उद्धव ठाकरे की अयोध्या राजनीति

जबसे शिवसेना ने घोषणा की थी कि उद्धव ठाकरे अयोध्या का दौरा करेंगे तभी से इसका कई दृष्टिकोणों से विश्लेषण हो रहा था। यह प्रश्न उठ रहा था कि अयोध्या जाने का निर्णय उनको क्यों करना पड़ा? बाला साहब ठाकरे के स्वर्गवास के बाद शिवसेना की कमान थामे उनको छः वर्ष हो गए। इस बीच उनको अयोध्या आने की याद नहीं आई। अचानक उनकी अंतरात्मा में श्रीराम भक्ति पैदा हो गई हो तो अलग बात है। किंतु जिसके अंदर भक्ति पैदा होगी वह तिथि तय करके, उसकी पूरी तैयारी करके नहीं आएगा। 
 
24 नवंबर को उनके अयोध्या पहुंचने के काफी पहले से उनके 22 सांसद, लगभग सभी विधायक एवं प्रमुख नेता अयोध्या में उनके कार्यक्रमों की तैयारी तथा माहौल बनाने में जुटे थे। पूरे अयोध्या को इन्होंने शिवेसना के भगवा झंडे तथा नारों से पाट दिया था। शिवेसना की हैसियत या उद्धव ठाकरे का वैसा जनाकर्षण नहीं है कि उनके दर्शन या स्वागत के लिए भीड़ उमड़ पड़े। बावजूद महाराष्ट्र से आए शिवेसना के उत्साही कार्यकर्ताओं ने कुछ समय के लिए वातावरण को उद्धवमय बनाने में आंशिक सफलता पाई। लक्ष्मण किला में पूजा तथा सरयू घाट पर आरती करते उद्धव, उनकी पत्नी तथा पुत्र की तस्वीरें लाइव हमारे पास आतीं रहीं। प्रश्न है कि क्या इतने से उनका उद्देश्य पूरा हो गया?

 
इस प्रश्न के उत्तर के लिए समझना होगा कि उनका उद्देश्य था क्या? अयोध्या आने के पहले मुखपत्र सामना में उन्होंने केन्द्र सरकार पर ही नहीं हिन्दू संगठनों पर भी तीखा प्रहार किया था। कहा गया कि मन की बात बहुत हो गई अब जन की बात हो। हिन्दू संगठनों से पूछा गया था कि मेरे अयोध्या आने से उनको परेशानी क्यों हो रही है? सरकार से पूछा गया था कि लगातार मांग करने के बावजूद सरकार अयोध्या पर चुप्पी क्यों साधी हुई है? बहुत सी बातें थी जिसे हम शिवसेना शैली मान चुके हैं।

लक्ष्मण किला में पूजा में उपस्थित प्रमुख संतों को देखकर उनका आत्मविश्वास भी बढ़ा होगा। इसके बाद उन्होंने अपने संक्षिप्त भाषण में केन्द्र सरकार के बारे में कह दिया कि कुंभ कर्ण तो छः महीना सोता था और उसके बाद जगता था यह तो स्थायी रूप से सोने वाला कुंभकर्ण है जिसे मैं जगाने आया हूं। यह कहने से कुछ नहीं होता उसमें दम होना चाहिए, दिल चाहिए, ह्रदय चाहिए और वह मर्द का होना चाहिए उन्होंने सीधे प्रधानमंत्री पर हमला किया। 
 
