सबसे बड़ा रहस्य, राधा भगवान श्रीकृष्ण की प्रेमिका थीं, पत्नी थीं या कुछ नहीं?

radha krishna rani
वर्तमान में राधा और कृष्ण के मंदिर बहुत मिल जाएंगे। वृंदावन में राधारानी का भव्य मंदिर है। कृष्ण के नाम के साथ राधा का ही नाम जुड़ा हुआ है। अब सवाल यह उठता है कि राधा जब श्रीकृष्ण के जीवन में इतनी महत्वपूर्ण थीं तो उन्होंने राधा से विवाह क्यों नहीं किया? आखिर राधा कौन थीं, कैसे हुई उनकी मृत्यु? थीं भी या कि नहीं? इन सभी सवालों के उत्तर जानिए...
 
 
1. कहां हुआ था राधा का जन्म और विवाह?
राधा का जिक्र महाभारत में नहीं मिलता है। भागवत पुराण में भी नहीं मिलता है। राधा का जिक्र पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। पद्म पुराण के अनुसार राधा वृषभानु नामक गोप की पुत्री थीं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राधा कृष्ण की मित्र थीं और उनका विवाह रापाण, रायाण अथवा अयनघोष नामक व्यक्ति के साथ हुआ था।
 
कुछ विद्वान मानते हैं कि राधाजी का जन्म यमुना के निकट स्थित रावल ग्राम में हुआ था और बाद में उनके पिता बरसाना में बस गए। लेकिन अधिकतर मानते हैं कि उनका जन्म बरसाना में हुआ था। राधारानी का विश्वप्रसिद्ध मंदिर बरसाना ग्राम की पहाड़ी पर स्थित है। बरसाना में राधा को 'लाड़ली' कहा जाता है।
 
ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड अध्याय 49 श्लोक 35, 36, 37, 40, 47 के अनुसार राधा श्रीकृष्ण की मामी थीं, क्योंकि उनका विवाह कृष्ण की माता यशोदा के भाई रायाण के साथ हुआ था। ब्रह्मवैवर्त पुराण ब्रह्मखंड के 5वें अध्याय में श्लोक 25, 26 के अनुसार राधा को कृष्ण की पुत्री सिद्ध किया गया है।
 
राधा का पति रायाण गोलोक में श्रीकृष्ण का अंशभूत गोप था। अत: गोलोक के रिश्ते से राधा श्रीकृष्ण की पुत्रवधू हुई। माना जाता है कि गोकुल में रायाण रहते थे। मतलब यह कि राधा का श्रीकृष्ण से पिछले जन्म का भी रिश्ता है। यह भी कि उन्हें लक्ष्मी का रूप भी माना जाता है।
 
 
2. रुक्मणि ही राधा थीं या राधा नाम की कोई महिला नहीं थी?
कुछ विद्वान मानते हैं कि राधा नाम की कोई महिला नहीं थी। रुक्मणि ही राधा थीं। राधा और रुक्मणि दोनों ही कृष्ण से उम्र में बड़ी थीं। श्रीकृष्ण का विवाह रुक्मणि से हुआ था इसलिए समझो कि राधा से ही हुआ। मतलब यह कि राधा का कोई अलग से अस्तित्व नहीं है।
 
पुराणों के अनुसार देवी रुक्मणि का जन्म अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में हुआ था और श्रीकृष्ण का जन्म भी कृष्ण पक्ष में अष्टमी तिथि को हुआ था व देवी राधा, वह भी अष्टमी तिथि को अवतरित हुई थीं। राधाजी के जन्म और देवी रुक्मणि के जन्म में एक अंतर यह है कि देवी रुक्मणि का जन्म कृष्ण पक्ष में हुआ था और राधाजी का शुक्ल पक्ष में। राधाजी को नारदजी के शाप के कारण विरह सहना पड़ा और देवी रुक्मणि से कृष्णजी की शादी हुई। राधा और रुक्मणि यूं तो दो हैं, परंतु दोनों ही माता लक्ष्मी के ही अंश हैं।
 
माना जाता है कि मध्यकाल या भक्तिकाल के कवियों ने राधा-कृष्ण के वृंदावन के प्रसंग का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया। राधा-कृष्ण की भक्ति की शुरुआत निम्बार्क संप्रदाय, वल्लभ संप्रदाय, राधावल्लभ संप्रदाय, सखीभाव संप्रदाय आदि ने की। इसका मतलब कृष्ण की भक्ति के साथ राधा की भक्ति की शुरुआत मध्यकाल में हुई। उसके पूर्व यह प्रचलन में नहीं थी। दक्षिण के आचार्य निम्बार्कजी ने सर्वप्रथम राधा-कृष्ण की युगल उपासना का प्रचलन किया था। ऐसा भी कहा जाता है कि जयदेव ने पहली बार राधा का जिक्र किया था और उसके बाद से श्रीकृष्ण के साथ राधा का नाम जुड़ा हुआ है। इससे पहले राधा नाम का कोई जिक्र नहीं था।
 
