दक्षिणी दिल्लीः मुद्दे वही लेकिन चेहरे नए

बुधवार, 7 मार्च 2012 (01:21 IST)
चुनाव दर चुनाव, चेहरे जरूर बदल गए लेकिन मुद्दे अब भी वहीं हैं। हर बार भी तरह इस बार भी दिल्ली नगर निगम चुनाव में भी सफाई, पार्कों के रखरखाव, पार्किंग स्ट्रीट लाइट, आवारा पशु है। हालांकि कई वार्ड में इस बार अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने का मुद्दा अहम होने के आसार हैं।


चुनाव की तारीख की घोषणा होते ही दक्षिणी दिल्ली जोन में सरगर्मी बढ़ गई है। अमीर और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लोगों से मिले-जुले इस क्षेत्र में मुद्दों की भरमार है, लेकिन अधिकतर वार्डों में सफाई और अनधिकृत कॉलोनियों के नियमितीकरण का मुद्दा अहम है। अधिकतर नेताओं का मानना है कि महंगाई, भ्रष्टाचार आदि राष्ट्रीय मुद्दे निगम चुनाव में कारगर नहीं है। हालांकि कुछ लोगों का कहना है कि इन मुद्दों को गौण तो कतई नहीं कहा जा सकता, भले ही ऊपर से ये मुद्दे नजर नहीं आते हो लेकिन अंडर करंट तो है ही। सभी इलाकों में तो नहीं लेकिन कुछ इलाकों में तो बेशक ये मुद्दे नेताओं का भविष्य तय करेंगे।


सफाई, पार्कों के रखरखाव, स्ट्रीट लाइट, पार्किंग आदि मुद्दे पर निगम चुनाव के परंपरागत मुद्दे हैं, जो कमोवेश दक्षिण दिल्ली के सभी वार्ड में हैं। इस बार मुद्दों की कड़ी में अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने का मुद्दा जुट गया है।


वर्तमान पार्षद सरिता चौधरी का कहना है कि इस बार चुनाव में मुख्य मुद्दा अनधिकृत कॉलोनियों को नियमितीकरण होगा। दिल्ली सरकार आम जनता से साथ छल-प्रपंच कर रही है और अब लोग यह भलीभांति समझ गए है। उन्होंने कहा कि महंगाई, भ्रष्टाचार आदि राष्ट्रीय मुद्दे भी निगम चुनावों पर प्रभाव डालेंगे लेकिन चुनाव मुख्यतः स्थानीय मुद्दों पर ही लड़े जाएंगे।


दक्षिणी दिल्ली जोन में कई वार्ड उच्च और उच्च मध्यम परिवारवालों से अटा पड़ा है और यहां बड़े शॉपिंग मॉल और मार्केट हैं। वसंत विहार, ग्रेटर कैलाश, हौज खासइन इलाकों में सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है। एक परिवार में दो से तीन चार पहिया वाहन हैं। ऐसी स्थिति में पार्किंग एक बड़ी समस्या बनकर उबर रही है। इस चुनाव में यह मुद्दा जोर-शोर से उठने वाला है।


सफाई निगम चुनाव का सबसे पुराना परंपरागत मुद्दा है। निगम के आठ जोन में से पांच जोन में सफाई का जिम्मा निजी हाथों में दे दिया गया है। भाजपा जहां इसे उपलब्धि मान रहे हैं, वहीं कांग्रेसी पार्षदों का कहना है कि लोग इससे बेहद असंतुष्ट हैं।


रोशनपुरा वार्ड से कांग्रेसी पार्षद जयकिशन शर्मा का कहना है कि देहाती इलाकों में सुविधा प्रदान करने, सीलिंग, नक्शे पास कराना कुछ प्रमुख मुद्दे हैं। उन्होंने कहा कि निगम पर काबिज भारतीय जनता पार्टी ने विकास के नाम पर कुछ भी नहीं किया है। श्री शर्मा का कहना है कि निगम चुनाव पूरी तरह से स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, राष्ट्रीय मुद्दों का इन चुनावों में कोई भूमिका नहीं होती है।


