साधारण महिलाओं की उपलब्धियों के जगमगाते तारे

- डॉ. मनीषा वत्
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कहीं घूँघट में छिपकर दबे-सहमे कदमों को पुरुष के साथ मिलाते हुए, तो कहीं रूढ़ियों से लड़ते हुए भारतीय नारी ने सदियों के संघर्षों की आग में तपाकर अपने आपको सोना बनाया है। यह क्रम आज भी जारी है। उसने घर की देहली का सम्मान करते हुए अपने आपको साबित किया। घरेलू जिम्मेदारियों को साथ लिए बाहर के संघर्षों से भी लगातार जूझती रही। आज गाँव से लेकर महानगर तक उसकी सफलता की रोशनी से जगमगा रहे हैं

नारी को हम अलग-अलग रूपों में देखते हैं। दुनिया की आधी आबादी महिलाएँ आज टेक्नो फ्रेंड, श्रेष्ठ कॉर्पोरेट, श्रेष्ठ वैज्ञानिक, राष्ट्रपति, श्रेष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, श्रेष्ठ पत्रकार व अनेक ऐसे पदों पर मिलेंगी, जो पहले उनके लिए अछूते माने जाते थे। ये उदाहरण तो उन महिलाओं के हैं जिन्हें बढ़ने के अवसर मिले। आज हम बात करेंगे उन साधारण महिलाओं की जिनके पास सीमित साधन व ढेर सारी बाधाएँ थीं, लेकिन जिजीविषा के साथ उन्होंने स्वयं को समाज में साबित किया। इन महिलाओं ने उस नदी की तरह अपना मार्ग बनाया जिसकी राह में बड़ी चट्टानें आ जाती हैं, वे उसको काट तो नहीं सकतीं लेकिन नया रास्ता बनाकर सुंदर झरने का रूप लेती हैं।

कमरुनिसा
कमरुनिसा का विवाह पुराने विचार के सजातीय परिवार में हुआ। कम उम्र में विवाह होने पर उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। मन में पढ़ाई की ललक थी, लेकिन परिवार की नई जिम्मेदारियों को संभालना भी था। 3 बच्चों के बाद संयुक्त परिवारमें पति से पढ़ने की इच्छा जाहिर की, लेकिन परिवार से अनुमति न मिली। आखिरकार उनके मन में पढ़ाई की ललक देख पति का मन पसीजा व उन्होंने मेट्रिक के बाद की पढ़ाई शुरू की। शुरू में परिवार में इसका बहुत विरोध हुआ। लेकिन सबके तानों व संघर्षों के बावजूद कमरुनिसा ने स्नातक किया फिर लॉ के बाद सिविल जज की परीक्षा पास कर प्रशासनिक अधिकारी का पद पाया। परिवार, समाज की परवाह न करते हुए उन्होंने सबको अपने काम से चकित कर दिया।

शीला
40 वर्ष की उम्र में एक दिन अचानक पति का व्यवसाय बंद हो गया। शीला के सामने अँधेरा ही अँधेरा था। व्यवसाय बंद होने के आघात से पति भी दिल के मरीज हो गए, लेकिन शीला ने हिम्मत नहीं हारी। ज्यादा पढ़ी-लिखी न होने के कारण वे कोई अच्छीनौकरी तो नहीं कर सकती थीं, लेकिन खाना, अचार, पापड़ आदि बहुत अच्छा बनाती थीं। उन्होंने अचार, पापड़, मिठाई, नमकीन बनाने शुरू किए व त्योहारों व छोटी पार्टी में उनकी माँग होने लगी। आज वे मेहनत से अपना घर चला रही हैं।

उमा
15 वर्ष के उमा के सुखी वैवाहिक जीवन में अचानक भूचाल आ गया। पति दूसरे शहर में नौकरी करते-करते नजदीकी रिश्तेदार से ही दिल लगा बैठे। सीधी-सरल उमा ने पहले तो पति को समझाने व उसके वापस आने का इंतजार किया, लेकिन कोई बात न बनी। अपने मन पर पत्थर रख सब चुनौतियों को पार कर उन्होंने कम्प्यूटर कोर्स किया व कम्प्यूटर पर ही टैली व टाइपिंग का काम कर अब गुजारा कर रही हैं। साथ ही दोनों बड़े होते बच्चों को उच्च शिक्षा देने का निरंतर प्रयास जारी है। इससे उनमें आत्मविश्वास जगा।

शमशाद बेगम
शमशाद बेगम आज शिक्षा की अलख जगा रही हैं। वे 10 वर्ष पहले साक्षरता कार्यक्रम से जुड़ीं तो उनके समाज व गाँव में खूब विरोध हुआ, क्योंकि इस काम में काम में घूमना बहुत पड़ता था। लेकिन उन्होंने सबके तानों की कतई परवाह नहीं कीऔर अपनी यात्रा जारी रखी। गाँव में स्वसहायता समूह का गठन कर निरक्षर महिलाओं के साथ स्वरोजगार शुरू किया तो गाँव की महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदली। बस, फिर तो सबका उन पर विश्वास भी बढ़ा। उनके इस कार्य को शासन व अनेक संस्थाओं से पुरस्कार मिले। उनकाअसली ध्येय मजदूर महिलाओं को पढ़ाकर आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है।

अनु
महानगर निवासी अनु शादी कर छोटे-से शहर में आई तो उसकी कुछ कर गुजरने की तमन्ना दिल में ही रह गई। पति डॉक्टर होने के कारण समय भी नहीं कटता था और छोटे कस्बे में अच्छी नौकरी की संभावना भी कम थी। कलाप्रेमी अनु शुरू से ही घर में सजाने में रुचि रखती थीं व उन्हें गार्डनिंग का शौक भी था। अनु ने बच्चों की देखभाल करते हुए अपने गार्डन में अनेक प्रयोग किए व बोनसाई बनाएँ। धीरे-धीरे उनके गार्डन की चर्चा होने लगी व कई पत्रिकाओं में भी इस बारे में छपा। आज उन्होंने बोनसाई बनाकर बेचना भी प्रारंभ कर दिया व एक नर्सरी भी घर में बनाई है, जहाँ कई प्रकार के सुंदर पौधे मिलते हैं। इससे उन्हें थोड़ी आर्थिक मदद भी होती है जिसे वे गरीब, बेसहारा लोगों पर खर्च करती हैं। अनु को इससे असीम संतोष मिलता है।

सीमित साधन व कड़े संघर्षों के अलावा स्वावलंबन की राह से गुजरते हुए इन साधारण-सी महिलाओं ने अपने आप अपनी राह चुनी और कई असाधारण काम कर दिखाए। उन्होंने परिवार के दायित्व को संभालते हुए अपने शौक व करियर को भी पूरा किया व असीम संतोष पाया। घर हो या बाहर ये प्रेरणापुंज बन जगमगा रही हैं।