दोस्ती : एक पवित्र रिश्ता

गायत्री शर्म
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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में रिश्तों के मायने पूरी तरह से बदल गए हैं। आज भाई भाई का व दोस्त दोस्त का दुश्मन बना बैठा है। पश्चिम के अंधानुकरण के कारण युवाओं में आज दोस्ती लफ्ज केवल 'प्यार' शब्द तक ही सीमित रह गया है।
वास्तविकता में दोस्ती प्यार से बढ़कर बहुत कुछ होती है। हमेशा स्त्री-पुरूष की दोस्ती 'प्यार' ही हो, यह आवश्यक नहीं। वह प्यार से भी बढ़कर एक पवित्र रिश्ता होता है।

यूँ तो हर कोई हमें अपना दोस्त कहता है, पर सच्चे दोस्त केवल खुशनसीब लोगों को ही नसीब होते हैं। आज भी हमारे आसपास कुछ लोग ऐसे हैं, जो दोस्ती की मिसाल बने हैं। उनकी दोस्ती के फसाने दुनिया दोहराती है। दूरियाँ भी उन्हें जुदा नहीं कर पातीं।

दोस्ती जिंदादिली का नाम है। यह एक ऐसा रिश्ता है जिसे दिल से जिया जाता है। इसमें औपचारिकता, अहंकार व प्रदर्शन नहीं बल्कि सामंजस्य व आपसी समझ काम आती है।

जीने का ढंग तूने सिखलाया,
तू है मेरा हमराज़, हमसाया।
तूने पढ़ लिए सारे राज़,
मैं बनी एक खुली किताब।

हमारी जिंदगी में बहुत से ऐसे राज होते हैं जिन्हें हम हर किसी को नहीं बता सकते। ऐसे में हम उन्हें अपने दोस्तों को बताते हैं। एक खुली किताब की तरह हम अपनी जिंदगी के सभी पन्ने उसके सामने खोल देते हैं और वह भी एक मार्गदर्शक बन हमें भटकाव से सही राह की ओर ले जाता है।
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सामंजस्य, समर्पण, समझ और सहनशीलता एक अच्छे दोस्त की पहचान होती है। दोस्ती में कोई अमीरी-गरीबी या ऊँच-नीच नहीं होती। इसमें केवल भावनाएँ होती हैं, जो दो अनजान लोगों को जोड़ती हैं।

कई बार परेशानियों के समय हमारा अपना पीछे हट जाता है तब दोस्त ही होता है जो हमें हिम्मत देकर हमारा साथ निभाता है। ऐसे ही वक्त में हमें अपने-पराए की पहचान होती है।

आपका सच्चा दोस्त आपकी जिंदगी बदल सकता है। वह आपको बुराइयों के कीचड़ से निकालकर अच्छाइयों की ओर ले जाता है। हमेशा आपकी झूठी तारीफ करने वाला और चापलूसी करने वाला आपका सच्चा दोस्त नहीं है।

सच्चा दोस्त वही है जो आपकी गलतियों पर पर्दा डालने के बजाय निष्पक्ष रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत करे। आपको आपकी बुराइयों से अवगत कराए। उसके कुछ कड़वे वचन यदि आपकी जिंदगी को बदल दें तो समझिए कि वही आपका सच्चा दोस्त है फिर उस दोस्त को कभी मत छोडि़एगा।