मंदिर वहीं बनाएंगे तारीख नहीं बताएं नहीं चलेगा हमें तारीख चाहिए। एक सहयोगी दल के नाते यह सरकार के मुखिया पर अविश्वास एवं तीखा प्रहार था। उसके बाद मांग वही थी, अध्यादेश या विधेयक लाएं। 25 नवंबर की पत्रकार वार्ता भी उनकी अत्यंत संक्षिप्त थी। उनको एवं रणनीतिकारों को पता था कि पत्रकार अनेक असुविधानजनक सवाल पूछेंगे जिनका उत्तर देना कठिन होगा। इसलिए एक छोटा वक्तव्य तथा तीन सवालों का जवाब देकर खत्म कर दिया। यह सवाल पूछा गया था कि उत्तर भारतीयों पर हमले होते हैं तो आप चुप रहते हैं जिसका वो संतोषजक जवाब दे नहीं सकते थे। आखिर राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के पूर्व आरंभिक दिनों में शिवेसना भी यही करती थी। उसकी उत्पत्ति सन्स ऑफ द स्वॉयल यानी महाराष्ट्र महाराष्ट्रीयनों के लिए विचार से हुआ था।

 
बहरहाल, उद्धव अपना संदेश देकर वापस चले गए। उन्होंने संत समिति द्वारा आयोजित विशाल सभा में भाग लेने की कोशिश भी नहीं की। उस पर एक शब्द भी नहीं बोला। यह भी उनकी स्वयं को सबसे अलग दिखाने रणनीति थी। शिवसेना एवं स्वयं उद्धव बालासाहब के बाद पहचान की वेदना से गुजर रहे हैं। बालासाहब ने परिस्थितियों के कारण क्षेत्रीयतावाद से निकलकर प्रखर हिन्दुत्ववादी नेता की छवि बना ली थी। उनकी वाणी में जो प्रखरता और स्पष्टता थी उद्धव उससे वंचित हैं।

हिन्दुत्व के आधार पर ही शिवसेना राजनीति में प्रासंगिक रह सकता है तथा उद्धव भी। उद्धव के नेतृत्व में शिवसेना अंतर्विरोधी गतिविधियों में संलग्न रही है। जैन समुदाय के पर्व के समय मांस बिक्री पर प्रतिबंध का विरोध करते हुए शिवसैनिकों ने स्वयं मांस के स्टॉल लगाकर बिक्री की। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे पता चलता है कि शिवसेना भाजपा पर तो प्रहार करती है, लेकिन अपनी कोई निश्चित वैचारिक दिशा ग्रहण नहीं कर पा रही। भाजपा से अलग दिखाने के प्रयासों में उसकी स्वयं की विश्वसनीयता और जनाधार पर असर पड़ा है। इस कारण शिवसैनिकों की परंपरागत आक्रामकता में भी कमी देखी जा रही है।

 
इसका राजनीतिक असर भी हुआ है। भाजपा महाराष्ट्र में उसके छोटे भाई की भूमिका में थी। आज वैसी स्थिति नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 23 क्षेत्रों में विजय मिली, जबकि शिवसेना को 18 में। यह परिणाम यथार्थ का प्रमाण था। किंतु शिवेसना उसे मानने को तैयार नहीं थी। शिवेसना ने कहा कि भाजपा की सीटें इसलिए ज्यादा हो गई क्योंकि हमारे मत उसके उम्मीदवारों को मिल गए। हमारे उम्मीदवारों को उनके पूरे मत नहीं मिले। यह विश्लेषण सही नहीं था।

अपने को साबित करने के लिए विधानसभा चुनाव में शिवसेना ने गठबंधन तोड़ दिया। परिणाम भाजपा ने 122 विधानसभा सीटों पर विजय पाई जबकि शिवसना 63 में सिमट गई। उसके बाद स्थानीय निकाय चुनावों में भी भाजपा का प्रदर्शन शिवसेना से बेहतर रहा। शिवसेना अपनी स्थिति को मान लें तो शायद शांति से वह भाजपा के साथ मिलकर गठबंधन के नाते बेहतर एकजुट रणनीति बना सकती है। किंतु प्रदेश में बड़ा भाई बने रहने की उसकी सोच ऐसा होने के मार्ग की बाधा है। बालासाहब की अपनी छवि थी, जो उन्होंने परिस्थितियों के अनुरूप मुखर बयानों, सही रणनीतियों तथा कर्मों से बनाई थी। भाजपा भी उनका सम्मान करती थी। उन्होंने गठबंधन होने के बाद उद्धव और उनके साथियों की तरह कभी भाजपा पर प्रहार नहीं किया। अटलबिहारी वाजपेयी एवं लालकृष्ण आडवाणी से उनके व्यक्तिगत रिश्ते थे। संघ के अधिकारियों से भी वे संपर्क में रहते थे। उद्धव ऐसा नहीं कर पा रहे हैं और अपनी अलग पहचान बनाने की अकुलाहट में प्रदेश एवं केन्द्र सरकार में होते हुए भी वे एवं उनके लोग विपक्ष की तरह आक्रामक बयान दे रहे हैं।

