जब सालों बाद कोई घर लौटता है, तब कितना लौट पाता है.....

29 साल बाद कुलदीप पाकिस्तान से अपने वतन लौटे हैं, कुलदीप के लौटने से जाहिर है खुशियां भी लौटी हैं, उन कई-कई आंखों की उम्मीदों के जुगनू भी जगमगाए हैं. .. शायद उनका भी कोई भूला भटका लौट आए, कितने ही सैनिक, जवान, किसान,मछुआरे, भटकते राही सरहद के पार चले गए और फिर कभी नहीं लौटे, ना लौटी उनकी कोई खबर.... ना कोई आहट, ना दस्तक... बस एक इंतजार जाने कब तक....क्या हुआ, कैसे हुआ, अ भी कहां हैं? हैं भी या .... आशंका और कुशंका के बीच भंवर में डोलती डगमगाती नाव... लेकिन कोई खबर नहीं, कोई पहल नहीं.... 

एक गलती ने बना दिया ‘पाकि‍स्‍तान का जासूस’, 29 साल की सजा काटकर 3 दशक बाद ऐसे वतन लौटा ‘भारत का कुलदीप’
 
एक एक दिन उगता है  कटता है, और रात  के साथ खत्म हो जाता है, 24 घंटे ना जाने कितने दिल रोते हैं अपने अपनों की याद में और कहीं सुदूर कोई जलता है अपने वतन, अपने परिवार की चाह में.... यह कष्ट वर्णन से परे है, आपको जिंदगी भी जीनी है और हर दिन किसी की अनुपस्थिति को महसूसते हुए मरना भी है....
 
बहरहाल बात उनकी जो लौट कर भी नहीं लौट पाते हैं... कहीं कुछ खो जाता है, कुछ रह जाता है, कुछ थम जाता है... रवानी फिर नहीं आती, जिंदगानी फिर नहीं गाती....बहुत समय लगता है गाड़ी को पटरी पर लाने में...  इतने सालों के कितने किस्से कितने कष्ट कैसे सुनाएं, क्या क्या सुनाएं, कहां से शुरू करें, करें भी या रहने दें... क्या होगा अब अतीत के काले जंगलों में जाकर अब तो जो बचा है वही जी लें, बच्चे अनजान, साथी बेजान, जाने कितने अपनों की तो चली गई जान....
 
जिंदगी को कहां से शुरू करें..जिंदगी के सिरे को कहां से पकड़े पर सवाल यह नहीं, सवाल यह है कि जिनसे जिंदगी की उम्मीद बंधी है उनसे सिरे फिर से कैसे जोड़े जाए...अपने कष्ट पहले उन्हें सुनाएं या उनके कष्ट पहले सुने.... 
 
बहुत निराशा में भी बेसब्री से जिनसे मिलने की आस टिमटिमाती रही, वह मिलने पर बुझ तो नहीं गई...? बदलते दौर के बदलते चलन में रिश्ते कितने बच पाए हैं.... इसे समझने में भी वक्त लगता है.... अपने ही खून से जुड़ने में समय लगता है, मन, आदत, रूचि, प्रकृति, प्रवृत्ति और दिल-दिमाग को जुड़ने में थोड़ा विश्राम लगता है.... 
 
मिलन,-बिछोह और इंतजार-मुलाकात की एक कहानी खत्म होती है, और एक साथ कई और कहानियां शुरू भी होती हैं....

बहरहाल जहाज का पंछी उड़ कर भटक कर फिर से जहाज पर आए तो उसके हिस्से का चुग्गा हमेशा उसका इंतजार करता है.... करना चाहिए....दिलों में पसरी दूरियां भी पट जाती है जब एक टूटती, बिखरती आस फिर से दिपदिपा जाती है... अपने ही इंसान को देखकर...  
 
उम्मीद करें कि हर जीवन का कुलदीप इसी तरह लौट आए अपनों के पास बेगाने सफर को खत्म कर.... 

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