झुकने की यह रफ्तार जारी रही तो मंदिर के जल्द ही जमींदोज होने की आशंका बनी हुई है, लेकिन मंदिर के संरक्षण का जिम्मा लेने वाला केंद्रीय पुरातत्व विभाग ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया ने अब तक कोई एहतियाती उपाय शुरू नहीं किए हैं।
इस प्रक्रिया के 2 साल बाद मंदिर का दक्षिण-पश्चिमी कोना दबने का सिलसिला फिर शुरू हो गया है। गर्भगृह में स्थित शिवलिंग और कलात्मक जलहरी भी एक तरफ हल्की झुकी हुई है। मंदिर के मंडप में मूर्तियों के आले भी हल्के झुके हुए हैं। स्थानीय युवा और पुरातत्व के जानकार ओम सोनी ने भी मंदिर की दशा को चिंतनीय बताते कहा कि मंदिर की दबती नींव को ठीक नहीं किया गया तो इस ऐतिहासिक धरोहर को ध्वस्त होने से बचाना मुश्किल होगा।
समलूर निवासी ईश्वर ठाकुर ने भी मंदिर के झुकने की पुष्टि करते हुए बताया कि कुछ समय से ऐसा देखा जा रहा है तथा समय रहते कोई उपाय करना जरूरी है। इस बारे में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कंजर्वेशन असिस्टेंट विजय कुमार का कहना है कि बीते साल केमिकल प्रिजर्वेशन का काम हुआ है, मरम्मत के बारे में अभी कोई इस्टीमेट नहीं बना है। बारसूर के मामा-भानजा मंदिर की तर्ज पर समलूर में नागर शैली में निर्मित मंदिर 11वीं शताब्दी में तत्कालीन नागवंशी शासक सोमेश्वर देव की महारानी सोमलदेवी ने बनवाया था।
मंदिर में सावन सोमवार के अलावा महाशिवरात्रि, माघ पूर्णिमा जैसे खास अवसरों पर दर्शनार्थियों की कतार लगती है। महाशिवरात्रि पर मंदिर परिसर के बाहर मेला लगता है। ऐसे में भीड़ के वक्त कोई हादसा होने की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। (वार्ता)