दिल्ली नगर निगम चुनाव में मुख्य तौर पर कांग्रेस और भाजपा में सीधी लड़ाई है। हालांकि दक्षिण दिल्ली जोन का समीकरण दूसरे जोन से थोड़ा अलग है। अगर पिछले चुनाव के परिणाम पर गौर करें तो इस जोन में करीब 10 फीसदी सीटों पर इन दोनों पार्टियों का परचम नहीं लहराया था। 104 में से चार सीटों पर बहुजन समाजवादी पार्टी ने कब्जा किया था। वहीं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दो-दो सीटें हासिल की थीं। एक सीट इंडियन नेशनल लोक दल के खाते में एक सीट आई थी। इसके अलावा यहां से सात निर्दलीय उम्मीदवार भी विजयी रहे थे।


नेताओं और कार्यकर्ताओं की छवि और उनके काम भी निगम चुनाव में बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। चूंकि वार्ड छोटे होते हैं लिहाजा नेताओं और जनता के बीच सीधा संपर्क रहता है। लिहाजा सुनी-सुनाई बातों की बजाए नेताओं के कार्य ही आखिरकार काम आते हैं। साथ ही नेताओं की छवि भी बेहद महत्वपूर्ण होती है। जानकारों का कहना है कि निगम चुनाव का समीकरण लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पूरी तरह अलग है। यहां नेताओं को अपने मतदातों के हर सुख-दुख में शामिल होना पड़ता है। कई बार तो यह भी देखने को मिलता है कि नेताओं का सामाजिक होना उनके कामों पर बीस पड़ जाता है।


भले ही राजनीतिक दल निगम चुनावों को धर्म, जाति और क्षेत्रवाद से इतर मानते हो लेकिन हकीकत इससे अलग है। दक्षिणी जिले में प्रवासियों की संख्या बहुत अधिक है। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान के लोग बड़ी संख्या में दिल्ली आकर बस गए हैं। खासकर अनधिकृत कॉलनियों और ग्रामीण इलाकों में तो प्रवासियों की तदाद बहुत अधिक है। कहना गलत नहीं होगा कि निगम चुनाव ही नहीं विधानसभा और लोकसभा चुनाव के परिणाम भी काफी हद तक प्रवासियों के स्र्झान पर निर्भर करती है।


कस्तूरबा नगर से निवर्तमान पार्षद जगदीश मंमगई का कहना है कि निगम चुनाव में मुद्दे विभिन्न वार्ड में अलग-अलग होते हैं। खासतौर पर मतदाता पार्षद के पांच साल के कामों को देखते हैं। परफॉरमेंस के आधार पर उन्हें वोट मिलते हैं। नेताओं की ईमानदारी और सामाजिक छवि महत्वपूर्ण होती है।


कई निवर्तमान पार्षद तो यह भी कह रहे हैं कि उनके यहां मुद्दे ही नहीं है। उन्होंने इलाके में जितने काम किए हैं, इसलिए लोगों के समक्ष मुद्दे ही नहीं बचे हैं। वहीं विपक्षी पार्टी ने नेताओं का कहना है वार्ड में हर वह समस्या व्याप्त है जो निगम के दायरे में आती है।






ग्राफिक्स के लिए

कुल सीटें- 104

पिछले चुनाव के परिणाम

भाजपा-60

कांग्रेस-28

बसपा-4

झारखंड मुक्ति मोर्चा-2

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी- 2

आईएनएलडी-1

निर्दलीय व अन्य-7



कुल मतदाता-49.17 लाख

अनुसूचित जाति जनसंख्या-14 फीसदी



सीटों का बंटवारा

सामान्य -44

महिला - 45

अनुसूचित जाति-8

अनुसूचित जाति (महिला)-7

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