women's day 2021 : एक जिंदा आयशा, जो किसी नदी में किसी आरिफ के लिए नहीं कूदी....सच्ची कथा

एक जिंदा आयशा का खत, जन्नत की आयशा के नाम, एक सच्ची कथा  
मेरी हमनाम आयशा, 
 
मैं भी आयशा ही हूं लेकिन जिंदा आयशा... तुम्हारे और मेरे नसीब में ज्यादा फर्क नहीं है। वही सब कुछ मेरे साथ भी हुआ जो तुम्हारे साथ हुआ। वही दहेज, वही शौहर की बेवफाई, वही घर की औरतों के ताने, वही बार बार की मांग और बार-बार मायके से ससुराल, ससुराल से मायके... मैं भी ऐसे ही तड़पी अपने शौहर के प्यार के लिए जैसे तुम....
 
मुझमें और तुममें अंतर यह है कि मैंने अपने दिमाग का संतुलन नहीं खोया, मैंने हालातों से लड़ने की ठानी, मैं कहीं नहीं नहीं भागी..  तुम होती तो सुनाती तुम्हें अपनी जिंदगी की वह दास्तान, जो रूह कंपकंपा सकती थी तुम जैसी कोमल दिल वालों की... तुम मुझे समझ सकती थी क्योंकि हमारे दुख लगभग साझा हैं.. मैं तुम्हें समझ सकती थी क्योंकि मैंने वही भुगता है जो तुम सहन नहीं कर सकी.... 
 
फिलहाल तुम नहीं हो तो बची हुई आयशाओं को सुना रही हूं कि कैसे मैंने विपरीत परिस्थितियों से लड़कर अपना मुकाम हासिल किया... 
 
सन् 2010 का साल था। मैं अपनी पीएचडी के सपने बुन रही थी। एमए मेरा हो चुका था उर्दु भाषा में, अंग्रेजी में करने की तमन्ना भी थी और हिन्दी में भी... चाहती थी तीन भाषाओं पर मेरा हक हो....पर फिर मूड बदला पीएचडी की धुन सवार हुई, नाम डॉ. आयशा जो लगाना था। हां मेरी उम्र तुम्हारी तरह कच्ची नहीं थी थोड़ी सी बड़ी थी मैं, अपनी उम्र और पढ़ाई को लेकर ताने तो बचपन से अम्मी, मुमानी, फुफानी, खालाओं से इतने सुने कि 
ससुराल के तानों ने जैसे असर ही नहीं किया मुझ पर, पर बात अभी ससुराल की नहीं, अपनी ही....  
 
तो एक दिन बड़ी आपा ने अम्मी को चहकते हुए बताया कि उनके कोई दूर के रिश्ते में देवर हैं, डॉक्टर हैं, अपनी आयशा के लिए उनकी अम्मीजान ने रिश्ते की बात भेजी है....अम्मी को तो जैसे मुंहमांगा वरदान मिल गया....'ये लड़की घोड़ी जैसी बड़ी हो रही है, लेकिन शादी की बात पर बिदक जाती है...तुम तो बोलो उनको अगले जुम्मे ही आ जाएं, खुदाया पहले रिश्ते को बिस्मिल्लाह कर दूं.... 
 
ना मैं खुश हुई ना उदास, सोचा चलो इसी बहाने डॉक्टर साब को हम भी देख लेंगे। सच कहूं एक तरंग लहराई थी.. तुमसे जरूर बड़ी थी पर इतनी भी नहीं कि मोहब्बत,शादी, शौहर जैसे लफ्जों से से ही बेज़ार होऊं.... 
 
पीएचडी के लहराते सपने कुछ देर थम गए और मैंने सच में कोई ना नुकूर नहीं की...
 
सब कुछ सुहाना लगने लगा, कहानी को थोड़ा दौड़ा रही हूं ताकि असली कहानी पर आ सकूं....
 
डॉक्टर साब की अम्मी को मैं नफासत से सजी धजी सांवले रंग के बावजूद(?) भा गई। रिश्ता तय हुआ तो सूची आ गई लेनदेन की... अब मेरा माथा ठनका .... फौरन फोन लगा दिया  डॉक्टर साब को, भला यह क्या आप दहेज लेंगे? यह मेरा पहला क्रांतिकारी कदम था... 
 
मुझे बहला दिया गया, अरे नहीं जो लगता है वही दीजिए, हमे कुछ नहीं चाहिए...कुछ गलतफहमी है जी.... 
 
