दर्द को अपने पन्नों पर उड़ेल जातें है
तब पढ़ने वालों के अश्क छलक जाते हैं
ना देखा होता है कभी उन्हें पहचान सिर्फ़ शब्दों की होती है
ख़ुश होते ग़ैरों की ख़ुशी देखकर ना कभी भी द्वेषभाव मन में लाते हैं
उनके ख़्वाब टूट गए होते हैं जीवन में ऐसे
की जैसे दरख़्तों की शाख़ से पत्ते टूटकर बिखर जाते हैं
जो वचन दे दें किसी को वो, कभी नहीं मूकर पाते हैं
ये ऐसे इंसा होते हैं जो दुनिया से जाने के बाद भी याद रह जाते हैं
टिकी है दुनिया ऐसे फ़रिश्तों की जांबाज़ी पर वरना इस स्वार्थ से भरी दुनिया में लोग कैसे ख़ुद को सम्भाल पाते हैं