विदेशी कप्तानों ने जमाई है धाक-चैपल

गुरुवार, 8 मई 2008 (19:13 IST)
इयान चैपल ने 1998 में ऑस्ट्रेलिया की एकदिवसीय ड्रीम टीम बनाई, जिसमें ग्रेग चैपल स्टीव वा और रिकी पोंटिंग जैसे खिलाड़ी थे लेकिन उन्होंने इस टीम की कप्तानी शेन वॉर्न को सौंपी थी यही वॉर्न आजकल इंडियन प्रीमियर लीग में अपनी नेतृत्वक्षमता का जलवा दिखा रहे हैं।

सिर्फ वॉर्न ही नहीं आईपीएल में जिस विदेशी ने भी टीम की कमान संभाली उसने अपनी टीम को जरूर सफलता दिलायी। शान पोलाक और एडम गिलक्रिस्ट इस सूची में आते हैं जिनकी कप्तानी में मुंबई इंडियन्स और हैदराबाद डेक्कन चार्जर्स ने जीत दर्ज करके आईपीएल में अपनी दावेदारी बनाए रखी है।

वॉर्न ने तो उस राजस्थान रॉयल्स को लगातार पाँच जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई, जिसे इस ट्वेंटी-20 टूर्नामेंट की सबसे कमजोर टीम माना जा रहा था। वॉर्न ने युवा खिलाड़ियों में जोश भरा और उनमें यह आत्मविश्वास भरा कि वह वास्तव में कुछ कर सकते हैं।

इयान चैपल ने 1996 में पहली बार वॉर्न को विक्टोरिया की तरफ से कप्तानी करते हुए देखा था। उन्होंने तब पूर्व कप्तान और लेग स्पिनर रिची बेनो को फोन करके कहा था कि रिची मैंने आज ऑस्ट्रेलिया का भविष्य का एक और लेग स्पिन कप्तान देखा।

चैपल को यह बात सालती है कि वॉर्न एक भी ऑस्ट्रेलिया की कप्तानी नहीं कर पाए। वह कप्तानी के प्रबल दावेदार थे, लेकिन मैदान के बाहर के उनके किस्सों के कारण उन्हें यह पद नहीं मिल पाया। वॉर्न को एक महिला को टेक्स्ट मैसेज भेजने के कारण 2000 में उप कप्तानी से हटा दिया गया था, तब उन्होंने कहा था क्या मैदान की बाहर की मेरी गतिविधियों का मतलब यह है कि मैं फ्लिपर या क्षेत्ररक्षण सजाना भूल गया हूँ।

इसी वॉर्न की कप्तानी आजकल चर्चा में हैं। हालाँकि वह अब भी मानते हैं कि इसें उनका योगदान न के बराबर है और जो कुछ भी कर रहे हैं वह टीम के युवा और अनुभवी खिलाड़ी कर रहे हैं। वॉर्न वैसे आईपीएल से भी अपनी कप्तानी का जलवा दिखा चुके हैं।

ऑस्ट्रेलिया की तरफ से उन्होंने जिन 11 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में टीम की अगुआई की, उनमें से दस में टीम जीती। इंग्लिश काउंटी हैंपशर की कमान संभालने के बाद इस काउंटी ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया।

वॉर्न की तरह ऑस्ट्रेलिया के एक अन्य खिलाड़ी एडम गिलक्रिस्ट को भी कभी राष्ट्रीय टीम की कप्तानी करने का मौका नहीं मिला। वह लंबे समय तक टीम के उप कप्तान रहे और उन्हें नियमित कप्तान के न खेलने पर ही यदाकदा टीम की अगुवाई का मौका मिला। आईपीएल में भी उनका भाग्य इसी तरह कप्तान बनने को लिखा था।

डेक्कन चार्जर्स के कप्तान वीवीएस लक्ष्मण जब घायल हो गए तो फिर उप कप्तान गिलक्रिस्ट ने चेन्नई सुपरकिंग्स के खिलाफ कमान संभाली और टीम को शानदार जीत दिलाई। यह सात मैच में टीम की दूसरी जीत थी।

मुंबई की कहानी भी लगभग ऐसी ही रही। सचिन तेंडुलकर ग्रोइन की चोट के कारण अब सातों मैच में नहीं खेल पाए हैं। मुंबई के लिए पहले तीन मैच में हरभजनसिंह ने कप्तानी की और इन तीनों में उसे हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका के पूर्व कप्तान शान पोलाक ने कमान संभाली और मुंबई अब दो मैच जीतकर अंक तालिका में पाँचवें स्थान पर पहुँच गया है।

अगर भारतीय खिलाड़ियों की कप्तानी की बात की जाए तो लक्ष्मण सबसे अधिक असफल कहे जाएँगे। उनकी कप्तानी में डेक्कन चार्जर्स ने जो छह मैच खेले हैं, उनमें से पाँच में उसे हार का सामना करना पड़ा। दूसरी तरफ युवराजसिंह की कप्तानी में किंग्स इलेवन पंजाब ने सात में से पाँच मैच जीते हैं।

भारतीय एकदिवसीय टीम के कप्तान महेंद्रसिंह धोनी तब तक तो सफल रहे थे, जब तक उनकी टीम में ऑस्ट्रेलियाई मैथ्यू हेडन और माइकल हसी तथा न्यूजीलैंड के जैकब ओरम थे, लेकिन उसके बाद उनका भाग्य साथ नहीं दे रहा है। शुरुआती चरण के सात मैचों में से टीम ने पहले चार मैच जीते, लेकिन उसके बाद लगातार तीन मैच में उसे हार मिली।

कोलकाता नाइट राइडर्स भी सौरव गांगुली की कप्तानी का जलवा नहीं देख पाया है, जबकि बेंगलूर रायल चैलेंजर्स के राहुल द्रविड़ को शायद कप्तानी रास नहीं आ रही है। दिल्ली डेयर डेविल्स के वीरेंद्र सहवाग जरूर कप्तानी का पूरा लुत्फ उठा रहे हैं।

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