इस फोन के एवज में मुझे भारी लानत मलामत झेलनी पड़ी... तुम बड़ो के मामले में न बोलो, रीत का तो देना ही पड़ता है.. अपनी लड़की हम क्या कोरी भेजेंगे, न हुआ तो कर्जा लेंगे पर शादी तो धूमधाम से करेंगे....ये 'धूमधाम' मेरे अब्बू को 4 लाख में पड़ी। मे रे लाख समझाने और रोने पीटने के बाद भी...  दहेज दिया गया... और भरपूर दिया गया.... 
 
लेकिन लालची निगाहों में वह दो कौड़ी का सामान था, भिखारियों और कंगलों के घर से आया टुच्चा सामान था... मन जार-जार रो रहा था, हाय अल्ला, मेरे जैसी पढ़ी लिखी लड़की किन जाहिलों में फंस गई, मेरा पीएचडी का सपना मेरी रोती आंखों में उतर आया.... 
 
लेकिन मैंने ठान लिया कि अब ये मेरी लड़ाई है, इसमें मैं किसी को तब तक शामिल नहीं करूंगी जब तक कि जरूरत न हो...शौहर का नाम आरिफ तो नहीं था पर हरकतें तुम्हारे आरिफ से मिलती जुलती ही थी....
 
तीन महीने मैंने पर्दा भी किया, हम्मालों की तरह काम भी खूब किया, अपनी एमए की डिग्री को भले मैंने ताक पर रख दिया था लेकिन अन्याय के खिलाफ मेरी चिंगारी मैने अपने भीतर बुझने नहीं दी... 
 
मैं खामोशी से हम लोगों से बोले गए हर झूठ को जानने-समझने की कोशिश करने लगी, क्योंकि जुबान चलाने का मतलब था हाथापाई और मुझे यह जंग दिमाग से जीतनी थी....तीन महीनों में मुझे पता चला शौहर नकली डॉक्टर हैं, मुझे पता चला कि उनके तीन अफेयर हैं जिनमें से एक के बिना यह निवाला भी नहीं उतार पाते हैं। घर में भी सबको पता था- हाय अल्लाह आयशा, क्या बताऊं वह पूरा नर्क था नर्क, दोजख....
 
मैंने रो धोकर एक महीना और सरकाया, और अब मैंने कमर कस ली थी यहां से जाने की... लेकिन अकेली कैसे क्या करती तो अपने भरोसेमंद दोस्तों से बात की, धीरे-धीरे अम्मी और आपा को भी बात पता चली, कुछ दिन तक 'तुम्हारे नसीब ही ऐसे होंगे क्या कहें, जैसे वाक्य भी सुने... पर मुझे मुझ पर विश्वास था, मैंने सबसे पहले अपनी पीएचडी की थीसिस को याद किया... एक छोटी मोटी नौकरी की अनुमति ली वह इसलिए मिल गई कि शौहर को अपनी खास बेगमों के साथ गुजारने का अपना वक्त चाहिए था और रोज रोज की चिख चिख से मुक्ति भी.... 
 
उसी नौकरी में कुछ शुभचिंतक भी मिले, ऊपर वाला अच्छे लोगों को अच्छो का साथ जरूर देता है...मैंने अपने दोस्तों से मदद नहीं मांगी , मैंने कहा अपनी लड़ाई मैं खुद लड़ूंगी बस जब लड़खड़ाऊं तब साथ दे देना... मेरे आसपास बने रहना.... 
 
मोहब्बत मैंने भी की थी उसी नामुराद से लेकिन जब दिल टूटा तो मैं अपने पास लौट आई ना रोई ना गाई...मुझे अपनी एजुकेशन पर भरोसा था, मुझे अपने वजूद पर भरोसा था, मुझे अपने मन पर विश्वास था....     
 
मैंने दो फाइल बनाई। एक में छल, कपट और धोखे के सबूत एकत्र किए, दूसरी में अपनी पीएचडी की थीसिस को तैयार किया। जब मैंने सही लोगों की सलाह से अपनी जमीन को पुख्ता कर लिया, कानून पढ़ लिए तब घर वालों को अपने इरादों से अवगत कराया कि वहां रहना मुमकिन नहीं है, मुझे तलाक चाहिए....
 
बिजली गिरी और खूब कोसा गया। मैं एक दिन अपने सारे साजो सामान सहित अपने दोस्तों की मदद से दूसरे शहर के होस्टल में रहने आ गई। फिर शुरु हुआ संघर्ष.... शहर और होस्टल बदलने का... जहां मैं जाती वहां मेरे शौहर मेरी बदनामी का लिफाफा पहले पंहुचा देते....मैं यहां से वहां भटकी... अपनी बात हर किसी को समझाने की कोशिश की... 
 
