गरिमा संजय दुबे

स्वतंत्र लेखिका
कुछ बुरे लोगों के कारण सब बुरे ठहरा दिए जाते हैं। उन पुरुषों को बहुत शुभकामना जो सहायक हैं, भावुक हैं, परिवार की रीढ़ हैं, जो पिता, बेटे, पति, भाई, दोस्त, प्रेमी, सखा बन स्त्रियों के जीवन की कठिनाई समझ उनके साथ चले हैं, सहयोगी रहे हैं।
विकृतियों किस व्यवस्था में नहीं होती हमारी वैवाहिक सामाजिक पारिवारिक ताने बाने में भी थीं, हैं भी, किंतु उन्हें दूर करने की कोशिशें भी हुई हैं, और बहुत कुछ बदला भी है। और क्या हर व्यक्ति विवाह और परिवार में शोषित पीड़ित ही है। कोई सुखी नहीं है, सफल स्त्रियों के पीछे पुरुषों के सहयोग का दृश्य क्या आपको...
गलती अलगाववादियों की नहीं, वो तो उनके मिशन पर थे। गलती उनको शह देने वाले, उनको गले लगाने वाले और कश्मीरी पंडितों को 30 वर्ष तक असहाय व बेबस छोड़ देने वाले लोगों की है। वे भी जो अपनी पसंद का विमर्श गढ़ते रहे हैं।
सभी स्वतंत्र हैं कुछ भी पहनने के लिए, किंतु संस्था गत व्यवस्था और अनुशासन तो धर्म से ऊपर की बात है, उसके पालन के लिए तो स्वतः प्रस्तुत हो देश की मुख्य धारा में शामिल होने की बात होनी चाहिए न कि अपनी धार्मिक पहचान की ज़िद। मुल्ला मौलवियों के इनाम का क्या कीजिएगा, शोषण होते रहने दीजिएगा, कल को जब...
हाँ हमने लता जी को गाते सुना है। सरस्वती साधिका ने बसंत चुना जाने को, कला का अंक 6 छठ तिथि, पूरी दुनिया को अपनी कला से मुग्ध, चमत्कृत करने के बाद ईश्वर ने अपनी इस विभूति को अपने में पुन: समाहित कर लिया है।
हम उस युग में हुएं हैं जिसमें लता जी के स्वर गूंजे हैं, इससे बड़ी जीवन की सार्थकता क्या होगी, जिसने लताजी को न सुना वो जन्मा ही नहीं, विश्वास नहीं हो रहा, विधाता क्या कभी कोई दूसरी लता का सृजन कर सकेगा ? और क्या सुर की वैसी विशुद्ध, दीर्घ साधना कोई कर सकेगा भला?
चेतना भाटी का हाल में प्रकाशित उपन्यास चंद्रदीप सहज स्त्री भावनाओं की अभिव्यक्ति है। उपन्यास बहुत बड़े कैनवास पर नहीं रचा गया है किंतु उसमें भी जिस तरह से विभिन्न भावनाओं को दर्शाया गया है वह सहज ही जेन ऑस्टीन की शैली को याद दिला देता है।
मुस्कुराहटें, मासूमियत कहीं बोझिल होती हैं भला, वह तो ज़िंदगी को हल्का फुल्का बनाती है। दुःख के घने सायों में मुस्कुराहटें ही तो वह जुगनू है जो जगमगाती है, रौशनी जगाती है, लेकिन ऐसे कैसे मुस्कुराती रही तुम आयशा कि तुम्हारी मुस्कुराहट हमारे दिल पर बोझ बनकर छा गई, तुम्हारी मासूमियत यूं उदास कर गई सारे...
