सोलर जियोइंजीनियरिंग: क्या धरती को ठंडा कर सकते हैं?

DW

शनिवार, 18 सितम्बर 2021 (08:50 IST)
रिपोर्ट: टिम शाउअनबर्ग
 
तेजी से गर्म हो रही पृथ्वी को ठंडा करने के लिए वैज्ञानिक नए-नए तरीकों पर काम कर रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या ग्लोबल वॉर्मिंग को वाकई रोका जा सकता है या यह सिर्फ भ्रम है?
 
हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी के डेविड कीथ कहते हैं, 'इसमें कोई संदेह नहीं है कि इंसान इस धरती को कृत्रिम तरीके से ठंडा कर सकते हैं।' कीथ सोलर इंजीनियरिंग विषय में शोध करते हैं। यह बहुत ही विवादास्पद विषय है। इसलिए कि जलवायु परिवर्तन को धीमा करने के लिए इंसान पृथ्वी पर सौर विकिरण में हेरफेर कर सकते हैं या नहीं, यह सिर्फ शोध और खोज पर निर्भर करता है। यहां 3 अलग-अलग तरह के विचार हैं जो काम कर भी सकते हैं और नहीं भी।
 
ज्वालामुखी की शक्ति की नकल
 
जब 15 जून 1991 को फिलीपींस में पिनातुबो ज्वालामुखी फटा, तो कई टन राख और गैस वातावरण में मीलों तक फैल गए। यह सदी का दूसरा सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट था। कई वैज्ञानिकों को हैरानी हुई कि इस घटना ने अगले कुछ महीनों में पृथ्वी को लगभग आधा डिग्री सेल्सियस तक ठंडा कर दिया।
 
हवा में मौजूद छोटे कणों को एरोसोल कहा जाता है जो सामान्य परिस्थितियों की तुलना में सूर्य के प्रकाश ज्यादा मात्रा में अंतरिक्ष में परावर्तित करते हैं। इसकी वजह से ग्लोबल वॉर्मिंग में कमी होती है।
 
कीथ जैसे वैज्ञानिक इस ज्वालामुखी प्रभाव की कृत्रिम रूप से नकल करना चाहते हैं। इसके पीछे के सिद्धांत को स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन (एसएआई) के रूप में जाना जाता है। इसमें पृथ्वी की सतह से 15 से 50 किलोमीटर के बीच समताप मंडल में सल्फर एरोसोल को फैलाना शामिल है। सैद्धांतिक रूप से, यहां एरोसोल, पानी के कणों के साथ मिलेगा और अगले एक से 3 वर्षों तक सूर्य के प्रकाश को सामान्य से अधिक परावर्तित करेगा।
 
कीथ कहते हैं, 'मूल रूप से हर एक जलवायु मॉडल से पता चलता है कि अगर आप समताप मंडल में एरोसोल को चारों ओर फैलाते हैं, तो आप जलवायु से जुड़े खतरों को कम कर सकते हैं। इसलिए, पानी की उपलब्धता में बदलाव से तापमान बदल सकता है।'
 
ऐसे में पृथ्वी को स्थायी रूप से ठंडा करने के लिए, एरोसोल को दशकों तक समताप मंडल के बड़े क्षेत्र में फैलाने की आवश्यकता होगी। इसके लिए, गुब्बारे, तोप, हवाई जहाज और यहां तक कि विशाल टावरों की जरूरत होगी।
 
हालांकि, काफी आसान दिखने वाले इस समाधान के कई खतरे भी हैं। कुछ वैज्ञानिकों को डर है कि इससे मौसम काफी ज्यादा ठंडा या गर्म हो सकता है। साथ ही, अम्लीय वर्षा (एसिड रेन) हो सकती है या ओजोन परत को नुकसान पहुंच सकता है। आलोचक इस तकनीक को संभावित जलवायु हथियार के तौर पर भी देखते हैं।
 
इस वजह से, अभी तक शायद ही इस तकनीक का परीक्षण किया गया है। रिसर्च प्रोजेक्ट 'एससीओपीईएक्सट' में कीथ भी शामिल हैं। इस प्रोजेक्ट के तहत इस साल स्वीडन में गुब्बारे की मदद से तकनीक का परीक्षण करने और इसके प्रभावों को जानने की योजना बनाई गई थी। हालांकि, स्थानीय समुदायों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध के बाद, अंतिम समय में इस परीक्षण को रद्द करना पड़ा।
 
समुद्र को आईने की तरह इस्तेमाल करना
 
यह सुनने में अविश्वसनीय लगता है, लेकिन कुछ वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि समुद्र के बड़े हिस्से को कृत्रिम झाग से ढककर धरती को कैसे ठंडा किया जाए। इस प्रक्रिया को 'ओसियन फोम' या 'माइक्रो बबल' के रूप में भी जाना जाता है।
 
पृथ्वी की सतह का लगभग 70% भाग महासागर से ढका हुआ है। जैसे-जैसे पानी की गहराई में जाते हैं वहां अंधेरा होता जाता है। यहां सूरज की काफी कम रोशनी पहुंचती है और काफी ज्यादा गर्मी जमा होती है। गहराई जितनी कम होती है उतनी ही कम गर्मी होती है। इसे एल्बिडो इफेक्ट कहते हैं। इस इफेक्ट को पानी पर भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
 
