हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट पर रहा है राज परिवारों का दबदबा

Mandi Lok Sabha constituency of Himachal Pradesh: हिमाचल प्रदेश की मंडी लोकसभा सीट पर इस बार काफी रोचक मुकाबला देखने को मिल सकता है। कांग्रेस ने इस बार वर्तमान सांसद और शाही परिवार से ताल्लुक रखने वालीं प्रतिभा सिंह के स्थान पर उनके बेटे विक्रमादित्य सिंह को टिकट दिया है। इससे पहले प्रतिभा सिंह को ही उम्मीदवार बनाने के चर्चे थे, जबकि भाजपा ने बॉलीवुड 'क्वीन' कंगना रनौत को टिकट दिया है। 

विक्रमादित्य अभी हिमाचल सरकार में मंत्री भी हैं, जबकि उनकी मां प्रतिभा हिमाचल प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष हैं। कंगना भी मूलत: मंडी जिले की ही रहने वाली हैं। हालांकि इस सीट पर ज्यादातर राज परिवार से जुड़े उम्मीदवारों का ही दबदबा रहा है। 
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हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा सभी 4 सीटों पर कब्जा जमाया था, लेकिन बाद में एक सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस की प्रतिभा सिंह विजयी रही थीं, लेकिन उनकी जीत का अंतर 8 हजार 766 था। उस समय राज्य में भाजपा की सरकार थी, जबकि वर्तमान में यहां कांग्रेस की सरकार है। लेकिन, इस समय कांग्रेस अंदरूनी कलह में उलझी हुई है। आपसी मतभेदों का कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है।
 
हिमाचल कांग्रेस की अध्यक्ष प्रतिभा सिंह ने हालांकि पहले लोकसभा चुनाव लड़ने में अरुचि दिखाई थी, लेकिन बाद में वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार भी हो गई थीं, लेकिन ऐन मौके पर विक्रमादित्य को उम्मीदवार बना दिया गया।  

मंडी जातीय समीकरण : मंडी लोकसभा सीट पर जातीय समीकरण की बात करें तो सबसे ज्यादा राजपूत (ठाकुर) मतदाताओं की संख्या करीब 33 फीसदी है, जबकि 30 प्रतिशत के लगभग यहां अनुसूचित जाति के मतदाताओं की संख्या है। मतदाताओं की तीसरी बड़ी संख्‍या यहां ब्राह्मणों की है, जिनका प्रतिशत 21.4 है।

यदि कुल मतदाताओं की बात करें तो यहां पर 13 लाख 59 हजार मतदाता है. जिनमे 6 लाख 90 हजार पुरुष और 6 लाख 68 हजार महिलाएं शामिल हैं। सबसे ज्यादा बार इस सीट से राजपूत उम्मीदवार ही विजयी हुए हैं। हालांकि इस बार कांग्रेस और भाजपा दोनों के ही उम्मीदव राजपू‍त जाति के हैं।
मंडी लोकसभा सीट का इतिहास : मंडी सीट पर 17 बार लोकसभा चुनाव एवं 3 बार उपचुनाव हुए हैं। इनमें सर्वाधिक 14 बार कांग्रेस उम्मीदवार जीतने में सफल रहे, जबकि 5 बार यहां से भाजपा को जीत मिली। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी के गंगा सिंह विजयी रहे थे। देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर अहलूवालिया का संबंध भी मंडी से था, जिन्होंने भारत में एम्स की नींव रखी थी।
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1957 में यहां से राजा जोगिन्दर सिंह चुनाव जीते, जबकि कांग्रेस के ही ललित सेन 1962 और 67 में यहां से सांसद बने। 1971 में वीरभद्र सिंह यहां से पहली बार कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने। इसके बाद सिंह 1980 और 2009 में भी सांसद बने। वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह भी यहां से 3 बार लोकसभा चुनाव जीत चुकी हैं। वर्तमान में इस सीट से प्रतिभा ही सांसद हैं। 2014 और 2019 में यहां से भाजपा के रामस्वरूप शर्मा ने जीत हासिल की।
 
राज परिवारों का रहा है दबदबा : इस सीट पर 14 बार राज परिवार से जुड़े सदस्यों ने जीत हासिल की। सबसे पहले राज परिवार से जुड़ी राजकुमारी अमृत कौर इस सीट से चुनी गईं। इसके बाद राजा जोगिंदर सिंह, ललित सेन इस सीट से चुने गए। बुशहर रिसासत के राजा वीरभद्र सिंह और उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह 3-3 बार इस सीट से लोकसभा पहुंच चुके हैं। कुल्लू की रूपी रियासत के राजा महेश्वर सिंह भी भाजपा के टिकट पर यहां से 3 बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। 
यह लोकसभा क्षेत्र 6 जिलों के 17 विधानसभा क्षेत्रों में फैला हुआ है। इनमें भरमौर (चंबा), लाहौल-स्पीति (लाहौल-स्पीति), मनाली, कुल्लू, बंजार, अन्नी (कुल्लू), करसोग, सुंदरनगर, नाहन, सेराज, दरांग, जोगिंदरनगर, मंडी, बाल्ह, सरकाघाट (मंडी), रामपुर (शिमला) और किन्नौर (किन्नौर) शामिल हैं। इन विधानसभा सीटों में 12 पर भाजपा का कब्जा है, जबकि 4 पर कांग्रेस के विधायक हैं।  
 
क्या है मंडी का प्राचीन ‍इतिहास : ऐसी मान्यता है कि मंडी का नाम ऋषि मांडव्य के नाम पर पड़ा है। इसे 'वाराणसी ऑफ हिल्स' या 'छोटी काशी' या 'हिमाचल की काशी' के रूप में भी जाना जाता है। यहां का नवरात्रि मेला भी काफी प्रसिद्ध है। मंडी नगर की स्थापना अजबर सेन द्वारा 1527 में की गई थी। यह 1948 तक अस्तित्व में रही।
 
वर्तमान मंडी जिला 15 अप्रैल 1948 को मंडी और सुकेत रियासतों के विलय के बाद बना था। जनसंख्‍या के लिहाज से मंडी जिला शिमला के बाद राज्य का दूसरा सबसे बड़ा जिला है। मंडी राजधानी शिमला से 145 किलोमीटर उत्तर में स्थित है। यह पर्यटन की दृष्टि से काफी महत्व रखता है। 
 

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