एनकाउंटर को सही कहते हैं तो अपनी खुद की बनाई व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाने होते हैं, जिसने बरसों से न्याय में देरी की वो त्रासदियां रची हैं कि न्याय एक भ्रम लगने लगा है।
सुना करते थे, पढ़ा करते थे कि गांधी जी के पीछे पूरा देश चला, नेहरू जी के पीछे एक आज़ाद भारत चला, शास्त्री जी के कहने पर व्रत किया पूरे भारत ने, लोकनायक के पीछे युवा चल पड़े थे तो मन सोचता था कि कैसे किया होगा उस युग में जब प्रचार साधन भी इतने नहीं थे, ऐसा क्या तत्व होता है किसी में जो उसे मानव से नायक...
मैंने सुना तो आंखों और कानों पर विश्वास नहीं हुआ। आश्चर्य भी हुआ, कोई औरत इतनी बेबाकी, ईमानदारी और साहस के साथ एक अलग ही विचारधारा को बता रही थी।
तुम्हारी सीखने की ललक ही सबसे बड़े अंक है मेरे लिए। मैं कभी एक साथ तुम पर सचिन तेंदुलकर और सुन्दर पिचाई बनने का दबाव नहीं डालूंगी। माँ हूँ ,क्या तुम्हारी आँखों के सपने नहीं पढ़ सकती?
क्या विरोध करें,किसका विरोध करें, विरोध करने पर देखा न आपने किसी ने dp विवाद को जन्म दिया,किसी ने उसे मुंह काला करने की संज्ञा दी ,किसी ने भेड़ कहा,किसी ने भीड़ का हिस्सा...
हम सभी में आलोचना करने की प्रवृत्ति होती ही है किंतु दिन रात अपनी प्रशंसा व दूसरों की खामियों की चर्चा करना NPD के लक्षण हो सकते हैं। सावधान कहीं यह डिसऑर्डर आपको अपनी गिरफ्त में तो नहीं ले रहा।
यह बहस श्रृंगार के विरोध की है ही नही, बस इस बात को लेकर है कि कहीं श्रृंगार आपका जूनून तो नहीं, बिना मेकअप के आप बाहर निकलने में घबराती तो नहीं, कही आप ग़ुलाम तो नहीं हो गए, कहीं आपने अपने आंतरिक, नैसर्गिक, चारित्रिक सौन्दर्य से ऊपर दैहिक सौन्दर्य को तो नहीं रख दिया।
मंदिर की ही देहरी पर मां को स्तनपान करवाते करवाते नानीजी स्वर्ग सिधार गईं और मेरी मां अबोध एक वर्ष की बालिका स्तनपान करती रही, थोड़ी देर में जब कोई मंदिर आया था तब उसने नानी जी और मां को संभाला और गांव वालों और रिश्तेदारों को खबर दी। पढ़ें एक मार्मिक संस्मरण ....
एक बार फिर मूर्ख दिवस आसन्न है, और यकीन कीजिए किसी को मूर्ख बनाने और निंदा करने में जो परमानन्द है उसके आगे सकल सुख बौने है।
हिंसा, भय और असुरक्षा से उपजी पहली प्रतिक्रया है। मनुष्य जब अपने आस पास फैली कलात्मक अभिव्यक्तियों से डरने लगे, तो यह विचार असुरक्षा और भय की पराकाष्ठा है।
"पार्थ..तुम्हें जीना होगा" से प्रतिष्ठित साहित्यकार ज्योति जैन ने उपन्यास विधा में कदम रखा है, और अपने पहले ही प्रयास में उन्होंने राजनीति जैसे स्त्रियों द्वारा अपेक्षाकृत कम लिखे जाने विषय पर अपनी गहरी समझ और दृष्टि साबित की है।
“लेकिन हम तो जिंदा है ना.......? एंड टीवी पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक “गंगा” में एक दस साल की बच्ची का यह सवाल हमारे तथाकथित आधुनिक समाज को कटघरे में खड़ा करता सा नजर आता। बात कोई नई नहीं है और न ही मैं कोई पहली इंसान हूं, जो इस समस्या पर लिख रही हूं। लेकिन अब भी लिखना पड़ रहा है, यही एक प्रश्न है!