35 सालों से भाजपा का गढ़ है इंदौर, जानिए आखिरी बार कांग्रेस से किसे मिली थी जीत

Indore Lok Sabha Seat: भाजपा ने लोकसभा चुनाव 2024 के लिए एक बार फिर वर्तमान सांसद शंकर लालवानी पर भरोसा जताया है। वहीं, कांग्रेस ने युवा चेहरे अक्षय कांति बम पर दांव लगाया है। पिछला चुनाव शंकर ने रिकॉर्ड 5 लाख 47 हजार से ज्यादा वोटों से जीता था। 2019 में उन्होंने कांग्रेस के पंकज संघवी को हराया था। पिछले चुनाव के मुकाबले कांग्रेस की स्थिति ज्यादा खराब हुई है, ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं कि शंकर अपना ही पिछला रिकॉर्ड तोड़ दें। 
 
इंदौर की आठों सीटों पर भाजपा का कब्जा : वर्ष 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इंदौर जिले की सभी आठों सीटों पर कब्जा किया था, जबकि 2018 में कांग्रेस इंदौर शहर की विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 1, राऊ और देपालपुर सीट जीतने में सफल रही थी। उस दौर में लालवानी करीब साढ़े 5 लाख वोटों से चुनाव जीते थे। इस बार भाजपा की स्थिति पहले से ज्यादा मजबूत दिखाई दे रही है। 
 
इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव से पहले कई कांग्रेस नेता भाजपा में शामिल हो गए हैं। पूर्व विधायकद्वय संजय शुक्ला और विशाल पटेल समेत कई अन्य कांग्रेस कार्यकर्ता भी शामिल हैं। इन नेताओं के भाजपा में आने से कांग्रेस की उम्मीदों को झटका ही लगेगा। 
 
‍विकास के मुद्दे पर मांगेंगे वोट : पिछली बार से ज्यादा वोटों से जीत के प्रति आश्वस्त शंकर लालवानी ने वेबदुनिया से बातचीत में बताया कि भाजपा विकास के मुद्दे पर ही लोगों के बीच जाएगी। इन्फ्रास्ट्रक्चर का मुद्दा हो या फिर रेल कनेक्टीविकटी, रोड कनेक्टीविटी हो या फिर एयर कनेक्टीविटी सभी क्षेत्रों में पहले से स्थिति बेहतर हुई है। ग्रामीण इलाकों में भी विकास को गति मिली है। उन्होंने कहा कि इंदौर उम्मीदों का शहर है। अन्य शहरों की ग्रोथ रेट 12 फीसदी है, वहीं इंदौर की ग्रोथ 14 फीसदी है। हमारी अगली बड़ी कोशिश यह होगी कि हम इंदौर को सोलर सिटी बनाएं। 
 
इंदौर सीट पर भाजपा का 35 साल से कब्जा : लोकसभा चुनाव के मामले में इंदौर के पिछले इतिहास पर नजर डालें तो 35 साल से यहां पर भाजपा का कब्जा है। 1984 में आखिरी बार इंदौर सीट से कांग्रेस के प्रकाश चंद्र सेठी चुनाव जीते थे। 1952 में पहला चुनाव कांग्रेस के नंदलाल जोशी ने जीता था, जबकि 1957 में कांग्रेस के ही कन्हैयालाल खादीवाला चुनाव जीते थे। 1962 में यह सीट कांग्रेस से छिन गई, जब कॉमरेड होमी दाजी स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने में सफल रहे थे। 

 
सेठी बने देश के गृहमंत्री : वर्ष 1967 में प्रकाशचंद्र सेठी इस सीट से सांसद बने। 1971 के चुनाव में एक ‍बार फिर उन्हें जीत मिली, लेकिन 1972 में वे मध्य प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने तो उन्हें यह सीट छोड़नी पड़ी। इसके बाद हुए उपचुनाव में श्रमिक नेता रामसिंह भाई वर्मा को जीत मिली। आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में एक बार फिर कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी। तब जनता पार्टी के टिकट पर कल्याण जैन विजयी रहे थे। 1980 से 1989 तक फिर इस सीट से प्रकाश चंद्र सेठी बने। सेठी 1982 से 1984 तक देश के गृहमंत्री भी रहे।   
 
लगातार 8 बार जीतीं ताई : हालांकि 1989 के चुनाव में प्रकाश चंद्र सेठी को भाजपा की सुमित्रा महाजन के मुकाबले हार का सामना करना पड़ा। इस चुनाव में महाजन ने सेठी को 11 लाख 11 हजार वोटों से हराया था। इसके बाद कांग्रेस कभी इस सीट से चुनाव नहीं जीत पाई। ताई के नाम से मशहूर श्रीमती महाजन ने इस सीट पर लगातार 8 बार (1989 से 2014) भाजपा का झंडा बुलंद किया। 2019 में शंकर लालवानी रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीते थे। 
 
कौन हैं अक्षय कांति बम : अक्षय विधानसभा चुनाव 2023 में भी क्षेत्र क्रमांक 4 से दावेदार थे, लेकिन उस समय काफी प्रयासों के बावजूद उन्हें टिकट नहीं मिला। अक्षय की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे उच्च शिक्षित हैं और लॉ एवं मैनेजमेंट कॉलेज का संचालन करते हैं। करीब 10 वर्षों से कांग्रेस में सक्रिय अक्षय ने एमबीए और एलएलबी की डिग्री हासिल की है। 
 
अक्षय लॉ और मैनेजमेंट कॉलेज संचालित करते हैं। कांग्रेस का दावा है कि वह इंदौर के अब तक के सबसे शिक्षित और युवा प्रत्याशी हैं। अक्षय ने इंदौर के डेली कॉलेज से स्कूली पढ़ाई की है। इसके अलावा उन्होंने एमबीए, एलएलबी और बीकॉम ऑनर्स की डिग्री हासिल की है। वे तकरीबन 10 वर्षों से कांग्रेस में सक्रिय हैं।
 
जातीय समीकरण : इंदौर जिले में मतदाताओं की संख्या 27 लाख 84 हजार से के लगभग है। इंदौर के विधानसभा क्षेत्र क्रमांक 5 में सर्वाधिक 4 लाख 15 हजार 951 मतदाता हैं। हालांकि इंदौर जिले का महू विधानसभा क्षेत्र लोकसभा चुनाव में धार संसदीय क्षेत्र का हिस्सा है। महू में कुल मतदाताओं की संख्या 2 लाख 81 हजार 600 से ज्यादा है। जहां तक जातीय समीकरण की बात है तो इंदौर शहर की आबादी मिलीजुली है। ग्रामीण क्षेत्रों में जरूर पाटीदार, खाती और कलौता समाज के वोटरों की संख्या ज्यादा है।
 

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