अमर खनूजा चड्ढा

स्वतंत्र लेखिका
क्यों आयशा क्यों ? लेकिन यह क्यों तुम्हारे लिए भला क्यों कर होना चाहिए? यह तो समाज के ऐसे लोगों पर सजा व सबक़ की गाज बनकर...
अपने तप बल से, उठना है तुम्हें, अत्याचार तिरस्कार नफरतों की खाइयों दरिंदगी के नर्क से न सहना जुल्म वीरांगनी
कहीं नन्हे फरिश्ते नए रूप और शुभ बंधन लेकर आ रहे हैं। इस पूरे जीवनक्रम और सामाजिकता की बात करें तो पहले आंगन, तंदूर, कुएं...
मास्क रज्जन बी के हाथ में था ।उन्होंने ध्यान से देखा और मुराद से कहा ये नीला मास्क तो दो तीन धुलाई में फट जाएगा इसमें...
तू अभी भी यहीं कहीं है मेरे आसपास तभी तो मेरे जिस्म में दिखती तेरी रौशनाई है
अबकि जो आएगा वसंत, मैं जोगी को म ना लूंगी, महुआ बन बस जाऊंगी