्जुन के पौत्र परीक्षित को सौंपा और खुद चल पड़े हिमालय की ओर, जीवन की अंतिम यात्रा पर। उनके साथ चले उनके चारों भाई और द्रौपदी आदि। वहीं सभी का अंत हो गया था।
 
 
श्रीकृष्ण की नारायणी सेना और कुछ यादव महाभारत के युद्ध में और बाद में गांधारी के शाप के चलते आपसी मौसुल युद्ध में श्रीकृष्ण के कुल का नाश हो गया था। मौसुल युद्ध में श्रीकृष्‍ण के सभी पुत्र और पौत्र मारे गए थे। कुल में जो महिलाएं और बच्चे बचे थे, उन्हें अर्जुन अपने साथ लेकर मथुरा जा रहे थे तो रास्ते में वे बचे हुए लोग भी लुटेरों के द्वारा मारे गए। श्रीकृष्ण के कुल का एकमात्र व्यक्ति जिंदा बचा था जिसका नाम था वज्रनाभ।
 
 
आज हम बाघों को बचाने की बात करते हैं ताकि हमारे वन सुरक्षित रह सकें परंतु हमारे देश के वन क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं और इसके साथ ही वन के पशु पक्षी आदि सभी भी लुप्त होते जा रहे हैं। एक दिन धरती पर मानव ही बचेगा इसकी कोई गारंटी नहीं।

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