 
उनके अयोध्या आगमन को इन्हीं परिप्रेक्ष्यों में देखना होगा। श्रीराम मंदिर निर्माण की इच्छा उद्धव के अंदर होगी, लेकिन यह यात्रा राजनीतिक उद्देश्य से किया गया था। अयोध्या का मामला संघ, संत समिति एवं विश्व हिन्दू परिषद के कारण फिर चरम पर पहुंच गया है। उद्धव को लगा है कि प्रखर हिन्दुत्व नेता की पहचान तथा पार्टी के निश्चित विचारधारा का संदेश देने के लिए यह सबसे उपयुक्त अवसर है। इसमें रास्ता यही है कि भाजपा को राम मंदिर पर कठघरे में खड़ा करो और स्वयं को इसके लिए पूर्ण समर्पित। यही उन्होंने अयोध्या में किया। उन्होंने कहा कि भाजपा चुनाव के समय राम-राम करती है और चुनाव के बाद आराम। उसके बाद वे और तल्ख हुए।

कह दिया कि भाजपा रामलला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे को पूरा करें या लोगों को कह दें कि यह भी एक चुनावी जुमला था। उन्होंने बार-बार अयोध्या आने का ऐलान किया। देखना होगा कि आगे वे आते हैं या नहीं। किंतु साफ है कि जब तक सरकार कोई कदम नहीं उठाती वो इसी तरह आक्रामकता प्रदर्शित करते रहेंगे। किंतु उद्धव भूल गए कि भाजपा की तरह वे भी कठघरे में है। यह सवाल उन पर भी उठेगा कि इतने दिनों तक उन्हें श्री राम मंदिर निर्माण की याद क्यों नहीं आई? उनके सांसद संजय राउत दावा कर रहे थे कि रामभक्तों ने 17 मिनट या आधे घंटा में काम तमाम कर दिया। उस समय शिवसेना आंदोलन में कहां थी? यह सफेद झूठ है कि शिवसैनिकों ने बाबरी ध्वस्त किया। वो उन शिवसैनिकों को सामने लाएं। जितनी छानबीन हुई उसमें शिवसैनिकों का नाम कहीं नहीं आया। भाजपा 1992 तक तो आंदोलन में समर्पण से लगी थी।
 
 
1998 तक घोषणा पत्र के आरंभ में इसे शामिल करती थी। शिवेसना ने कभी ऐसा नहीं किया। यदि उद्धव में श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर इतनी ही उत्कंठा थी तो उनको उच्चतम न्यायालय में अपने वकील खड़ाकर त्वरित और प्रतिदिन सुनवाई की अपील करनी चाहिए थी। वे प्रधानमंत्री से मिल सकते थे। अपने लोगों को मस्जिद पक्षकारों से बात करने के लिए नियुक्त कर सकते थे। इनमें से कुछ भी उन्होंने नहीं किया। जनता पूरी भूमिका का मूल्यांकन करेगी। अयोध्या आकर पूजा, आरती की औपचारिकता तथा मंदिर के लिए अध्यादेश की माग एवं प्रधानमंत्री की निंदा से वे बालासाहब की तरह महाराष्ट्र में हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि नहीं पा सकते।

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