राकेशधर द्विवेदी

चारों तरफ दिख रहे हैं, दुनिया में नकाब लगाए लोग, आपसे मिलने, बतियाने से हाथ मिलाने से घबराते हुए
हिन्दी में बेरोजगारी पर कविता- मैं एक बेरोजगार हूं कर रहा बेगार हूं, बड़े-बुजुर्गों की आंख से मैं आज बेकार हूं। इम्प्लॉयमेंट...
दरवाजे पे आ जा चिरैया तोहे मुनिया पुकारे मुनिया पुकारे तोहे, मुनिया पुकारे
हम फिर से आएंगे तेरे शहर को बसाने, पर आज तुम न देखो, हमारे पैरों पर पड़े छाले, क्यों आंखें भर आईं हमारी, क्या-क्या हम पर है...
सदियों से प्रकृति के तमाम जीव-जंतुओं की दी जाती रही बलि, मनुष्य की जीभ की तुष्टि के लिए या
मैं एक सुबह उठकर निकल पड़ता हूं कार्यालय के लिए दौड़कर मेट्रो को पकड़ता हूं
महानगर के व्यस्ततम सड़कों पर घने कोहरे और हड्डियों को कंपा देने वाली शीत के मध्य बड़ी-बड़ी गाडियों में लोग गतिमान हैं
शहर के तमाम बुद्धिजीवियों कथाकारों और कवियों ने हिन्दुस्तान की समस्याओं को लेकर संगोष्ठी की मंच पर हिन्दुस्तान का...
स्कूल जाते बच्चों की मां, उठ जाती है बड़ा पछिलहरा में, कर देती है बच्चों का टिफिन तैयार , उन्हें नहा-धुला और दुलार कर बिठा...
मैं लखनऊ स्टेशन से बाहर निकलता हूं सामने लिखा हुआ है कि ‘मुस्कुराइए कि आप लखनऊ में हैं’ भूल-भुलैया और इमामबाड़े से
हमेशा मानव सभ्यताओं का विकास नदियों के तट पर हुआ शायद नदी यह समझती थी कि उसके बलिदान के द्वारा
वैसे तो हारना एक दु:खदायी क्रिया है लेकिन कभी-कभी यह सुखदायी भी हो जाता है।
लगता है कि आसमान में चांद छुपकर बादलों की ओट में छुप गया है शायद तुम छत पर निकल आई हो।
सुनो, सुन रहे हो ना तुम रोज तुम सबेरे मेट्रो से ऑफिस निकल जाते हो देर रात को घर खिसियाते हुए से आते हो
बात मुद्दत से जो थी आंखों में आज लबों पे उतर आई है तू मेरे इश्क की इबारत है तू इसे पढ़ न पाई है
वे देश के अन्नदाता हैं वो तमाम कष्ट सह पेट पालता है तमाम जनता का अकाल, ओलावृष्टि, अतिवृष्टि
मेरे आंसुओं से कहानी न पूछो वो तुमको भी आकर रुला जाएंगे झूठी कहानी और झूठा फसाना
ओस की बूंद आकाश से गिरकर, फूलों और पत्तियों पर ठहर जाएगी। रातभर रोया है चांद किसी की याद में, यह कहानी धरा
वैसे तो दोनों का नाम 'श' से प्रारंभ होता था एक शोषित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता था और दूसरा शोषक वर्ग का।
कागा तुम नहीं आते मेरे द्वार वर्षों पहले तुम आते थे अपनी कांव-कांव से यह बताते थे कि प्रिय घर आने वाले हैं।