3. राधा-कृष्ण का सांकेतिक स्थल पर मिलन और विवाह-
 
ब्रह्मवैवर्त पुराण प्रकृति खंड अध्याय 48 के अनुसार और यदुवंशियों के कुलगुरु गर्ग ऋषि द्वारा लिखित गर्ग संहिता की एक कथा के अनुसार कृष्ण और राधा का विवाह बचपन में ही हो गया था। कहते हैं कि एक बार नंदबाबा श्रीकृष्ण को लेकर बाजार घूमने निकले तभी उन्होंने एक सुंदर और अलौकिक कन्या को देखा। वह कन्या कोई और नहीं राधा ही थी।
 
कृष्ण और राधा ने वहां एक-दूसरे को पहली बार देखा था। दोनों एक-दूसरे को देखकर मुग्ध हो गए थे। जहां पर राधा और कृष्ण पहली बार मिले थे, उसे संकेत तीर्थ कहा जाता है, जो कि संभवत: नंदगांव और बरसाने के बीच है। इस स्थान पर आज एक मंदिर है। इसे संकेत स्थान कहा जाता है। मान्यता है कि पिछले जन्म में ही दोनों ने यह तय कर लिया था कि हमें इस स्थान पर मिलना है। यहां हर साल राधा के जन्मदिन यानी राधाष्टमी से लेकर अनंत चतुर्दशी के दिन तक मेला लगता है।
 
 
गर्ग संहिता के अनुसार एक जंगल में स्वयं ब्रह्मा ने राधा और कृष्ण का गंधर्व विवाह करवाया था। श्रीकृष्ण के पिता उन्हें अकसर पास के भंडिर ग्राम में ले जाया करते थे। वहां उनकी मुलाकात राधा से होती थी। एक बार की बात है कि जब वे अपने पिता के साथ भंडिर गांव गए तो अचानक तेज रोशनी चमकी और मौसम बिगड़ने लगा, कुछ ही समय में आसपास सिर्फ और सिर्फ अंधेरा छा गया।
 
इस अंधेरे में एक पारलौकिक शख्सियत का अनुभव हुआ। वह राधारानी के अलावा और कोई नहीं थी। अपने बाल रूप को छोड़कर श्रीकृष्ण ने किशोर रूप धारण कर लिया और इसी जंगल में ब्रह्माजी ने विशाखा और ललिता की उपस्थिति में राधा-कृष्ण का गंधर्व विवाह करवा दिया। विवाह के बाद माहौल सामान्य हो गया तथा राधा, ब्रह्मा, विशाखा और ललिता अंतर्ध्यान हो गए।
 
 
असल में इस वास्तविक घटना को अलंकृत कर दिया गया है। राधा सचमुच ही कृष्ण से बड़ी थीं और सामाजिक दबावों के चलते यह संभव नहीं था कि उम्र में कहीं बड़ी लड़की से विवाह किया जाए। लेकिन यदि दोनों के बीच प्रेम रहा होगा तो निश्चित ही गुपचुप रूप से गंधर्व विवाह किया गया हो और इस बात को छुपाए रखा हो?
 
4. कृष्ण ने नहीं निभाया वादा-
एक अन्य कथा के अनुसार राधा और कृष्ण एक-दूसरे को प्रेम करने लगे थे। उस वक्त कृष्ण की उम्र 8 और राधा की 12 वर्ष थी। जब यह बात राधा के घर के लोगों को पता चली तो उन्होंने उसे घर में ही कैद कर दिया। ऐसा किए जाने के कई कारण थे। एक कारण यह था कि राधा की मंगनी हो गई थी।
 
 
जब कृष्ण को यह पता चला तो वे उसे कैद से छुड़ाकर यशोदा मां के पास ले आए। यह देखकर यशोदा मां भी दंग रह गईं। तब उन्होंने कृष्ण को बहुत समझाया कि लल्ला, ऐसा करना ठीक नहीं है। मैं तेरा विवाह दूसरे से करा दूंगी, लेकिन कृष्ण नहीं माने।
 
