विपश्यना: सुलभ और सार्वजनीन

- वल्लभ भंसाल

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हर कोई प्राणी चाहता है कि उसकी सब इच्छाएँ पूरी हों। मैं भी ऐसा ही एक प्राणी हूँ और अगर इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं तो भी चाहता हूँ कि मेरी मन की शांति बनी रहे। दूसरे प्राणियों के बारे में तो नहीं कह सकते, परंतु मनुष्यों में तो देखते हैं कि हमारी इच्छा-वृत्ति के कारण हमारे मन में वासना, लालच, गुस्सा, दूसरों का सुख देखकर जलने की भावना, इच्छापूर्ति में रुकावट मानने से दूसरों के प्रति द्वेष या बदले की भावना, इच्छाएँ पूरी होने पर घमंड या अत्यंत सुखी और दूसरों से ऊँचा होने की भावना-वगैरह भरी ही रहती हैं।

और चूँकि, भले वे हमारे माता-पिता गुरु, मित्र, नेता मुझे सब में ऐसी भावनाएँ कम या अधिक देखने को मिलती हैं। इसलिए मेरे में भी ऐसी भावनाएँ होना मुझे कुछ हद तक नॉर्मल प्रतीत होता था। मेरे माता-पिता उत्कृष्ट गाँधीवादी थे और पिताजी तो सेवा, ज्ञान, अध्यात्म-प्रेम हर आयाम में परिपूर्ण दिव्यात्मा थे। हर समझदार व्यक्ति अपने विकारों में से निकलने का प्रयास करता है। घर के संस्कारों के कारण मेरे लिए तो यह और भी सहज था। घर में अपनाया हुआ श्रद्धा मार्ग या संप्रदाय का अनुसरण करते हुए मैं ऐसा करता रहा। कुछ हद तक सफल भी हुआ।

देखता भी हूँ कि चाहे जो भी शिक्षा हो हिन्दू, बौद्ध, जैन, ईसाई, इस्लाम, सिख, पारसी, यहूदी या इन्हीं परंपराओं की अनेक शाखा-उपशाखाओं में से कोई भी हो इन सबका थोड़ा लाभ तो होता ही है। लेकिन इन मार्गों में प्रचलित केवल पूजा-अर्चना, स्वाध्याय, पठन-पाठन से हमें जैसे चाहिए वैसे फल नहीं मिलते। इसीलिए शांति की तलाश में, चमत्कारों के शोध में नित नए तरीकों को श्रद्धा से, अंधश्रद्धा से आजमता रहा। मानो भिन्न-भिन्न ट्रेनों में बैठता और हर बार वह दो-चार स्टेशन तक जाकर छोड़ देता।

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ऐसे में केवल यह सुनकर कि बार-बार बैठो श्रद्धा रखो, लक्ष्य तक पहुँच जाओगे, अस्वीकार्य होने लगा। ऊपर-ऊपर की शांति से संतोष नहीं होता था। यह बात कचोटती थी कि आज के वैज्ञानिक युग में जहाँ हम सारी जरूरतों का वैज्ञानिक हल पा लेते हैं, शांति का प्रभावी और सुलभ उपाय क्यों नहीं पा रहा हूँ।

25 वर्षों के शोध के बाद विपश्यना सीखने का अवसर मिला। एक सत्य तुरंत उभरकर आया। वह यह कि अब तक सफलता इसलिए नहीं मिलती थी, क्योंकि सब पवित्र मार्गों में से अनुभव का गुणगान बहुत था लेकिन आग्रह मिट गया जो कि इनका हृदय था। हमें किसी भी चीज से तभी होता है जब हम उसका उपयोग, अनुभव के स्तर पर अपने व्यवहार में करने लगते हैं। डॉक्टर या शिक्षक की हम कितनी ही पूजा कर लें, हम निरोग या शिक्षित नहीं हो सकते। दूसरा सत्य यह कि विपश्यना जैसा सरल, सुलभ और सार्वजनीन मार्ग पहले नहीं मिला था।

