हिन्दी आलेख : एक सफर ऐसा भी

शिवानी गीते
हर रोज सुबह हम सभी एक नया सफर तय करते हैं। हमारी मंजि‍ल भले ही अलग होती है, लेकिन कहीं न कही, कभी न कभी हमारे रास्ते जरूर टकरा जाते हैं। घर से निकलते वक्त दिमाग में बस एक ही बात होती है कि किसी भी तरह अपनी मंजि‍ल तक पहुंच जाएं। लेकिन उस मंजि‍ल तक पहुंचने का रास्ता कितना मुश्किल होता है हम सभी जानते हैं। सभी घर से निकलते हैं, कोई स्कूल जाने के लिए, किसी को ऑफिस, तो किसी को कॉलेज जाने कि जल्दी होती है। हमें जल्दी से जल्दी अपने-अपने ठिकानों तक पहुंचाने का काम करते हैं सार्वजनिक वाहन जैसे - वैन, आई बस, सिटी बस आदि।
 
ये सभी हमारे जीवन का एक हिस्सा हैं। इनके बिना तो हमारा काम ही नहीं चलता, पर इनमें सफर करना कोई आसान बात नहीं है। सबसे पहले तो जनाब आपको इन वाहनों में अपने लिए लड़ झगड़कर जगह बनानी पढ़ती है। इतनी भीड़ में सीट मिलने की जद्दोजहद और ऊपर से गुटखा खाकर, अरे! कहा जाना है, आंटी १० रुपये लगते  है, स्टेशन-स्टेशन कर जोर-जोर से कर्कश आवाज में चिल्लाने वाले वैन और बस कंडक्टरों को झेलते हुए आप कब अपनी मंजि‍ल पर पहुंच जाते हैं, आपको पता ही नहीं चलता। चलो अब आप अपनी मंजिल पर पहुंच भी गए, तो भइया अब छुट्टे पैसों की दिक्कत को लेकर वैन वाले कंडक्टर से तो आपकी भी कभी न कभी अच्छी खासी बहस हुई ही होगी। 
 
बस का सफर भी बड़ा यादगार होता है, बस में इतनी भीड़ में खड़े रहकर ब्रेकर आने पर एक दूसरे पर गिरना ऐसा लगता है मानो किसी एम्यूज़मेंट पार्क में रोलर कोस्टर राइड का मजा ले रहे हों। लेकिन भइया यह वैन ड्राइवर इतनी मुश्किलों के बाद भी आपके मनोरंजन का पूरा ध्यान रखते हैं। अब आप पूछेंगे वो कैसे, तो वो ऐसे कि इनके पास अपना एक अलग ही बॉलीवुड गानों का कलेक्शन होता है, जो अपने पहले कभी नहीं सुने होंगे, जिसे सुनाकर ये आपके बेरंग जीवन में खुशियों की नई लहर भर देते हैं और इस पर कई बार आप कह देते हैं कि भैया इतनी खातिर मत करो अब ना हो पाएगा। 
 
लेकिन इस भीड़ में धक्के खाने का अपना ही मजा है। विचित्र-विचित्र प्राणियों को देखने का मौका मिलता है आपको, आप सभी रोज इनमें सफर करते हैं और अब इनकी आपको आदत भी हो गई होगी। लेकिन अगर आपने अब तक इन वैन या सिटी बस में सफर नहीं किया है, तो आपने अब तक जिंदगी जी ही नहीं है।तो चलिए ना... करते हैं, एक सफर ऐसा भी! 

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