ज्योति जैन

लेखिका स्वतंत्र तथा वामा साहित्य मंच-इंदौर की सचिव हैं।
मेरे पापा तुमने चलना मुझे सिखाया... हाथ आज पकड़ता हूं.... मेरी गूं..गां... समझी तुमने.... आज शब्द में देता हूं .....
परलोक यदि होता है..और तुम वहां हो ...तो सुनो...! अगले जन्म में भी बेटी बनकर आना..मजबूत बेटी...और अपनी अम्मी का आंचल समृद्ध करना।
आज के बूफे के दौर से कुछ वर्षों पीछे जाकर यदि सोच सकें तो सहभोज की पंगत याद कर लीजिए.....।
अगर आप भी खुद को देशभक्त मानते हैं तो पहले अपने दिल पर हाथ रखकर इन बातों को पढ़ें क्या आप ऐसा करते हैं? अगर हां, तो आप सच्चे...
हेमेंद्र जी को बदहवास हालत में दोनों बच्चों को संभालते देख उनके घर से लौटी बेचैन सुवि सोच रही थी.. पत्नी के ना रहने से...
ज़र्द पड़ चुके चेहरे के साथ सिर पर सुर्ख़ चुन्नी ओढ़ते हुए सिमरन ने राजीव से कहा...'सुनो..! पूजा की थाली जरा करीने से सजाना...
यह सिंदूरी आभा लेकर..अष्टभुजा सी उर्जा पाएं...जग जननी तू...मैं घर की मां...
वेब सीरीज की विकृत और अनावृत (नग्न) भाषा बच्चों का बचपन झुलसा रही है... यह ना सिर्फ चिंता का विषय है अपितु अक्षम्य अपराध...
मंच पर बड़े-बड़े अक्षरों में कार्यक्रम का विषय लिखा था अपनी मातृभाषा हिन्दी को कैसे बचाएं। उसका मन कह रहा था कि हिन्दी...
सर आज इस दुनिया में नहीं है.. लेकिन उनके सिखाए पाठ सदा मेरे साथ रहते हैं। जीवन में शिक्षक तो बहुत मिले पर गुरु सिर्फ एक...
Exam सिर्फ स्कूल -कॉलेज ही नहीं...ज़िन्दगी भी लेती है..और सच्चा व आत्मविश्वासी विद्यार्थी ही उसमें सफल हो पाता है..।तो बस....!सारे...
लोक कला का ये पर्व संजा एक अलग ही सौंधी महक लिए आता था व सच्ची में बेटी की सी भावना लिए हम भावी माताओं का विदाई वाले दिन...
कोरोना काल में देश में लागू हर नियम का पालन करें। ताकि हम सब के सहयोग से जल्द ही इस महामारी के प्रकोप से देश बाहर आ सकें।
शशि की आदत थी महीने का बजट बनाने की। उन्होंने अपनी मां को यही करते देखा था। सुमेर को कोई मतलब नहीं था क्योंकि वे एक तय...
मां बनने की आहट ज़िन्दगी में कई बदलाव लाती है बेटा..... सिर्फ शारीरिक ही नहीं..... और भी कई.....। जब अपने परिजनों को ये शुभ सूचना...
बिटिया को भी ये संदेश इस कार्टून फिल्म के माध्यम से समझ आया कि क्रोध व दुख से वातावरण अच्छा नहीं होता ...सब निगेटिव होता...
तो बांटने की प्रथा को जारी रखते हुए.. आज बांटते हैं.. रोशनी..नन्हे दीप की.. जो जले मेरी देहरी पर,उजाला हो तेरे आंगन में .... जो...
कोरोना के कहर से चल रहे लॉकडाउन ने कई बातें सोचने पर मजबूर कर दिया है..। जिनमें से एक है मानवता की सेवा...समाज की सेवा...मुझे...
मुझे लगता है ये वो दिन हैं जब आप अपने जीवनसाथी के साथ बहुत खुबसूरत समय बिता सकते हैं..। अपने लिए तो हम हमेशा समय चुरा लेते...
गणतंत्र के इतने वर्षों में, क्या खोया क्या पाया है....खोने की तो फिक्र नहीं, पाने की चाह सब रखते हैं...सदियों के तप के बाद...