विपश्यना भारत की अतिप्राचीन 'अनुभव विद्या' है। स्वयं को अनुभव के स्तर पर जानने का विज्ञान।'विपश्यना' शब्द का अर्थ ही विज्ञान होता है। जैसे-जैसे हम स्वयं के स्वरूप को जानने लगते हैं, उसमें सुधार होने लगता है। कोई व्यक्ति रोगी होने के बावजूद स्वयं को स्वस्थ माने और औषधि नहीं लेता तो इस तरह उसका स्वास्थ्य नहीं सुधरता। अगर हम तटस्थ होकर यह जान लें कि रोग हमारे भीतर है तो हम उसका उपचार अपने भीतर करने ही लगेंगे।

अगर अपनी कमजोरियों का अनुभव यदि स्पष्ट हो जाए तो हम उनमें से निकल जाएँगे। वक्त तो लग सकता है किंतु रास्ता मिल जाता है। अगर हमें क्रोध की आग का अनुभव होने लगे तो हमें तुरंत समझ में आ जाएगा कि किसी दूसरे पर हमारे क्रोध की आग का कोई प्रभाव होगा या नहीं, लेकिन हम उससे तुरंत और अवश्य जलेंगे।

विपश्यना का काम श्वास से प्रारंभ होता है। श्वास हमारे अस्तित्व का सबसे बड़ी प्रतीक है। यह सरल-सा प्रतीत होने वाला काम ही अपने बारे में कई सत्यों को उजागर करने लगता है। चित्त की योग्यता में थोड़ा विकास होने पर उसे अपने शरीर की सच्चाई को अनुभव करने की विद्या में लगा दिया जाता है। बस, इतना ही करना है। अपनी सच्चाई को देखते-देखते अपने स्वभाव को पलटना।

स्वभाव इसलिए पलटता है, क्योंकि श्वास और शरीर का संवेदनाओं का हमारे मानस से गहरा संबंध है। जबकि हम हमारे मानस को सीधे नहीं देख पाते, श्वास और शरीर को देखते-देखते उसका पुट-पुट खोल सकते हैं। यह लाखों लोगों का अनुभव है। विपश्यना करीब साढ़े दस दिन के शिविर में किसी केंद्र में रहते हुए ही सीखनी पड़ती है।

इन दस दिनों के लिए सर्वमान्य शील-सदाचार के नियम जैसे अहिंसा, चोरी नहीं करना इत्यादि का पालन अनिवार्य है। और चूँकि मन को उसके स्वभाव के विपरीत अपने भीतर की सच्चाई जानने के लिए लगाना है और उसे एक्सपर्ट बनाना है, उसे बाहर जाने से रोकना होता है। इस कारण शिविर के पहले नौ दिनों तक पूर्ण रूप से मौन रहना, अपने में रहना अनिवार्य होता है। अगर सोचें तो यह बहुत आसान है। आखिर भला हम जब सोते हैं, कोई काम में व्यस्त होते हैं या बीमार होते हैं तो चुप ही रहते हैं। और इस तरह अगर मौन की उपयोगिता समझ लें तो साधारण व्यक्ति भी इस परम उपकारी मौन को सहज अपना लेता है। विपश्यना का सारा काम पुराने साधकों की कृतज्ञता तथा अन्य लोग भी मान्यता के अंधकार से निकले, ऐसी भावना से दिए हुए दान से ही चलता है। विपश्यना किसी भी प्रकार से शुल्क या फीस बिना सर्वथा मुफ्त सिखाई जाती है।

विपश्यना विद्या पिछले चालीस वर्षों से भारत और विश्व में फिर से सुलभ हुई है- भारत की अत्यंत प्राचीन और कई शास्त्रों में बताई गई विद्या- करीब 2000 वर्ष तक ब्रह्म देश या बर्मा के कुछ लोगों के पास रत्न की तरह सुरक्षित रही। सत्यनारायण गोयन्का 1969 में अपने महान गुरु सयाजी उ बा खिन के आदेश पर भारत आए। पू. गोयन्काजी के विलक्षण, करुणामय व कठिन परिश्रम से विपश्यना आज विश्व के 150 देशों में उपलब्ध है, इनमें से भारत में 60 केंद्र हैं। सभी केंद्रों में एक जैसी ही शिक्षा उपलब्ध हैं। चूँकि विपश्यना मार्ग में किसी देवी, देवता, क्रिया-कांड, गुरु पूजा या कृपा