कहां चूक गई मोदी सरकार की विदेश नीति? कैसे 'दलाल' पाकिस्तान ने ईरान-अमेरिका संकट में मारी बाजी

वेबदुनिया रिसर्च टीम

बुधवार, 8 अप्रैल 2026 (12:57 IST)
Modi Government Foreign Policy: अंतरराष्ट्रीय राजनीति की बिसात पर पाकिस्तान ने एक बार फिर अपनी प्रासंगिकता साबित कर दी है। ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ बनकर इस्लामाबाद ने दिल्ली को कूटनीतिक रूप से पीछे छोड़ दिया है। जानिए भारत की रणनीति में कहाँ रह गई कमी।

कूटनीतिक बिसात पर उलटफेर

पिछले एक दशक से भारत की विदेश नीति का मुख्य स्तंभ रहा है— 'पाकिस्तान को अलग-थलग करना'। लेकिन वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य (Geopolitics) को देखें तो बाजी पलटती नजर आ रही है। जहां एक तरफ भारत अपनी वैश्विक धमक का लोहा मनवाने की कोशिश कर रहा था, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान ने ईरान और अमेरिका जैसे धुर विरोधियों के बीच 'सेतु' (Bridge) बनकर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर दी है। ध्यान देने वाली बात है कि कैसे एक 'दिवालिया' देश ने कूटनीति के मैदान में भारत को पछाड़ते हुए खुद को मध्यस्थ के रूप में स्थापित कर लिया।

'दलाल' या 'उपयोगी वार्ताकार'? शब्दों की जंग के पीछे का सच

हाल ही में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेशवाहक की भूमिका निभाने के लिए पाकिस्तान को "दलाल" (Fixer) कहकर संबोधित किया। हालांकि यह शब्द अपमानजनक लग सकता है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इस तीखेपन के पीछे दरकिनार किए जाने की एक गहरी टीस छिपी है।


भारत बनाम पाकिस्तान : पहुंच का अंतर

मध्य पूर्व (Middle East) के संकट पर जहां एक ओर पाकिस्तान के पास 'सीट एट द टेबल' है, वहीं भारत की स्थिति थोड़ी असहज रही है: भारतीय खेमे ने संवाद का स्तर सिर्फ ट्रंप व अन्य देशों के प्रमुखों के साथ केवल एक औपचारिक फोन कॉल तक रखा। व्हाइट हाउस के साथ रणनीतिक और सीधी बातचीत में पाकिस्तान शुरू से सक्रिय रहा। भारत ने शुरुआती दौर में खुलकर इजराइल का पक्ष लिया। वहीं पाकिस्तान ने शुरू से ही वाशिंगटन और तेहरान के बीच 'शांति दूत' की भूमिका पर जोर दिया। भारत ने ग्लोबल एस्कलेशन के बयान अपनी रणनीति 'विश्व गुरु' की छवि पर अधिक ध्यान देने की रखी जबकि पाकिस्तान क्षेत्रीय संकट को सुलझाने के लिए जमीनी स्तर पर लगातार प्रयास कर रहा था।

1971 की यादें और पाकिस्तान की 'शांति योजना'

पाकिस्तान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठाकर एक बार फिर इतिहास दोहराने की कोशिश की है। 29 मार्च को इस्लामाबाद ने मिस्र, तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर युद्ध विराम पर चर्चा की। इसके तुरंत बाद चीन के साथ मिलकर 'पांच-सूत्रीय शांति योजना' जारी कर वैश्विक समुदाय को चौंका दिया। यह सक्रियता 1971 के उस दौर की याद दिलाती है जब पाकिस्तान ने ही अमेरिका और चीन के बीच ऐतिहासिक मुलाकात का रास्ता साफ किया था।

कहां चूक गई मोदी सरकार की विदेश नीति?

विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी सरकार की विदेश नीति 'जमीनी हकीकत' के बजाय 'घरेलू विमर्श' (Domestic Narrative) पर अधिक केंद्रित रही। मोदी सरकार हमेशा इलेक्शन मोड में रहती है, जिससे उनका ध्यान विपक्षी दलों और राज्यों तक ही सीमित रहा।

भारत के लिए संदेश

पाकिस्तान की इस कूटनीतिक सफलता ने नई दिल्ली के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई भी स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता, केवल 'हित' स्थायी होते हैं। पाकिस्तान ने अपनी 'उपयोगिता' बेचकर फिर से अंतरराष्ट्रीय मंच पर वापसी कर ली है। भारत के लिए अब चुनौती यह है कि वह 'विश्व गुरु' की छवि से आगे निकलकर वास्तविक वैश्विक संकटों में अपनी ठोस भूमिका कैसे तय करता है, ताकि वह फिर से हाशिए पर न धकेला जाए।
 

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