पुस्तक के बहाने कथाकार ज्योति जैन का रचना संसार

Jyoti Jain Book Review
 
लेखिका ज्योति जैन साहित्य संसार में तेजी से लेकिन सरलता से उभरता वह चमकता नाम है जिसने साहित्य की लगभग हर विधा में स्वयं को सुव्यक्त किया है। वे जब लघुकथा लिखती हैं तो उनका प्रभाव देर तक और दूर तक दिखाई देता है। जब वे कविता लिखती हैं तो सुकोमल अनुभूतियां मन के भीतर छलछल बहने लगती हैं। उनकी कहानियों के पात्र सजीव होकर मानस में गहरी पैठ बना लेते हैं। 
 
मंदसौर में जन्मी ज्योति जैन की कर्मस्थली इंदौर रही है। देश-विदेश की लगभग हर साहित्यिक और सामाजिक पत्रिकाओं में वे प्रकाशित होती रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के हर माध्यम में उनकी सरस प्रस्तुतियां आती रही हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन के अनेक साहित्य और संस्कृति से जुड़े कार्यक्रमों में वे यशस्वी योगदान देती रही हैं। 
 
डिजिटल माध्यमों में भी उनकी सशक्त उपस्थिति दिखाई देती है। विश्व के प्रथम पोर्टल वेबदुनिया ने उन्हें अपनी स्वर्ण श्रेणी लेखकों में शामिल किया है। लघुकथा डॉट कॉम में उनकी रचनाएं प्रमुखता से शामिल हैं। कथाबिंब, समावर्तन, समांतर, मसि कागद, नारी अस्मिता, अहा जिंदगी, कथा सागर, गुंजन, फेमिना में उनकी रचनाएं दिलचस्पी के साथ पढ़ी और सराही जाती है। वामा साहित्य मंच की संस्थापक सचिव और वर्तमान उपाध्यक्ष हैं। निरंतर साहित्य के गरिमामयी आयोजन से अखबारों की सुर्खियों में बनी रहती हैं। 
 
ज्योति जैन के अब तक लघुकथा संग्रह, कहानी संग्रह, काव्य संग्रह, यात्रा संस्मरण व उपन्यास सहित 11 किताबों का प्रकाशन हो चुका है। अन्य कुछ पुस्तकें प्रकाशाधीन हैं।  
 
यद्यपि उनका लेखन नारी अस्मिता, तीज, त्योहार, पर्व, रिश्ते, संस्कृति, समाज, प्यार, साथ और तरल अनुभूतियों के आसपास होता है, तथापि नारी उत्पीड़न, भेदभाव, व्यभिचार, शोषण और विसंगतियों के खिलाफ भी उनका रोष सहज प्रकट होता है लेकिन मुख्य बात यह है कि कहीं पर भी वे अपना सौम्य रूप नहीं त्यागती, मर्यादा की परिधि नहीं लांघती... 
 
कई बड़े प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कार उनके खाते में दर्ज हैं। पारिवारिक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करते हुए वे अपने सृजन में आज भी उसी तरह तल्लीन हैं जैसे कोई नवागत लेखक होता है। उनमें ऊर्जा, उत्साह, सहजता, सौम्यता और प्रखरता का जो विलक्षण संयोजन है वही उन्हें विशिष्ट बनाता है और उनके लेखन को भी भीड़ से हटकर एक गरिमा प्रदान करता है। 
 
पुस्तक के बारे में : 
लब्ध प्रतिष्ठित कथाकार और संवेदनशील रचनाकार ज्योति जैन के ताजा लघुकथा संग्रह ने साहित्य संसार में अपनी निन्यानवे (99) रचनाओं के साथ दस्तक दी है। 
 
शीर्षक सहज ही आकर्षित करता है 'निन्यानवे के फेर में'....हम सभी कहीं न कहीं इसी निन्यानवे के फेर में पड़े हैं...शीर्षक जिस तत्परता से आपको बुलाता है कथाएं उतनी ही पाठकीय संतुष्टि और शीतलता देती हैं। ज्योति जैन की प्रतिनिधि लघुकथाओं के साथ कुछ ताजातरीन रचनाएं भी इसमें शामिल हैं।  
 
