खुदा हाफिज़ चैप्टर 2: अग्निपरीक्षा- फिल्म समीक्षा

शुक्रवार, 8 जुलाई 2022 (15:05 IST)
विद्युत जामवाल हैं तो फिल्म में एक्शन होना जरूरी है क्योंकि विद्युत ने अपनी पहचान एक्शन स्टार के रूप में ही बनाई है। दिक्कत इस बात की है कि एक्शन सीन तो विद्युत को लेकर शानदार तरीके से रचे जाते हैं, लेकिन कहानी चुनने में कोई इतनी गंभीरता नहीं दिखाता। आखिर देखी-दिखाई कहानियों पर कोई कितनी बार फिल्म देखेगा जब तक कि प्रस्तुतिकरण दमदार नहीं हो। 
 
'खुदा हाफिज़ चैप्टर 2 : अग्निपरीक्षा' पहले भाग का सीक्वल है। जहां पर खुदा हाफिज़ 1 खत्म हुई थी, वहां से दूसरा भाग शुरू होता है। वैसे जिन्होंने पहला भाग नहीं देखा हो तो भी वे दूसरा भाग देख सकते हैं। खुदा हाफिज़ 1 में दिखाया गया था कि नरगिस (शिवालिका ओबेरॉय) को समीर (विद्युत जामवाल) खाड़ी देश से वापस लाता है जहां पर उसके साथ बलात्कार हुआ था। 
 
दूसरे भाग में दिखाया गया है कि नरगिस अब तक उस हादसे से बाहर नहीं आ पाई है। उसका ध्यान बंटाने के लिए नंदिनी (रिद्धी शर्मा) को समीर गोद लेता है। खुशियां लौटने वाली ही होती हैं कि फिर समीर-नरगिस के साथ हादसा हो जाता है। नंदिनी का अपहरण हो जाता है। समीर की जब पुलिस भी सहायता नहीं करती तो वह खुद ही दुश्मनों को सबक सिखाने के लिए निकल पड़ता है। 
 
कहानी में नई बात नहीं है और इस तरह की फिल्में सैकड़ों बार देख चुके हैं। अस्सी के दशक की एक्शन फिल्में इसी तरह की होती थी। खुदा हाफिज़ चैप्टर 2 : अग्पिरीक्षा सिंगल स्क्रीन सिनेमाघर के दर्शकों को ध्यान में रख कर बनाई गई है, लेकिन उस वर्ग के दर्शक भी शायद अब तक इस तरह की फिल्मों से तौबा कर चुके हैं। वे भी कहानी को कहने के तरीके में नयापन चाहते हैं, जो इस मूवी में नदारद है। खुदा हाफिज़ 2 की कहानी पहले भाग से मिलती-जुलती है और यह बात भी हैरान करती है।  
 
खुदा हाफिज़ चैप्टर 2: अग्निपरीक्षा एक रिवेंज ड्रामा है जिसकी खासियत विद्युत जामवाल के एक्शन सीन हैं। लेकिन फिल्म में एक्शन शुरू होने में काफी वक्त बरबाद किया गया है। फिल्म का पहला हाफ फैमिली ड्रामा है। यहां पर समीर के कैरेक्टर को स्थापित करने में लेखकों ने खासा समय खर्च कर दिया। यह फैमिली ड्रामा इतना अच्छा भी नहीं है कि दर्शक सब कुछ भूल जाएं। दर्शकों को इंतजार रहता है कि एक्शन शुरू हो, लेकिन इसके लिए आधी से ज्यादा फिल्म तक इंतजार करना पड़ता है। जब एक्शन शुरू होता है तब ही फिल्म में रोमांच पैदा होता है। 
 
निर्देशक फारूक कबीर प्रभावी तरीके से फिल्म को पेश नहीं कर पाए। जेल वाले एक्शन सीन और क्लाइमैक्स का चेज़ सीक्वेंस ही दमदार है। फारूक को रूटीन कहानियों को दमदार तरीके से पेश करने पर ध्यान देना चाहिए। 
 
विद्युत जामवाल एक्शन दृश्यों में जमे हैं। गुस्से का इज़हार करते हुए उन्होंने दुश्मनों को चटकाया है और ऐसा करते हुए ही वे अच्छे लगते हैं। ड्रामेटिक दृश्यों में उन्हें और मेहनत करना चाहिए। शिवालिका ओबेरॉय का किरदार ठीक से लिखा नहीं गया है। शीला ठाकुर के रोल में शीबा चड्ढा ने बेहतरीन एक्टिंग की है। 
 
गीत अच्छे लिखे गए हैं, लेकिन हिट वाली बात नहीं है। अमर मोहिले बैकग्राउंड म्यूजिक में खास कमाल नहीं कर पाए। जीतन हरमीत सिंह की सिनेमाटोग्राफी शानदार है। 
 
कुल मिलाकर 'खुदा हाफिज चैप्टर 2 अग्निपरीक्षा' एक साधारण फिल्म है।

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