बाद में यशोदा मैया और नंदबाबा उन्हें लेकर ऋषि गर्ग के पास गए। तब गर्ग ऋषि ने कान्हा को समझाया कि उनका जन्म किसी महान उद्देश्य के लिए हुआ है अत: वे किसी भी मोह में बंध नहीं सकते। यह व्यर्थ का हठ छोड़ दें। यह सुनकर कान्हा उदास हो गए और उस दौरान उनका बुलावा मथुरा के लिए आ गया। तब वे वृंदावन छोड़कर हमेशा के लिए मथुरा चले गए। कृष्ण जाते वक्त राधा से ये वादा करके गए थे कि वो वापस आएंगे, लेकिन कृष्ण कभी भी राधा के पास वापस नहीं आए और यही दर्द हमेशा राधा और कृष्ण के मन में रहा।
 
5. वृंदावन की गलियों में हैं प्रेम के निशान-
राधा का गांव बरसाना था। कान्हा पहले गोकुल, फिर नंदगांव और बाद में वृंदावन में रहने लगे थे। वृंदावन में ही राधा के परिवार के लोग भी रहने आ गए थे। बस वहीं पर सांकेतिक तीर्थ से जन्मा राधा और कृष्ण का प्रेम पनपा। कहते हैं कि बचपन की मुहब्बत भुलाए नहीं भुलती।
 
 
उस काल में होली के दिन यहां वृंदावन में इतनी धूम होती थी कि दोनों गांव बरसाना और नंदगांव के लोग वृंदावन में इकट्ठा हो जाते थे। बरसाने से नंदगाव टोली आती और नंदगांव से भी टोली जाती थी। बरसाना गांव के पास 2 पहाड़ियां मिलती हैं। उनकी घाटी बहुत ही कम चौड़ी है। मान्यता है कि गोपियां इसी मार्ग से दही-मक्खन बेचने जाया करती थीं। यहीं पर कभी-कभी कृष्ण उनकी मक्खन वाली मटकी छीन लिया करते या फोड़ दिया करते थे।
 
 
विष्णु पुराण में वृंदावन में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि यहीं पर श्रीकृष्‍ण और राधा एक घाट पर युगल स्नान करते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और गोपियां आंख-मिचौनी का खेल खेलते थे। यहीं पर श्रीकृष्ण और उनके सभी सखा और सखियां मिलकर रासलीला अर्थात तीज-त्योहारों पर नृत्य-उत्सव का आयोजन करते थे। कृष्ण की शरारतों के कारण उन्हें बांकेबिहारी कहा जाता है। यहां पर यमुना घाट के प्रत्येक घाट से भगवान कृष्ण की कथा जुड़ी हुई है।
 
 
कृष्ण ने जो नंदगांव और वृंदावन में छोटा-सा समय गुजारा था, उसको लेकर भक्तिकाल के कवियों ने कई कविताएं लिखी हैं। वृंदावन छोड़कर कृष्ण जब मथुरा में कंस को मारने गए, तब उनका जीवन पूरी तरह से बदल गया। कंस को मारने के बाद उनके जीवन में उथल-पुथल शुरू हो गई।
 
6. नारद के श्राप के कारण राधा और कृष्ण को विरह सहना पड़ा-
 
रामचरित मानस के बालकांड के अनुसार एक बार विष्णुजी ने नारदजी के साथ छल किया था। उन्हें खुद का स्वरूप देने के बजाय वानर का स्वरूप दे दिया था। इस कारण वे लक्ष्मीजी के स्वयंवर में हंसी का पात्र बन गए और उनके मन में लक्ष्मीजी से विवाह करने की अभिलाषा दबी-की-दबी ही रह गई थी।
 
नारदजी को जब इस छल का पता चला तो वे क्रोधित होकर वैकुंठ पहुंचे और भगवान को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें 'पत्नी का वियोग सहना होगा', यह श्राप दिया। नारदजी के इस श्राप की वजह से रामावतार में भगवान रामचन्द्रजी को सीता का वियोग सहना पड़ा था और कृष्णावतार में देवी राधा का।
 
7. राधा और कृष्ण का पुनर्मिलन-
जब कृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा चले गए, तब राधा के लिए उन्हें देखना और उनसे मिलना और दुर्लभ हो गया। कहते हैं कि राधा और कृष्ण दोनों का पुनर्मिलन कुरुक्षेत्र में बताया जाता है, जहां सूर्यग्रहण के अवसर पर द्वारिका से कृष्ण और वृंदावन से नंद के साथ राधा आई थीं।
 
राधा सिर्फ कृष्ण को देखने और उनसे मिलने ही नंद के साथ गई थीं। इसका जिक्र पुराणों में मिलता है। कहा जाता है कि जब द्वापर युग में नारायण ने श्रीकृष्ण का जन्म लिया था, तब मां लक्ष्मी ने राधारानी के रूप में जन्म लिया था ताकि मृत्युलोक में भी वे उनके साथ ही रहें, लेकिन ऐसा हो नहीं सका।
 