कथाकार ज्योति की इन लघुकथाओं में सामाजिक विद्रुपताओं का कठोर चित्रण है और  रिश्तों की कोमलता का मधुर स्पर्श भी... वे अन्याय के विरुद्ध आवाज भी उठाती हैं और समयानुरूप अपनी खामोशी से खलबली भी मचाती हैं। नारी अस्मिता, गरिमा और अस्तित्व को उनकी ये लघुकथाएं पूरी ताकत से स्थापित करती हैं, प्रतिष्ठित करती हैं। 
 
सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि वे स्वयं अपने अस्तित्व को लेकर सजग हैं इसलिए यही सजगता उनकी लघुकथाओं में भी सहज परिलक्षित होती है। इन लघुकथाओं में सामाजिक समरसता अपनी पूरी सरसता के साथ उपस्थित हैं। आपकी रचनाओं में रस है, रंग है, सुगंध है, स्नेहबंध है, रिश्तों के महीन लेकिन मजबूत तानेबाने हैं, प्रकृति की सुरम्यता है, अगाध प्रेम की प्रगाढ़ता है। 
 
उनकी लघुकथाएं सूई की नोंक की तरह अंतर्मन को बींध जाती हैं और मन के ही किसी कोने से अनुभूतियों के झर झर झरने भी बहा देती हैं। रचनाओं के केन्द्र में देश, काल परिस्थिति भी उसी तरह मुखरित है जैसे मानव मन की बारीक परतें... पहली ही लघुकथा 'जननी जन्मभूमिश्च' कश्मीर समस्या पर भावुकता के साथ एक फौजी का पक्ष उकेरती है। जब काश्मीरी बच्चा कहता है आप मेरी अम्मी को कुछ करोगे तो मैं आप सबको खत्म कर दूंगा तो एक विनम्र स्वर आता है, शांत हो जा बच्चे, अपनी मां की रक्षा करना तुम्हारा धर्म है और बेटा हम भी तो वही कर रहे हैं... और फिर बच्चे के हाथ का पत्थर गिरता रहा... 
 
अलादीन का चिराग' कथा बड़ी रोचक पंक्ति के साथ से यह संदेश देती है कर्म ही पूजा है..और वह पंक्ति है ..मेरे पास जिन्न होता तो मैं उससे कहता वापिस चिराग में जाकर बैठ जा, क्यों लोगों को निकम्मा बना रहा है? 
 
सामाजिक विडंबना, समस्या, परिवेश, धर्म, राजनीति, पर्यावरण, नैतिकता व चालाकियों के चुस्त और चमत्कारी दृश्य लेखिका ने इतनी कुशलता से उकेरे हैं कि पाठक बरबस ही बंध जाता है और स्वयं को सामने उभरते दृश्य का ही हिस्सा पाता है।  
 
ये लघुकथाएं जब सामने से गुजरती हैं तो सहज ही हम ठिठक जाते हैं कुछ पंक्तियों के साये में... 
 
जैसे : रेशम रेशम को नहीं काटता पर मांझा मांझे को काट देता है, 
भगवान राह दिखाते हैं या रोकते हैं,
हिन्दी मातृभाषा है या मात्र एक भाषा, 
धागे कच्चे सही पर आस्था इतनी मजबूत है कि रिश्तों को स्वत: पक्का बना देती है। 
इस तरह के जीवन को सुबोध बनाती पंक्तियां मन के भीतर जाकर बहने लगती है तो कहीं जोरदार पंच मस्तिष्क की शिराओं को सुन्न कर देते हैं...पुस्तक निन्यानवे के फेर में हर लिहाज से पठनीय और संग्रहणीय है। 
पुस्तक की साजसज्जा आकर्षक है। प्रकाशक ने लेखिका की प्रस्तुति को मनोयोग समेटा है।
 

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