सैन डियागो स्थित कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में जलवायु वैज्ञानिक कोरी गेब्रियल बताते हैं, 'समुद्र में सूक्ष्म बुलबुले की मदद से झाग बनाकर, सौर विकिरण के कुछ हिस्से को परावर्तित करने का विचार है। इसे उन हिस्सों में लागू करना है जहां आप संभवतः जलवायु परिवर्तन के कुछ नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।'
 
सैद्धांतिक रूप से, यह झाग गहरे पानी की सतहों की तुलना में सूर्य के प्रकाश को 10 गुना अधिक परावर्तित कर सकता है। पर्याप्त झाग की मदद से, धरती को 0।5 डिग्री सेल्सियस तक ठंडा किया जा सकता है। कुछ वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि विशेष जहाजों की मदद से झाग पैदा किया जा सकता है या दुनिया भर के कंटेनर जहाज इसे समुद्र के विभिन्न हिस्सों में पैदा कर सकते हैं।
 
हालांकि, इस तरीके के बारे में ज्यादा खोज नहीं की गई है। अभी इसे लागू करना दूर की कौड़ी है। साथ ही, इस झाग से समुद्री जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में पर्याप्त शोध नहीं हुआ है। जलवायु के साथ-साथ स्थानीय मौसम की घटनाओं पर इसके संभावित प्रभावों को भी नियंत्रित करना बहुत मुश्किल होगा।
 
शहरों को सफेद रंग से रंगना
 
दुनियाभर के कई शहरों में गर्मियों के दौरान तापमान काफी अधिक बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, आसपास के इलाकों की तुलना में न्यूयॉर्क में दिन में औसत तापमान 1 से 3 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है। शाम में यह 12 डिग्री सेल्सियस तक भी बढ़ जाता है। इसकी वजह है कि अंधेरी छतें, सड़कें और फुटपाथ उन क्षेत्रों की तुलना में ज्यादा गर्म हो जाते हैं जहां पेड़-पौधे हैं। 
 
हमारे पास पहले से ही इस समस्या का समाधान है। वह है घरों और छतों को सफेद रंग से रंगना। यह सुनने में जितना आसान लगता है उतना ही सस्ता भी है। इसका असर भी देखने को मिलता है। एक सफेद छत काली छत की तुलना में लगभग 30% अधिक ठंडी होती है। गर्मी को कम करने के लिए यह लंबे समय से अफ्रीकी, अरब और दक्षिणी यूरोपीय देशों में वास्तुकला का हिस्सा रहा है।
 
ईटीएच ज्यूरिख में जलवायु वैज्ञानिक सोनिया सेनेविरत्ने बताती हैं, 'ऐसा करने से स्थानीय तापमान को औसतन 1 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है। जाहिर है कि यह औसत संख्या है। गर्मी के दिनों में इसका ज्यादा प्रभाव देखने को मिल सकता है।'
 
न्यूयॉर्क सिटी में कूलरूफ्स पहल के तहत, 2009 के बाद से शहर में 1 मिलियन वर्ग मीटर से अधिक छत पर सफेद रंग से रंगा गया है। सफेद रंग में रंगने से न केवल घर और आसपास के क्षेत्र ठंडे होते हैं, बल्कि इससे ऊर्जा की भी बचत होती है। इन घरों में रहने वाले लोगों को एयर कंडीशनर का इस्तेमाल कम करना पड़ता है।
 
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि अगर दुनिया भर में सभी छतों और फुटपाथों को सफेद रंग से रंग दिया जाए, तो इससे कोयले से चलने वाले 700 मध्यम आकार के बिजली संयंत्रों के बराबर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम हो सकता है।
 
सोलर जियोइंजीनियरिंग: हां या ना?
 
शहरों को सफेद रंग में रंगने से स्थानीय जलवायु पर प्रभाव पड़ता है, लेकिन इसके कोई खतरनाक दुष्प्रभाव नहीं हैं। इस तरीके का पहले से इस्तेमाल हो रहा है। कई अनिश्चितताओं और संभावित जोखिमों के कारण, स्ट्रैटोस्फेरिक एरोसोल इंजेक्शन (एसएआई) अभी भी हकीकत से काफी दूर है। साथ ही, महासागरों पर कृत्रिम झाग बनाना भी दूर की कौड़ी है।
 
भविष्य में सोलर जियोइंजीनियरिंग में और पैसा लगाना चाहिए या नहीं, इस पर वैज्ञानिक दो खेमों में बंटे हुए हैं। कीथ कहते हैं, 'अगर हम शोध नहीं करते हैं, तो अगली पीढ़ी को बिना जानकारी के कोई फैसला लेना होगा। वे शोध के बिना भी इसे लागू करने का फैसला कर सकते हैं। ऐसा करना मूर्खतापूर्ण होगा। मुझे लगता है कि अगली पीढ़ी को जानकारी देने के लिए, शोध करना नैतिक जिम्मेदारी है।'
 
भले ही अन्य वैज्ञानिक कीथ से अलग सोचते हैं, लेकिन वे सभी एक बिंदु पर सहमत हैं कि हमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को जितनी जल्दी हो सके कम करने और लंबी अवधि में जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के तरीके खोजने की जरूरत है। ऐसा इसलिए, क्योंकि सोलर इंजीनियरिंग भी ग्लोबल वॉर्मिंग को पूरी तरह कम नहीं कर पाएगी।

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