शिक्षक और शिष्य

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वैसे तो हमारे जीवन में कई जाने-अनजाने शिक्षक होते हैं जिनमें हमारे माता-पिता का स्थान सर्वोपरि है। लेकिन असल में शिक्षालय के शिक्षक का संबंध शिष्य से होता है। शिक्षालयों में शिक्षक-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता रहा है, लेकिन वर्तमान में शिक्षकों के हालात बदतर हो चले हैं। शिक्षा का स्तर भी गिर गया है।

आज का जमाना तेजी से बदल रहा है। जहाँ एक ओर शिक्षकों की पिटाई के मामले प्रकाश में आते हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षकों द्वारा बच्चों को प्रताड़ित किए जाने के मामले भी प्रकाश में आए हैं। इस सबके अलावा आज के आधुनिक युग में जबकि संचार माध्यम के साधन बढ़ गए हैं ऐसे में शिक्षक से कहीं ज्यादा ज्ञान आज शिष्य को हो चला है। कई मामलों में शिक्षक को किसी प्रश्न पर अगल-बगल झाँकना पड़ता है।

शिक्षक क्या है, कैसा है और कौन हैं यह जानने के लिए उसके शिष्यों को जानना जरूरी होता है, और यह भी कि शिक्षक को जानने से शिष्यों को जाना जा सकता है, लेकिन ऐसा सिर्फ वही जान सकता है जो कि खुद शिक्षक है या शिष्य। श्रेष्ठ शिक्षक से ही श्रेष्ठ शिष्यों का जन्म होता है।

अकसर हमें हमारे स्कूल और कॉलेज के शिक्षक याद आते हैं। उनमें से कुछ को तो हम याद करना ही नहीं चाहते और कुछ को हम भूलना ही नहीं चाहते। ठीक इसके विपरीत भी होता है। कई शिक्षक शिष्यों द्वारा प्रताड़ित रहते हैं। बड़ी मुश्किल से वे जैसे-तैसे अपना पीरियड पूरा करते हैं। फिर भी इस सबके बीच शिक्षालयों को राजनीति का अखाड़ा बना दिए जाने के कारण अब कोई भी टीचर बनना शायद ही पसंद करे। अब शिक्षकों की नहीं शिष्यों की चलती है।

शिष्य के मन में अब टीचरों के प्रति उतना सम्मान नहीं रहा जैसे कि आज से 20-30 वर्ष पूर्व हुआ करता था। शिक्षकों को उचित सम्मान नहीं मिलने के कारण ही आज के युवाओं में अनुशासन नहीं रहा। जरूरत है इस बात की कि शिक्षकों को उचित सम्मान दिया जाए और यह भी कि हर किसी को शिक्षक बनने का अधिकार भी नहीं हो।

जो विद्यार्थी यह समझता है कि हमारे शिक्षक हमसे अच्‍छा व्यवहार नहीं करते या कि ज्यादातर मामलों में वे सीख ही देते रहते हैं वे विद्यार्थी जब बड़े हो जाते हैं तब उन्हें जिंदगी की आपाधापी में वे शिक्षक याद आते हैं जिन्होंने हमें सीख दी थी और हमने उसे गलत माना था।

सच्चा शिक्षक बनने से कहीं ज्यादा जरूरी है एक सच्चा विद्यार्थी बनना। जो लोग अर्जुन की तरह जिज्ञासु होते हैं वे प्रश्न पर प्रश्न खड़े करते हुए, संशय का नाटक करते हुए, शिक्षकों को कुरेद-कुरेदकर उनसे सारा ज्ञान ले लेते हैं। श्रेष्ठ शिक्षक बनने के यही गुण होते हैं कि जीवनभर विद्यार्थी बनकर रहें।

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