ठंड पर दोहे: आंगन में जलने लगा

सुशील कुमार शर्मा

शुक्रवार, 16 जनवरी 2026 (17:01 IST)
कुहरे की चादर तनी, सिमटी धूप उदास।
तन मन सब ठंडा हुआ, थर थर कांपे श्वास।
 
आंगन में जलने लगा, किस्सों भरा अलाव।
ठंड सिखाए साथ में, रिश्तों का पहनाव।
 
सुबह धुंध से घिर रही, रात हुई चुपचाप।
ठंड ओढ़ कर आ गई, स्मृतियों के आलाप।
 
ठंड भरी मुस्कान में, अपनेपन का ताप।
रिश्तों में गर्मी बढ़ी, बढ़ा चाय का जाप।
 
नदिया खड़ी किनार पर, चुप है उसकी धार।
धीमी कर दी ठंड ने, समय तेज रफ़्तार।
 
सूखी टहनी पेड़ की, कुहरे का परिवेश।
ठंड सिखाती धैर्य का, मौन भरा उपदेश।
 
गरम रजाई में छुपे, बड़े बड़े बलवान।
ठंड मात्र अब एक ही, खड़ी है सीना तान। 
 
चाह चाय की चित्त में, जागा मन का राग।
गरम पकोड़े देख कर, ठंड रही है भाग।
 
रात ठिठुर कर कह रही, सुन ले मन की बात।
फटी रजाई झेलती, ठिठुरन के आघात।
 
कंबल में लिपटा हुआ, सपना देखे भोर।
ठंड ठठा कर हंस रही, धीमे हैं सब शोर।

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