कहां गए वो टीचर जो माटसाब थे

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गुरुडम गई गेरुआ वस्त्रधारियों के पास
आजकल 'गुरु' शब्द से शिक्षक किसी को ध्यान नहीं आता। गुरुडम आध्यात्मिक गुरुओं के पाले में चली गई है। आर्थिक रूप से खस्ताहाल स्कूल में पढ़ाने वाले गुरु का कोई ग्लैमर ही नहीं है इसलिए वह गुरु ही नहीं है।

डिप्रेशन में मास्टरजी
गत दिनों समाचार-पत्रों में शिक्षकों के अवसादग्रस्त होकर आत्महत्या करने की खबरें और इससे संबंधित सर्वे पढ़ने में आया। शिक्षकों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति से आश्चर्यमिश्रित क्षोभ हुआ। क्या वाकई यह एक विचारणीय प्रश्न नहीं कि 'संतोष परमं सुखं' की उक्ति में यकीन कर जीवन बिताने वाला एक बुद्धिजीवी वर्ग इस प्रकार हथियार डाल देगा और भावी पीढ़ी को दिशा देने वाला मस्तिष्क आत्महत्या जैसे कायराना कृत्य को अंजाम देने लग जाएगा?

सर्वे में दिए गए आंकड़ों के मुताबिक देश में ऐसे शिक्षकों की संख्या में यकायक बहुत ज्यादा वृद्धि हुई है, जो मानसिक तनाव के कारण अवसादग्रस्त हो चुके हैं। इन शिक्षकों में सामान्यतः वे शिक्षक सम्मिलित हैं, जो निजी विद्यालयों में वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं, लेकिन ताउम्र नौकरी के बावजूद अपना खुद का घर बनाना तो दूर की बात, मात्र जीवन-यापन करने में ही अपनी सारी शक्ति झोंक चुके होते हैं।

भौतिकतावाद की दौड़ में फंसकर, स्तर बनाए रखने के चक्कर में वे कर्ज के दलदल में फंसते चले जाते हैं। कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि शिक्षक तो एक समझदार और सही-गलत को जानने वाला प्राणी है, फिर वह औरों की देखा-देखी क्यों करता है और साधारण जीवन क्यों नहीं जीता? यहां यह बात समझना होगी और कड़वी होने के कारण पचाना भी होगी कि क्या समाज का कोई दूसरा वर्ग है, जो परिवर्तन के इस दौर में स्वयं को किसी भी क्षेत्र में पीछे रखना चाहता हो?

क्या हमने ऐसा वातावरण कायम रखा है, जहां एक ईमानदार शिक्षक का बेटा ईमानदारी के साथ शिक्षक बनने के बारे में सोच भी सके? फिर हम शिक्षकों से ही यह उम्मीद क्यों करते हैं कि वे पूरी निष्ठा और समर्पण से काम करने के बावजूद एक जोड़ी कपड़े में ही पूरा साल बिताए और अपने बच्चों को सुविधाहीन सरकारी स्कूल में ही पढ़ाए?

टीचर या रसोइया
मध्याह्न भोजन के कार्यभार ने गुरुजी लोगों को रसोइया बना दिया है। गैस की टंकी की व्यवस्था करने से लेकर आटा-दाल लाने तक का काम वे करते हैं, बल्कि यह ड्यूटी पढ़ाने से ऊपर है। तिस पर भी भोजन में मेंढक और छिपकली निकल आती है। सारी व्यवस्था तो ठीक, अव्यवस्था का भार भी गुरुजी पर ही है।

मैनेजमेंट क्या कहेगा?
प्राइवेट विद्यालयों के शिक्षक खस्ताहाल। कतिपय बड़े शहरों के जाने-माने उच्चस्तरीय सीबीएससी नॉर्म्स देने वाले विद्यालयों को छोड़ दिया जाए तो अमूमन गांव-शहर के हर छोटे-बड़े प्राइवेट स्कूलों में शिक्षकों को दिया जाने वाला मेहनताना 'ऊंट के मुंह में जीरे' के समान है और शिक्षक तथा उसके परिवार की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति तक नहीं करता। ऊपर से नौकरी से निकाले जाने का दबाव अलग। निर्धारित कालखंडों के अलावा सारे विभागीय कार्य और फिर बचे हुए समय में कहीं और कार्य न करने की मानवतारहित शर्तें भी शिक्षकों को गहरी हताशा और गर्त की ओर ढकेल रही हैं।

यही कारण है कि प्राइवेट स्कूलों के अवसादग्रस्त शिक्षकों की संख्या बहुत अधिक है। कितना प्रतिशत रिजल्ट आए, किसको एडमिशन दें, बच्चों को कैसे पढ़ाएं, इन सब बातों पर आजकल निजी विद्यालयों के मैनेजमेंट का दखल रहता है। मैनेंजमेंट के लिए शिक्षा चोखा धंधा है। मास्टरजी मात्र सेवक हैं- पगार पाओ, अच्छा रिजल्ट दो, यही मैनेजमेंट का मूलमंत्र है। बच्चों का भविष्य और शिक्षक सम्मान उनकी चिंता का विषय नहीं।

कोचिंग क्लास वाले गुरु हैं ब्रह्मा
पढ़ने वाले बच्चों के लिए स्कूल या कॉलेज में पढ़ाने वाले शिक्षक दीन-हीन और दबने वाले मास्टरजी हैं। दादा टाइप विद्यार्थी उन्हें धमका भी सकते हैं। पालकों से लेकर प्रबंधकों तक हर कोई शिक्षकों को ंख दिखाता है। वैसे यूं ही कि अब तो अधिकांश ऐसे ही शिक्षक नियमित स्कूल-कॉलेजों में रह गए हैं, जो स्वयं भी खस्ताहाल हैं। ऐसे में कोचिंग क्लास वाले गुरुजी ब्रह्मा हो गए हैं या कहें कि कोचिंग क्लास वाले गुरुजी कुबेर हो गए हैं, सामान्य गुरु रह गए सुदामा।

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