संजा : ग्राम्य सखियों का भोला प्रकृति लोकपर्व

गोबर की गंध और शाम के सुरमई उजाले ने मुझे बचपन की गोधूलि बेला की याद दिला दी...।
 
गोधूलि कहते ही इसलिए थे कि जब गायें घर लौटती तो धूल उड़ाती आती थीं (अब तो वो कच्ची पगडंडियों की धूल भी कहाँ) रंभाती गायों के साथ माँऽऽ माँऽऽ के स्वर में रंभाते उनके बछड़े...... और टुन-टन के मधुर स्वर में बजती उनके गले की घंटियाँ....... ओह ....... कितना आनन्दमयी नजारा हुआ करता था और बस........ यही वो वक्त था जब हम सब बाल सखा/ सखियाँ उस झुण्ड के दायें-बायें चलते थे। 
 
गायों के ताजे नर्म गोबर के लिए हम सब गायों के झुण्ड के साथ-साथ भागते। जैसे-जैसे गायें पूँछ उठाती और धप से गोबर जमीन पर गिरता कि अपनी-अपनी टोकरी में सब उठा लेते थे।
 
तीन बड़े भाइयों की इकलौती छोटी बहन होने के ठसके क्या होते हैं, ये तब सबको पता चलता था। राजू दादा ऐसे कामों में बड़ा माहिर...... वो गायों के पीछे-पीछे चलता और जैसे ही कोई गाय पूँछ उठाती वो गोबर को टोकनी में ही झेल लेता था। यानि साफ-सुथरा गोबर........ बिना मिट्टी, कंकड़ व कचरे वाला.........
 
बस...! यहीं से संजा की तैयारी शुरू हो जाती थी, क्योंकि संजा की मुख्य आवश्यकता गोबर व फूल ही होते थे। 
 
संजा...यानि मालवा और राजस्थान के मिलेजुले परिवेश में कुआँरी कन्याओं का अनुष्ठानिक पर्व... जो भादों माह की प्रतिपदा से सम्पूर्ण पितृपक्ष में सोलह दिन तक संजा बनाने के दिन हुआ करते थे..।
 
लोक मान्यता है कि इसका उद्गम राजस्थान से है...जैसा कि संजा के इस गीत से स्पष्ट होता है------
 
"जीरो लो भई जीरो लो..
जीरो लई ने संजा बई के दो..
संजा को पीयर(मायका)सांगानेर..
परण(ब्याहकर) पधार्या गढ़ अजमेर...."
 
माना जाता है कि राजस्थान से मिलती जुलती संस्कृति के कारण संजा की मालवा में भी पैठ हो गई...।
 
जबसे बचपन समझ में आया ,तब से ही संजा जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी थी...संजा के स्वागत में पूरी गुवाड़ी की हमारी सब सखियाँ 4-5 दिन पहले ही जुट जाती थीं।
 
घर के मुख्य द्वार के बाजू वाली दीवार पर थोड़ी पीली मिट्टी में खूब सारा गोबर मिलाकर पहले चौकोर शेप में लीप लिया जाता था। फिर चौकोर वर्गाकार आकृति के ऊपर व दायें-बायें समाकार वर्ग बनाए जाते थे। निचला हिस्सा खुला रहता था, मानों द्वार हो। ये संजा बनाने के लिए पृष्ठभूमि तैयार होती थी।
 
और फिर हर दिन के हिसाब से तय आकृति गोबर द्वारा बनाई जाती थी। 
पूनम - पाटला, 
पड़वा - पंखा, 
दूज- बिजोरा, 
 तीज- घेवर, 
चतुर्थी- चौपड़,
 पंचमी- 5 कुवांरे कुवांरी, 
 छठ- छाछ बिलौनी और छाबड़ी, 
सप्तमी- स्वास्तिक,
अष्टमी- आठ पंखुरी का फूल, 
 नवमी- डोकरा डोकरी(बुजुर्ग), 
 दसमी- दीया, 
 ग्यारस- केले का पेड़ और मोर, 
बारस- वन्दनवार,
तेरस- संजा बाई की गाड़ी, 
 चौदस- क़िलाकोट
 
इस तरह हर तिथिवार अलग डिजाइन व आखरी दिन यानि अमावस को किलाकोट बनता था। जिसमें जाड़ी जसौदा, पतली पेमा, सोन चिरैया, ढोली आदि पहले बनते और फिर संजाबाई के गहने कपड़े भंडार आदि बनाए जाते थे और हाँ उस वर्गाकार आकृति में ऊपर दायें-बायें चाँद-सूरज तो हर दिन बनते थे। 
 
संजा दिन छते ही बना ली जाती थी यानि सूरज ढलने से पहले.....और सूरज ढलने के बाद पूजा का सिलसिला शुरू होता था, जो रात तक चलता था।
 
यहाँ एक बात बता दूं कि दूसरे दिन दोपहर बाद संजा को बड़े जतन के साथ लोहे के खुरपे से धीरे-धीरे एहतियात के साथ उखाड़ा जाता था और एकत्र करके एक छाबड़ी में डाल दिया जाता था। इस प्रकार सारे दिनों की संजा को एकत्र कर किला कोट के बाद धूमधाम से विदा कर शिवना में बहा दिया जाता था।
 