 
8. राधा और कृष्ण के प्रेम की मार्मिक कहानी-
राधा और कृष्ण के बीच पहले सांकेत स्थल और फिर बाद में वृंदावन में होती रही मुलाकात के कारण प्रेम जन्म लेने लगा था। बचपन का प्यार बहुत गहरा और निष्काम होता है। श्रीकृष्ण उस वक्त 8 साल के और राधा 12 साल की थीं। कहते हैं कि उस वक्त श्रीकृष्ण को 2 ही चीजें सबसे ज्यादा प्रिय थीं- बांसुरी और राधा। कृष्ण की बांसुरी की धुन सुनकर राधा के जैसे प्राण ही निकल जाते थे। कई जन्मों की स्मृतियों को कुरेदने का प्रयास होता था और वह श्रीकृष्ण की तरफ खिंची चली आती थी।
 
 
भगवान श्रीकृष्ण से राधा पहली बार तब अलग हुई, जब श्रीकृष्ण वृंदावन छोड़कर बलराम के साथ कंस के निमंत्रण पर मथुरा जा रहे थे। तब उन्हें भी नहीं मालूम था कि उनका जीवन बदलने का वाला है। यह प्रेमपूर्ण जीवन अब युद्ध की ओर जाने वाला है। पूरा वृंदावन उस वक्त रोया था। राधा के लिए तो जैसे सबकुछ खत्म होने जैसा था। राधा के आंसु सूखकर जम गए थे। बस, श्रीकृष्ण राधा से उस वक्त इतना ही कह पाए कि 'मैं वापस लौटूंगा।'
 
 
लेकिन श्रीकृष्ण कभी नहीं लौटे और मथुरा में वे एक लंबे संघर्ष में उलझ गए। बाद में उन्होंने रुक्मणि से विवाह कर लिया और द्वारिका में अपनी एक अलग जिंदगी बसा ली। जब कृष्ण वृंदावन से निकल गए तब राधा की जिंदगी ने एक अलग ही मोड़ ले लिया था। राधा का विवाह हो गया, लेकिन राधा श्रीकृष्ण के विरह में जीती और मरती रहीं। राधा ने अपना दांपत्य जीवन ईमानदारी से निभाया और जब वे बूढ़ी हो गईं तो उसके मन में मरने से पहले एक बार श्रीकृष्ण को देखने की आस जगी।
 
 
सारे कर्तव्यों से मुक्त होने के बाद राधा आखिरी बार अपने प्रियतम कृष्ण से मिलने गईं। जब वे द्वारका पहुंचीं तो उन्होंने कृष्ण के महल और उनकी 8 पत्नियों को देखा, लेकिन वे दुखी नहीं हुईं। जब कृष्ण ने राधा को देखा तो वे बहुत प्रसन्न हुए। कहते हैं कि दोनों संकेतों की भाषा में एक-दूसरे से काफी देर तक बातें करते रहे। तब राधा के अनुरोध पर कृष्ण ने उन्हें महल में एक देविका के पद पर नियुक्त कर दिया।
 
 
कहते हैं कि वहीं पर राधा महल से जुड़े कार्य देखती थीं और मौका मिलते ही वे कृष्ण के दर्शन कर लेती थीं। एक दिन उदास होकर राधा ने महल से दूर जाना तय किया। उन्होंने सोचा कि वे दूर जाकर दोबारा श्रीकृष्ण के साथ गहरा आत्मीय संबंध स्थापित करेंगी। हालांकि श्रीकृष्ण तो अंतरयामी थे और वे राधा के मन की बात जानते थे।
 
कहते हैं कि राधा एक जंगल के गांव में में रहने लगीं। धीरे-धीरे समय बीता और राधा बिलकुल अकेली और कमजोर हो गईं। उस वक्त उन्हें भगवान श्रीकृष्ण की याद सताने लगी। आखिरी समय में भगवान श्रीकृष्ण उनके सामने आ गए। भगवान श्रीकृष्ण ने राधा से कहा कि वे उनसे कुछ मांग लें, लेकिन राधा ने मना कर दिया। कृष्ण के दोबारा अनुरोध करने पर राधा ने कहा कि वे आखिरी बार उन्हें बांसुरी बजाते देखना और सुनना चाहती हैं। श्रीकृष्ण ने बांसुरी ली और बेहद सुरीली धुन में बजाने लगे।
 
श्रीकृष्ण ने दिन-रात बांसुरी बजाई। बांसुरी की धुन सुनते-सुनते एक दिन राधा ने अपने शरीर का त्याग कर दिया। कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपनी प्रेमिका की मृत्यु बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने बांसुरी तोड़कर झाड़ी में फेंक दी। उसके बाद से श्रीकृष्ण ने जीवन में कभी बांसुरी नहीं बजाई!

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