आभासी दुनिया और वास्तविक दुनिया!

अनिल त्रिवेदी (एडवोकेट)

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026 (09:57 IST)
आभासी दुनिया न तो प्राकृतिक है साथ ही  साथ वास्तविक भी नहीं है। पर वास्तविक या प्राकृतिक दुनिया के मनुष्यों पर आभासी दुनिया का प्रभाव बेतहाशा बढ़ता ही जा रहा है। देखने, सुनने, समझने के साथ साथ मनुष्यों के मन मस्तिष्क पर आभासी दुनिया का प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।

वास्तविक दुनिया में रहते हुए भी हम जीवन की मूल प्रकृति या वास्तविकता से लगातार धीरे-धीरे ही सही पर थोड़े थोड़े दूर होते जा रहे है और आभासी गतिविधियों को निरन्तर जाने-अनजाने अपनाने ही नहीं, प्राण प्रण से मानने भी लगे हैं।
 
आभासी दुनिया ने हमारे देखने सुनने और प्रतिक्रिया करने के तौर तरीकों को बहुत ही गहरे से बदल दिया है। हम में से कई लोगों की समझ तो यह भी बनने लगी है की आभासी दुनिया के बिना जीवन जीना ही अब संभव ही नहीं रहा है। इसमें कोई शक नहीं है कि आधुनिक दुनिया आभासी दुनिया की दीवानी होती जा रही है।

जिस तेजी से आभासी दुनिया ने हमारी आंखों और कानों को बैठे-बैठे ही व्यस्त ही नहीं अतिव्यस्त से लेकर अस्त-व्यस्त कर दिया है की हम हर दिन वास्तविक जीवन की निरन्तर चलने वाली प्राकृतिक गतिविधियों और आपाधापी से हर क्षण दूर होते जा रहे हैं। 
 
वास्तविकता से परे जीवन को ले जाने में वैसे देखा जाए तो प्रकृति को कोई दिक्कत नहीं है और प्रकृति अपने अंश मनुष्य को आभासी दुनिया में धंसने या विलीन हो जाने से रोकती भी नहीं है। प्रकृति को मनुष्य के वास्तविक जीवन से छलांग लगा कर आभासी दुनिया में रच बस जाने में कोई भी दिक्कत या परेशानी नहीं महसूस हो सकती, जो कुछ भी परेशानी या द्वंद उठ खड़ा होता है वह प्राकृतिक मनुष्य के मन और जीवन में होता है। 
 
आभासी दुनिया पूरी तरह से आभासी है उसमें जीवन की रोजमर्रा की मशक्कत या सुख दुख भी नहीं आते जाते। आभासी दुनिया एक दम स्थितप्रज्ञ की तरह ही है। पर फिर भी वास्तविक दुनिया के मनुष्य को चौबीसों घंटों, बारहों महीनों भौंचक, अधीर और अस्थिर मन मस्तिष्क का बना चुकी हैं।
 
आभासी दुनिया जन्म और मृत्यु से परे तो है ही साथ ही साथ युद्ध और शांति से भी कोसों दूर है। आभासी दुनिया जड़ और अचेतन वस्तुओं पर कोई असर नहीं करती हैं पर चेतन मन और जीवन के मूल स्वरूप को पूरी तरह से वास्तविक जीवन से परे ढकेलते हुए एक आभासी दुनिया जो वास्तव में मौजूद ही नहीं है का अत्यधिक आदी बनाने में सतत सक्रिय हैं। 
 
प्राकृतिक जीवन से जुड़ी मूल चेतना को आभासी गतिशीलता में बदलकर वास्तविक चेतना या प्राकृतिक जीवन को आभासी जड़ता में बदल डालती है। इस में सबसे ज्यादा उल्लेखनीय बात यह है कि प्राकृतिक या वास्तविक दुनिया का मनुष्य अपने आप आभासी दुनिया में इतना अधिक आत्ममुग्ध हो जाता है कि उसके अंदर आभासी और वास्तविक का भेद करने की क्षमता ही लुप्त होने लगती है। पर यह सबकुछ होते हुए भी प्राकृतिक या वास्तविक दुनिया में मौजूद मनुष्येतर प्राणियों के मन मस्तिष्क और जीवनक्रम में आभासी दुनिया का शायद अब तक कोई असर नहीं हुआ है।
 
ऐसा अनुमान किया जा सकता है। इस तरह एक बात तो यह तय है कि मनुष्य अपनी प्राकृतिक शक्तियों का मनमाना यांत्रिक विस्तार आभासी दुनिया में लिप्त रहकर अपने जीवन को जीने की आभासी पर राह चल पड़ा है। मनुष्य के अलावा बाकी सारे जीव अपने जीवन के प्राकृतिक रूप स्वरूप में बने हुए हैं।
 
मनुष्य को अपने जीवन में जो ज्ञान या प्रत्यक्षीकरण का विस्तार प्राकृतिक रूप से मिला था वह आभासी दुनिया के आदि मनुष्य के लिए अब एक छोटे-से परदे में सिमट गया है। आभासी दुनिया के मनुष्य के लिए परदा ही जीवन है और जीवन ही परदा है। अंतहीन या शून्य अंतरिक्ष से लेकर महासागर की गहराई सब कुछ छोटे से परदे में समा गई है। आज आभासी दुनिया का समूचा सफर हाथ की दो चार अंगुलियों की गतिविधियों में सिमित हो गया है। 
 
इसी से आभासी दुनिया ने समूचे मनुष्य समाज को अपनी चंगुल में समेट लिया है। वास्तविक दुनिया में धूमने, जानने, समझने और देखने, लिखने, बोलने और सुनने के लिए जो नाना इंतजाम,धन, साधनों की जरूरत होती थी उसे कहीं भी बैठे बैठे या लेटे लेटे या चलते फिरते भी मनुष्य स्क्रीन पर अपनी अंगुली के स्पर्श से ही सब कुछ सब कही करते रहने का साधन पा गया है।

दुनिया भर में कहीं भी कुछ भी करना, देखना, भेजना या मंगाना हों तो यह आभासी दुनिया के मनुष्य के मन की कल्पना नहीं रहीं ,आभासी दुनिया का साकार सत्य बन गया है। 
 
यही वह बिन्दु है कि निरक्षर से लेकर प्रकांड विद्वान और अरबपति से लेकर कंगाल, किसी भी देश के राष्ट्रपति से लेकर आम जनता सब कोई दुनिया भर के किसी भी कोने में रहते हुए इस आभासी दुनिया को अपनी अंगुलियों की गतिविधियों से अपने जीवन में साकार कर सकता है।

भले ही प्राकृतिक रूप से मनुष्य को कुछ भी हासिल नहीं हो पा रहा हो पर आभासी दुनिया सब कुछ करते रहने का वास्तविक अनुभव देने के बजाय करते रहने का आभास तो भरपूर दे ही रही है। आभासी दुनिया में सत्य से साक्षात्कार भले ही नहीं हो पा रहा है पर स्वप्न के सत्य होने का आभासी अनुभव हम सबको बिना किसी भेदभाव के तो हो ही रहा है। आज के काल का यह दृश्य आज की आभासी दुनिया का वास्तविक सत्य है!
 
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