Lord Narsimha Jayanti 2026: वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को नृसिंह जयन्ती के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष 2026 में 30 अप्रैल, गुरुवार को उनकी जयंती रहेगी। इस दिन भगवान विष्णु राक्षस हिरण्यकशिपु का वध करने हेतु नृसिंह अर्ध सिंह (शेर) तथा अर्ध नर (मनुष्य) के रूप में प्रकट हुए थे। इनको नरहरि, उग्रवीर, महाविष्णु आदि नामों से भी जाना जाता है। नृसिंह भगवान श्री हरि विष्णु के चौथे और आवेश अवतार हैं और उनकी महिमा और शक्ति से हम सभी परिचित हैं, लेकिन उनके स्वरूप और अस्तित्व से जुड़े कुछ ऐसे रहस्य हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। यहां नृसिंह अवतार से जुड़े 5 अनसुने रहस्य दिए गए हैं।
।।ॐ नृम नृम नृम नरसिंहाय नमः।।
1. नृसिंह भगवान के 9 स्वरूप (नवनृसिंह)
9 रूप: शास्त्रों में उनके 9 अलग-अलग स्वरूपों का वर्णन है, जिन्हें 'नवनृसिंह' कहा जाता है। कहीं पर 12 का उल्लेख मिलता है। इनमें लक्ष्मी नृसिंह (शांत और प्रसन्न रूप), योग नृसिंह (ध्यान मुद्रा में), और अट्टहास नृसिंह (अत्यंत उग्र हंसी वाले) प्रमुख हैं। आंध्र प्रदेश के अहोबिलम में इन नौ रूपों के अलग-अलग मंदिर भी स्थित हैं।
प्रमुख स्वरूपों के नाम: लक्ष्मी नृसिंह, उग्र नृसिंह, क्रोध नृसिंह, मलोल नृसिंह, ज्वल नृसिंह, वराह नृसिंह, भार्गव नृसिंह, करन्ज नृसिंह, योग नृसिंह, छत्रावतार नृसिंह, पावन नृसिंह और पमुलेत्रि नृसिंह। भगवान नृसिंह की अर्धांगिनी के रूप में देवी लक्ष्मी को दर्शाया जाता है तथा उनके इस संयुक्त रूप को श्री लक्ष्मी-नृसिंह कहते हैं।
नृसिंह भगवान का मुख्य स्वरूप: नृसिंह भगवान को चतुर्भुज, षट्भुज तथा दशभुज रूप में दर्शाया जाता है। षट्भुज रूप में वे अपनी 4 भुजाओं में शंख, चक्र, गदा तथा पद्म अर्थात् कमल पुष्प धारण करते हैं तथा दो भुजाओं से वे हिरण्यकशिपु का उदरभेदन करते हैं। उनका मुख सिंह के समान और शेष देह मनुष्य रूप में है। उनके तीक्ष्ण नख एवं दन्त हैं तथा वे गले में हिरण्यकशिपु की आंतों को माला के रूप में धारण किए हुए हैं। उनके सौम्य चित्र में उन्हें गोद में भक्त प्रह्लाद को विराजमान दर्शाया जाता है।
2. वह स्थान जहाँ भगवान ने क्रोध शांत किया
हिरण्यकशिपु के वध के बाद भी भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हो रहा था। लोक कथाओं के अनुसार, दक्षिण भारत की एक पर्वत श्रृंखला पर उन्होंने अपना क्रोध शांत किया था।
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि आंध्र प्रदेश के पन्नाका नृसिंह मंदिर में भगवान को गुड़ का शर्बत (पानकम) चढ़ाया जाता है। जब मूर्ति के मुंह में शर्बत डाला जाता है, तो आधा शर्बत मूर्ति पी लेती है और बाकी बाहर गिर जाता है। इसे भगवान के क्रोध को ठंडा करने का प्रतीक माना जाता है।
3. 'शरभ' और 'नृसिंह' का युद्ध
पुराणों के अनुसार, जब नृसिंह भगवान का क्रोध ब्रह्मांड के लिए खतरा बनने लगा, तब भगवान शिव ने शरभ अवतार (पक्षी, सिंह और मनुष्य का मिश्रण) लिया था। कुछ ग्रंथों के अनुसार, शरभ ने नृसिंह को शांत किया, जबकि वैष्णव मत के अनुसार, नृसिंह भगवान ने गण्डबेरुण्ड (दो सिर वाला विशाल पक्षी) का रूप लेकर शरभ से युद्ध किया था। यह देवताओं के बीच शक्ति संतुलन का एक अद्भुत रहस्य है।
4. आदि शंकराचार्य और 'करवलम्बम'
जब आदि शंकराचार्य एक उग्र तांत्रिक के चंगुल में फंस गए थे और उनकी बलि दी जाने वाली थी, तब उन्होंने भगवान नृसिंह का मानसिक स्मरण किया। भगवान नृसिंह ने तुरंत प्रकट होकर तांत्रिक का वध किया और शंकराचार्य की रक्षा की। इसी समय शंकराचार्य ने प्रसिद्ध 'लक्ष्मी नृसिंह करवलम्बम स्तोत्र' की रचना की थी। यह इस बात का प्रमाण है कि नृसिंह केवल सतयुग तक सीमित नहीं, बल्कि हर युग में भक्तों की पुकार सुनते हैं।
5. अहोबिलम: जहाँ खंभा आज भी मौजूद है
आंध्र प्रदेश के अहोबिलम को नृसिंह अवतार की वास्तविक स्थली माना जाता है। यहाँ एक विशाल पहाड़ के बीच में एक दरार है, जिसे 'उग्र स्तम्भ' कहा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि यह वही खंभा है जिसे हिरण्यकशिपु ने लात मारी थी और जिससे भगवान नृसिंह प्रकट हुए थे। यहाँ की चट्टानें आज भी लाल रंग की दिखाई देती हैं, जिसे लोग हिरण्यकशिपु के रक्त का निशान मानते हैं।
विशेष: क्या आप जानते हैं कि भगवान नृसिंह की पूजा का सबसे प्रभावी समय प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) माना जाता है? क्योंकि उन्होंने इसी समय पर वरदान की सभी शर्तों को पूरा करते हुए असुर का वध किया था।