आदिवासी जिलों में भगवान भरोसे हैं बच्चे

देश में सर्वाधिक आदिवासी आबादी वाले राज्यों में शुमार मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों में स्वास्थ्य की दृष्टि से बच्चे घोर उपेक्षा का शिकार हैं। इनमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मामला गर्भवती महिलाओं और बच्चों को जानलेवा बीमारियों से बचाने के लिए लगाए जाने वाले जीवनरक्षक टीकों का है। 
 
मध्यप्रदेश देश के उन राज्यों में है, जहां आदिवासियों की आबादी बहुत अधिक है। राज्य में 51 में से 19 जिले ऐसे हैं जहां आदिवासियों की जनसंख्या 27 से लेकर 89 प्रतिशत तक है। इन जिलों में सीधी, हरदा, रतलाम, बुरहानपुर, सिंगरौली, खंडवा, छिंदवाड़ा, सिवनी, खरगोन, बैतूल, शहडोल, उमरिया, अनूपपुर, धार, मंडला, डिंडोरी, बड़वानी, झाबुआ और आलीराजपुर शामिल हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार इनमें से धार, मंडला, डिंडोरी, बड़वानी, झाबुआ और आलीराजपुर जिलों में तो आदिवासियों की आबादी 55 फीसदी से अधिक है। सबसे ज्यादा आदिवासी आबादी (89 प्रतिशत) आलीराजपुर जिले में है। 
 
लेकिन बच्चों के समग्र टीकाकरण के मामले में इन जिलों की स्थिति बहुत ही खराब है। 2012-13 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एएचएस) के अनुसार इन 19 जिलों में 12 से 23 माह तक की उम्र के बच्चों में संपूर्ण टीकाकरण का औसत प्रतिशत लगभग 61.21 ही है। यानी 39 प्रतिशत बच्चों को संपूर्ण टीकाकरण का लाभ ही नहीं मिल पाता है। यह आंकड़ा प्रदेश के औसत से भी पांच प्रतिशत अधिक है। इतना ही नहीं, इन इलाकों में 5.74 प्रतिशत बच्चे तो ऐसे हैं जिन्हें किसी भी प्रकार का कोई टीका नहीं लग पाता। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि यहां शिशु मृत्यु दर का औसत भी प्रदेश के औसत से काफी अधिक है।
 
शिशु मृत्यु दर से आशय जन्म लेने वाले प्रति हजार बच्चों पर होने वाली मृत्यु से है। एएचएस 2012-13 के अनुसार जहां प्रदेश में शिशु मृत्यु दर का आंकड़ा प्रति हजार 83 था वहीं इन जिलों में यह अपेक्षाकृत रूप से बहुत अधिक औसतन 87.53 था। यह आंकड़ा साफ बताता है कि राज्य के आदिवासी बहुल जिलों में नवजात शिशुओं और बच्चों की सेहत की देखभाल ठीक से नहीं हो पा रही है। समय पर जीवन रक्षक टीके न लगने से बच्चे जानलेवा बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। यही हाल मातृ मृत्यु दर का भी है। एएचएस 2012-13 के अनुसार प्रदेश स्तर पर मातृ मृत्यु दर का औसत आंकड़ा प्रति एक लाख माताओं पर 227 था वहीं इन आदिवासी बहुल जिलों में यह आंकड़ा करीब 288 था। 
 
अत्यंत पिछड़े और गरीब इलाके होने के कारण इन जिलों में शिक्षा का प्रसार भी कम है। एएचएस के अनुसार प्रदेश में जहां प्रभावी साक्षरता की दर 76.9 थी वहीं इन 19 जिलों में प्रभावी साक्षरता औसत करीब 71.21 प्रतिशत ही है। यह आंकड़ा बताता है कि शिक्षा और जागरूकता के अभाव में लोगों तक बच्चों की सेहत के बारे में सही जानकारी नहीं पहुंच पाती और बच्चे जीवनरक्षक टीकों से वंचित रह जाते हैं।
 
यहां एक उदाहरण देना ही पर्याप्त होगा कि झाबुआ जिले में आदिवासियों की आबादी 87 प्रतिशत है और वहां प्रभावी साक्षरता की दर 50 प्रतिशत है। जबकि बच्चों के संपूर्ण टीकाकरण का प्रतिशत वहां सिर्फ 57.4 ही है। यदि झाबुआ को ही आधार मान लिया जाए तो यह बात स्पष्ट है कि प्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में बच्चों का जीवन बचाने के लिए सघन जागरूकता अभियान चलाए जाने की आवश्यकता है। 

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