Dharmaraj Dashami 2026: धर्मराज दशमी कब और क्यों मनाई जाती है? पढ़ें कथा

WD Feature Desk

शुक्रवार, 27 मार्च 2026 (12:15 IST)
Importance of DharmaRaj Dashami: धर्मराज दशमी एक हिंदू पर्व है, जो मुख्यतः उत्तर भारत और नेपाल के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाता है। इसे विशेष रूप से न्याय के देवता धर्मराज यानी यमराज को समर्पित माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार धर्मराज दशमी व्रत सबसे पहले युधिष्ठिर ने अपने खोए हुए भाइयों को पाने के लिए यक्ष की कृपा से यह व्रत रखा था।ALSO READ: कामदा एकादशी की पौराणिक व्रत कथा Kamada Ekadashi Katha
 
इस व्रत के संबंध में भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था। यदि किसी का यात्रा पर गया पति किसी कारणवश लौट नहीं पा रहा है तो पत्नी को यह व्रत रखना चाहिए तथा वैकुंठ में जाने की इच्छा से भी यह व्रत रखा जाता है। वर्ष 2026 में धर्मराज दशमी पर्व 28 मार्च, दिन शनिवार को रखा जा रहा है।
 
 

आइए जानते हैं इस व्रत के बारे में...

 

धर्मराज दशमी कब मनाई जाती है?

धर्मराज दशमी का त्योहार खास तौर पर चैत्र शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। आमतौर पर कई स्थानों पर धर्मराज दशमी कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भी मनाई जाती है। यह तिथि अक्सर दीपावली के आसपास पड़ती है, यानी दिवाली के कुछ दिनों बाद। जहां कुछ जगहों पर यह पर्व भाई-बहन के स्नेह से जुड़ा हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे भाई दूज में होता है।
 

क्यों मनाई जाती है?

इस पर्व के पीछे धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं हैं:
 
* धर्मराज (यमराज) की पूजा:
इस दिन लोग यमराज की पूजा करते हैं, जिन्हें न्याय और कर्मों का फल देने वाला देवता माना जाता है।
 
* पापों से मुक्ति की कामना:
मान्यता है कि इस दिन व्रत और पूजा करने से व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति मिलती है और मृत्यु के बाद अच्छे फल प्राप्त होते हैं।
 

कैसे मनाते हैं?

* लोग सुबह स्नान करके व्रत रखते हैं।
* यमराज की पूजा और दीपदान करते हैं।
* पितरों की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।
 

कथा-कहानी

पुराणों में धर्मराज से संबंधित कई कथाएं मिलती हैं, उनमें से एक कथा ज्यादा प्रचलित है। जिसके अनुसार यह कहते हैं कि एक ब्राह्मणी मृत्यु के बाद यम के द्वार पहुंची। वहां उसने कहा कि मुझे धर्मराज के मंदिर का रास्ता बताओ। एक दूत ने कहा कि कहां जाना है? वो बोली मुझे धर्मराज के मंदिर जाना है। वह महिला बहुत दान पुण्य वाली थी। उसे विश्वास था कि धर्मराज के मंदिर का रास्ता अवश्‍य खुल जाएगा। दूत ने उसे रास्ता बता दिए। वहां देखा कि बहुत बड़ा सा मंदिर है। 
 
वहां हीरे मोती जड़ती सोने के सिंहासन पर धर्मराज विराजमान है और न्यायसभा ले रहे हैं। न्याय नीति से अपना राज्य सम्भाल रहे थे। यमराज जी सबको कर्मानुसार दंड दे रहे थे। ब्राह्मणी ने जाकर प्रणाम किया और बोली- मुझे वैकुंठ जाना हैं। धर्मराज जी ने चित्रगुप्त से कहा लेखा–जोखा सुनाओ। चित्रगुप्त ने लेखा सुनाया। सुनकर धर्मराज जी ने कहां तुमने सब धर्म किए पर धर्मराज जी की कहानी नहीं सुनी। वैकुंठ में कैसे जाएगी?
 
महिला बोली, 'धर्मराज जी की कहानी के क्या नियम हैं? धर्मराज जी बोले, 'कोई एक साल, कोई छ: महीने, कोई सात दिन ही सुने पर धर्मराज जी की कहानी अवश्य सुने। फिर उसका उद्यापन कर दें। उद्यापन में साड़ी ब्लाउज का बेस, लोटे में शक्कर भरकर, पांच बर्तन, काठी, छतरी, चप्पल, बाल्टी, रस्सी, टोकरी, लालटेन, छ: मोती, छ: मूंगा, यमराज जी की लोहे की मूर्ति, सोने की मूर्ति, चांदी का चांद, सोने का सूरज, चांदी का सातिया ब्राह्मण को दान करें। प्रतिदिन चावल का सातिया बनाकर कहानी सुने।
 
यह बात सुनकर ब्राह्मणी बोली, हे धर्मराज मुझे सात दिन वापस पृथ्वीलोक पर भोज दो। मैं कहानी सुनकर वापस आ जाऊंगी। 
 
धर्मराज जी ने उसका लेखा–जोखा देखकर सात दिन के लिए पुन: पृथ्वीलोक भेज दिया। ब्राह्मणी जीवित हो गई। ब्राह्मणी ने अपने परिवार वालों से कहा, मैं सात दिन के लिए धर्मराज जी की कहानी सुनने के लिए वापस आई हूं। इस कथा को सुनने से बड़ा पुण्य मिलता है।

उसने चावल का सातिया बनाकर परिवार के साथ 7 दिनों तक धर्मराज जी की कथा सुनी। सात दिन पूर्ण होने पर धर्मराज जी ने अपने दूत भेजकर उसे वापस ऊपर बुला लिया। अंत में ब्राह्मणी को वैकुंठ में श्रीहरी के चरणों में स्थान मिला। 
 
मान्यता के अनुसार इस व्रत को रखने से सभी तरह की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यदि कन्याएं रखें तो सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है। यदि रोगी रखें तो रोग दूर हो जाता है। साथ ही पुत्र की कामना, अच्छी खेती, अच्छे राजकार्य के लिए भी यह व्रत रखा जाता है।

कुल मिलाकर, धर्मराज दशमी का उद्देश्य धर्म, न्याय और अच्छे कर्मों की महत्ता को याद करना है। धर्मराज दशमी न केवल एक धार्मिक पर्व है, बल्कि यह जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने का एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। यह दिन हमें यह सिखाता है कि अपने कर्मों का महत्व समझें और जीवन को सद्गुणों के साथ जीने का प्रयास करें।
 
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