कदम बहके-बहके, जिया धड़क-धड़क जाए...

- अजातशत्रु

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जन्मजात बहरे भी बिना बहस के मानने को तैयार हैं कि विषादपूर्ण गीतों और गजलों को पथरीली-बर्फीली सघनता देने में मदनमोहन का जवाब नहीं रहा। ऐसा लगता है जैसे वहाँ साक्षात वेदना मदनमोहन का सितार और लता का कंठ बनकर गा गई। बहुत कम लोगों ने उतनी ही शिद्दत से यह महसूस किया होगा कि अटूट खुशी और उद्दाम उल्लास के प्रवाहमय, कर्णप्रिय गीत रचने में भी मदनमोहन ने उतनी ही विस्मयकारी सिद्धहस्तता दिखाई है। खिले हुए मोगरे से इन हरहराते- भागते गीतों को सुनें तो थकान जाने कहां उड़ जाए और पत्थरों के बुत कहकहा लगाकर आँखें खोल दें।

कर्णामृत की इन घनघोर बरसातों पर गौर करें- दुपट्टा मेरा मलमल का (अदालत)/ मेरी हिरनी जैसी चाल (जेलर)/ चूड़ी खनके चलूँ मैं जब तनके (एक शोला)/ जुलम लेके आया...मोहब्बत का जालिम जमाना (खजांची)/ कैसे समझाऊँ पिया तुमको मनाऊँ पिया (शेरू)/ नैनों वाली ने हाय मेरा दिल लूटा (मेरा साया) व आँखों-आँखों में हो गए मस्त इशारे (खजाँची, दोनों गीतों की एक ही धुन)/ चला दिलदार वई-वई (दुनिया न माने)/ ये तो बता रसिया (फिफ्टी-फिफ्टी)/ माने ना...हाय बलम परदेसिया (जागीर) और मोरी पायल गीत सुनाए (बाप-बेटी) वगैरह। इन गीतों में खासतौर पर ढोलक और तबला मेलडी का ऐसा अंधड़ लेकर चले हैं कि लाशें उठकर नाचने लगें। मजाल क्या कि पत्तों पर उदासी नामक धूल चिपकी रह जाए।

मदनमोहन पंजाबी थे। पौरुषमय पंजाब की उद्दाम ऊर्जस्विता वे खून में लाए थे। इसी के साथ उन्हें विरासत में मिला था- अल्हड़ता, आह्लाद और यौवन के विस्फोट से भरा हुआ पंजाबी फोक। नतीजा यह हुआ कि मदनमोहन के अवचेतन ने जब नृत्य गीतों की धुनें और उनका संगीत रचा तो नसों में मिठास और शबाब की बिजली फूँक दी। नैयर और मदनमोहन- दो पंजाबी- इस क्षेत्र में खड़े-खड़े हिन्दुस्तान लूट गए। 'गीतगंगा' में हम जिस मेलडी का जिक्र कर रहे हैं, उसे कोकिलकंठी लता ने गाया है। गीत उनके प्रवाहमय, लोचदार आलाप से शुरू होता है और फिर वे साजों की मधुर लीड मिलने के बाद शब्दों में बहने लगती हैं। पूरा गीत नृत्यप्रधान है, उसके चढ़ते-उतरते रिदम दिल को आह्लाद की पैंगों में उछालते-गिराते चलते हैं।

धुन तो खैर मनमोहक है ही- वायलिन, गिटार और ढोलक की मधुर रवानी वाद्यसंगीत को भी उतना ही प्रीतिकर बना देती है। यह सोने में सुहागा है क्योंकि इससे संपूर्ण प्रस्तुति का माधुर्य कई गुना बढ़ जाता है। समझ में नहीं आता किस पर न्योछावर हो जाएं- आर्केस्ट्रा पर या गायन पर। संगीतकार मदनमोहन पर या माधुर्य के जीते-जागते चमत्कार लता मंगेशकर पर। यहाँ से वहाँ तक सुरीलेपन की बहार है, मिठास का निर्झर है। लचकते आह्लाद की उठती-गिरती नदी है, स्वास्थ्य, प्रफुल्लता और उमंग की बाढ़ है और हरे-भरे जंगलों में चमकती हुई बिजली की मीठी लपक है। ऐसा लगता है जाने कितनी सदियों से हम फॉसिल बने बैठे थे और कैसे स्वर किन्नरी की उफनती हुई गंगा ने हमें गुदगुदाकर जिंदा कर दिया।

गीत कई साल पुराना है पर कानों में पड़ जाए तो उदासी और थकान सौ-सौ ढंग से अहसानमंद होकर जीवंतता और स्फूर्ति को धन्यवाद देते हैं। साफ लगता है कि इस अधमरे दौर के लिए लता संजीवनी हैं और मदनमोहन वैद्य हैं। पढ़िए गीत की इबारत। फिल्म थी- 'बैंक मैनेजर' और गीत को लिखा था इंदीवर ने (वैसे मदनमोहन के लिए ज्यादातर गीत राजेंद्रकृष्ण और राजा अली मेहंदी खां ने लिखे हैं)।

कदम बहके-बहके जिया धड़क-धड़क जाए
कदम बहके-बहके जिया धड़क-धड़क जाए
प्यार तेरी दुनिया में हम भी चले आए

कदम बहके-बहके जिया धड़क-धड़क जाए
प्यार तेरी दुनिया में हम भी चले आए
कदम बहके-बहके जिया धड़क-धड़क जाए!

किसने कहो हलचल-सी दिल में मचा दी
नजरों ही नजरों में दुनिया दिखा दी
(अंतरे की दोनों लाइनें फिर से)
आँखों में लाख मेरी दीये झिलमिलाए
कदम बहके-बहके...हम भी चले आए
कदम बहके-बहके जिया धड़क-धड़क जाए!

हाथों में दिल लेके पास कोई आया
लाज लगे मुझको कोई ऐसे मुस्कराया
(दोनों लाइनें फिर से)
साँस रुकी जाए मेरी नजर झुकी जाए,
कदम बहके-बहके...हम भी चले आए
कदम बहके-बहके जिया धड़क-धड़क जाए!

नया-नया कोई जादू-सा कर गया है
दुनिया की खुशियाँ दामन में भर गया है
(दोनों लाइनें फिर से)
मैं दिल को संभालूँ ये उड़ा-उड़ा जाए
कदम बहके-बहके...हम भी चले आए
कदम बहके-बहके, जिया धड़क-धड़क जाए!

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इतनी अनुपम मेलडी है यह कि सब झूठा लगने लगता है- यह संसार, यह धरती, ये चाँद-सितारे और भरी दोपहरी में पूनम की नींद सुला जाने वाली लता खुद। लगता है, जाने कब-से हम मरे पड़े हैं। जाने किस लोक में यह गीत हो रहा है। जाने कितने सपनों पार से हमारी आदि-निद्रा इसे सुन रही है। यह लता और मदनमोहन द्वारा गढ़ा हुआ तिलिस्म था। मधुर गायन और कर्णप्रिय वाद्य संगीत के मार्फत, कि हम एक अलौकिक अनुभव को छू जाते हैं और पलभर को 'विदेह' हो जाते हैं। आगे इससे अधिक हम कुछ नहीं कह सकते कि लता और मदनमोहन एक अहसान का नाम है, जिसे करीम (कृपापूर्ण) आसमान ने दुःख से भरी हुई जमीन पर किया और कराहते घायलों को गुदगुदा दिया।

बदकारी भी तेरे दम से थी
अब क्या खंजर उठाए कोई