अपनी परम्पराओं से हृदय व श्रद्धा से जुड़े कन्याएँ क्रमवार तिथि की हर डिजाइन को याद रखती व पूरे जतन के साथ इस पर्व को सजाती थी।
 
इन दिनों प्रकृति भी अपने पूरे शबाब पर होती थी। संजा के फूल (गुलताउड़ी) सफेद चाँदनी के फूल, पीली-केसरी करदली और केसरिया डंडी वाले हरसिंगार संजा सजाने के लिये प्रमुखता से होते थे। उस नासमझी की उम्र में भी हम जानते थे कि सूरज पीले व चाँद सफेद रंग से सजाना है। 
 
पहले दिन धूमधाम से संजा बाई विराजती और पहले शुरुआत होती थी आरती से -
पेली (पहली का अपभ्रंश) जो आरती रई रमजो....... भई ने भतीजा
अब सब सखियाँ........
माता ......थने पूजूं सौ सौ कलियाँ.........
 
 इस तरह हर संजा की आरती होती और फिर प्रसाद खा-पीकर संजा के गीत शुरु होते। वहीं कच्चे ओटलों सब कन्याएँ बैठकर शुरू हो जाती। फिर प्रसाद बंटता।
 
इन दिनों संजाबाई पीहर आती है, इसलिये ये त्यौहार मनाने की परम्परा है। तो संजा बाई को छेड़ते हुए गीत गाया जाता था -
 
‘‘संजाबाई का लाड़ा जी
लुगड़ो लाया जाड़ा जी
असो कई लाया दारी का
लाता गोट किनारी का......’’
 
फिर संजा बाई को भोजन करने की बारी आती। आज के डिजिटल युग में सारी सुविधाएँ हैं, पर तब माँ सरीखे लाड़ से कहना -
 
संजा तू जीम ले के चूठ ले
चिरा में चिरई ले.... 
चटक चाँदनी सी रात
फूला भरी रे परात.... 
मन को छू लेता था। 
 
गीतों में भी सास का स्वरूप सास जैसा ही बताया जाता था -
म्हारे आंगन राई उबी, राई खई गय्या ने 
गय्या ने दिया दूधा, दूध की बनाई खीर।
खीर खिलाई मामा को, मामा ने दिया पैसा 
पैसे की लाई नाड़ी, नाड़ी डाली चोटी में
चोटी दिखाई सास को, सास ने मारा टल्ला
टल्ले से आए आँसू, आंसू पोंछे मखलम से 
मखमल दिया धोबी को, धोबी ने दी चिन्दी 
चिन्दी दी दर्जी को, दर्जी ने बनाए गुड्डा गुड्डी
थे खेलो संजा बाई गुड्डा-गुड्डी........
गीत गाते गाते सास ने मारा टल्ला...... 
 
गाते तो हम सब सखियाँ एक-दूसरे को टल्ला मारती हँसती थी। 
 
सास यदि परेशान करे तो इस पर ही एक और गीत होता था....
"असो दूंगा दारी के चमचा के..
काम करऊंगा धमका के...
मे बेठूंगा गादी पे..उके बिठऊंगा खूंटी पे...
 
ऐसा माना जाता था कि संजा बाई बड़े घर की बेटी थी व ससुराल से भी सम्पन्न परिवार से थी तो गीत गाते - 
संजा......... तू बड़ा बाप की बेटी।
तू खाए खाजा-रोटी........ 
और जब ससुराल से आती भी तो ठाठ से सब अच्छे से पेर-ओढ़ के........और गीत रहता -
 
छोटी से गाड़ी गुड़कती जाए
जिम संजाबाई बेठ्या जाए
घाघरो घमकाता जाए
चूड़लो चमकाता जाए
बाई जी की नथली झोला खाएँ.......
 
गीतों के क्रम में आखरी गीत होता था -
 
संजा - तू थारे घरे जा कि थारी बाई 
मारेगा के कूटेगा........ डेली में डचोकेगा 
चाँद गयो गुजरात.....वे हिरणी का
बड़ा-बड़ा दाँत........
के छोरा-छोटी डरपेगा........
 
और बस उसके बाद हम सब अपनी रंगबिरंगी फ्रॉकें मटकाती अपने-अपने घर लौट जाती।
 
संजा को लेकर आस्थाएँ प्रगाढ़ होती थी। उखड़ी हुई संजा को, पैर में नहीं आने देते थे। संजा के गीतों के कई शब्दों के अर्थ समझ नहीं आते थे, लेकिन भावनाएँ समझने को कहाँ शब्दों की आवश्यकता होती है ना........!
 
लोक कला का ये पर्व संजा एक अलग ही सौंधी महक लिए आता था व सच्ची में बेटी की सी भावना लिए हम भावी माताओं का विदाई वाले दिन आँखें नम व हृदय भारी कर जाता था।
 
अब बेटियाँ ऊँची उड़ान भर रही है...... कार्य के प्रति समर्पित है........ बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ संभाल रही है......... सो उनके पास वक्त नहीं...... पर संजा को याद कर माताएँ आज भी बेटियों की बाट जोहती है....

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