फाइनली मैं अपने अम्मी अब्बू के पास लौट आई.. यहां भाभियां भी थीं ताने मारने वाली, घर की दूसरी औरतों के साथ... जब तलाक मंजूर हुआ तो मेरा सारा सामान रख लिया गया, मेरे अब्बू ने कहा, बेटी जिंदा रहे बहुत है, सामान का क्या है रखने दो उन्हें ही...
 
मुझे पता था अभी तो कर्जा भी नहीं उतरा है अब्बू का... मैंने अपने खर्चों को बचाकर बचत शुरू की, नौकरी की और दूसरे शहरों में भी अर्जी भेजती रही...सोचो जब पीएचडी का सपना पूरा हुआ तो मैं खुश नहीं हुई...बुक्का फाड़ कर रोई क्योंकि उसे मैंने कैसे कैसे हालातों से लड़कर पूरा किया यह मैं ही जानती हूं... हां आयशा, इसी बीच मेरे चरित्र पर लांछन लगे और हां मेरे जिस्म में भी एक नन्ही आहट सुन ली थी मैंने... भागदौड़, तनाव और 
झगड़ों की तंगदिल दुनिया में 'उसने' भी आने से इंकार कर दिया। मुझे चार माह का गर्भपात करवाना पड़ा.... 
 
पीएचडी हुई तो कॉलेजों में पढ़ाने के अवसर मिले। मैं मजबूत हुई तो मेरे साथ सब खड़े हो गए। मैं मजबूत हुई तो दुश्मन भी कमजोर हुए। मैं मजबूत हुई तो मैं फैसले भी ले सकी... हर हालात से मैंने खुद को बाहर निकाला, क्योंकि मैं जीना चाहती थी, जिंदगी से मुझे प्यार था, आज भी है बड़ी बात यह रही कि मैं हारी नहीं....मैं चीखी चिल्लाई भी नहीं... मैं अपना काम करती रही... कभी मन भर आया तो किसी सहेली के कांधे पर सर रख कर रो 
ली.... और फिर खड़ी हो गई....कि शायद इतने इम्तहान मेरी जिंदगी में इसलिए हैं कि परवरदिगार मुझे मुझे कोई मुबारक जिंदगी देगा.... 
 
और सुनो मेरी हमनाम आयशा, ऐसा हुआ भी... आज मैं जानीमानी युनिवर्सिटी में भाषा विभाग की हेड हूं, मुझे एक मकान भी मिला है, एक घर मैंने पिछले दिनों खरीद लिया है... मैंने अपने भाई और भाभी को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर दिया है, मैं अपने अम्मी और अब्बू के साथ रहती हूं... जब उन्हें कोई कहता है, तुमने अपनी तलाकशुदा लड़की को घर में बिठा रखा है तो वे जवाब देते हैं नहीं, हम अपनी बेटी के घर में बैठे हैं....यह बदलाव यूं ही नहीं आया मेरी आयशा, बहुत बार मर मर की जी हूं, बहुत बार टूट टूट कर उठी हूं, बहुत बार जर्रा जर्रा बिखरी हूं.... 
 
नदी मुझे भी दिखाई देती थी सपने में, रस्सी मेरे भी ख्वाबों में आई, आग मुझे भी बुलाती थी.... पर मैं उठकर मुंह धो लेती थी, अपने दोस्तों से बात कर लेती थी, जब मन हुआ जोर-जोर से रो भी लेती थी, जब मन हुआ झमाझम नाच भी लेती थी...मुझे बारिशों से प्यार था, मुझे किताबों में तैरना भाता था, मुझे मेरी बगिया फूल थमाती थी, मुझे अपने आसपास की बस्तियों में तालिम देना आ गया था...

मैं दोस्तों के साथ खिलखिलाकर हंसा करती थी, खूब देर तक हंसती थी, खूब चुटकुले याद रखती थी, शेरो-शायरी मेरी जुबान पर थिरकते थे... यह सब इसलिए कि मैं अपनी मोहब्बत भूला सकूं, एक गलत आदमी के साथ बने उस रिश्ते को आग में झोंक सकूं...ताकि मैं समाज को करारा जवाब दे सकूं... सुनो बची हुई आयशाओं, खुद लड़ो अपनी लड़ाई, तुम्हीं में हार छुपी है तुम्ही में जीत...
 
मैं एक जिंदा आयशा, जो किसी नदी में किसी आरिफ के लिए नहीं कूदी....     
प्रस्तुति : स्मृति आदित्य/ एक आयशा से बातचीत पर आधारित

आयशा, तुम बखेड़ा क्यों खड़ा कर गई?
बस ज्यादा बखेड़ा मत करना
प्रिय आयशा, तुम ही बताओ, महिला दिवस कैसे मनाऊं?
प्यारी आयशा, तुम अकेली थी तो दुनिया को महकाती...

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