विक्रम संवत सबसे प्राचीन होने के बाद भी भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर क्यों नहीं बना? जानिए 3 बड़े कारण

WD Feature Desk

सोमवार, 9 मार्च 2026 (12:50 IST)
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में कई प्रकार के संवत और पंचांगों का प्राचलन था लेकिन सभी का आधार विक्रम संवत का फॉर्मेट ही था। भारत में विक्रम संवत सांस्कृतिक और धार्मिक रूप से सबसे अधिक लोकप्रिय है, फिर भी शक संवत को राष्ट्रीय कैलेंडर बनाया गया। आखिर इसके के पीछे क्या कारण रहे हैं?
 

विक्रम संवत को क्यों नहीं बना राष्ट्रीय कैलेंडर?

ऐसा माना जाता है कि भारत में जिन लोगों के हाथों में सत्ता सौंपी गई उनमें से अधिकतर की विचारधारा का आधार साम्यवाद और धर्मनिर्पेक्षता था। उन्हें ऐसा लगता था कि भले ही विक्रम संवत की व्यापकता और स्वीकार्यता हो लेकिन यह एक हिंदू जनता के संवत के रूप में प्रतिष्‍ठित है। सरकार चाहती थी कि आजाद भारत के लिए एक ऐसा कैलेंडर होना चाहिए जो किसी एक क्षेत्र या विशेष समुदाय तक सीमित न लगे। यही कारण था कि विक्रम संवत को उत्तर भारत के हिंदुओं का कैलेंडर मान लिया गया जबकि इसके पीछे कोई ठोस कारण नहीं था। विक्रम संवत संपूर्ण भारत में 2 रूपों में प्रचलित था। दक्षिण भारत में अमान्त और उत्तर भारत में पूर्णिमान्त। आज भी यह कैलेंडर भारत में प्रचलित है शक संवत नहीं। 
 

कैलेंडर सुधार समिति का प्रस्ताव

तात्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय कैलेंडर चुनने के लिए 1952 में 'कैलेंडर सुधार समिति' का गठन किया गया था, जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध वैज्ञानिक मेघनाद साहा ने की थी। इस कमेटी ने शक संवत में सुधार करके रिकमेंडेशन दी कि शक संवत ईसाई ग्रेगोरियन कैलेंडर से ज्यादा साम्यता रखता है और सुधार के बाद इसमें किसी भी प्रकार की जटिलता नहीं है इसलिए भारत का राष्ट्रीय कैलेंडर शक संवत को बनाया जाना चाहिए। सरकार ने इस समिति के प्रस्ताव को स्वीकार करके 22 मार्च 1957 को इसे राष्ट्रीय कैलेंडर घोषित करके सभी सरकारी दफ्तरों में और आधिकारिक कार्यों में इसका उपयोग करने के आदेश दिए। आम तौर पर, इस कैलेंडर का नववर्ष 22 मार्च (लीप वर्ष में 21 मार्च) से प्रारंभ होता है जो वैज्ञानिक रूप से दिन और रात के बराबर होने का समय है। शक संवत आमतौर पर ग्रेगोरियन कैलेंडर से 78 साल पीछे और विक्रम संवत से 135 साल पीछे है।
 
कहा जाता है कि शक संवत का उपयोग दक्षिण भारत के महान राजवंशों और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में एक समान रूप से किया जाता रहा था। भारत के अधिकांश प्राचीन शिलालेखों और ऐतिहासिक दस्तावेजों में शक संवत का उल्लेख अधिक स्पष्टता और निरंतरता के साथ मिलता है। शकों ने भारत पर बहुत लंबे काल तक राज्य किया था।
 

शक संवत को अपनाने के 3 बड़े कारण:

1. यह अंतराष्ट्री ग्रेगोरियन कैलेंडर से ज्यादा साम्यता रखता है इसलिए भी इसकी उपयोगिता बढ़ जाती है।
2. वैज्ञानिक सटीकता और खगोलीय गणना पर आधारित कैलेंडर। इसका नववर्ष (22 मार्च) हमेशा वसंत विषुव के साथ मेल खाता है, जब दिन और रात बराबर होते हैं।
3. इसे उत्तर के कुषाणों से लेकर दक्षिण के सातवाहन, चालुक्य और राष्ट्रकूट राजाओं ने भी अपनाया था। इसलिए यह अखिल भारतीय स्वीकार्यता रखता है।
 

शक संवत किसने चलाया था?

ऐसा कहते हैं कि जब विदेशी आक्रांता शकों ने भारत पर आक्रमण करके उज्जैन पर शासन किया तो उन्होंने अपने नाम पर 78 ईस्वी में एक नया संवत प्रारंभ कर दिया। हालांकि शक कौन थे इस पर इतिहासकारों में मतभेद है। शक और शाक्य दोनों में फर्क है। प्रचलित मान्यता अनुसार शाक्य बौद्ध थे और शक विदेशी थे। हालांकि शक कौन थे, इस पर विवाद है। 
 
शक संभवतः उत्तरी चीन तथा यूरोप के मध्य स्थित झींगझियांग प्रदेश के निवासी थे। कुषाणों एवं शकों का कबीला एक ही माना जाता है। हालांकि यह शोध का विषय है। इतिहाकारों में इसको लेकर मतभेद हैं। इतिहासकार मानते हैं कि शक प्राचीन मध्य एशिया में रहने वाली स्किथी लोगों की एक जनजाति या जनजातियों का समूह था, जो सीर नदी की घाटी में रहता था। कहते हैं कि वे मध्य एशिया से खदेड़े गए थे तब उन्होंने सिंध पर आक्रमण करके उसे अपने कब्जे में ले लिया था। सिंध से वे देश के अन्य हिस्सों में फैल गए। सिंध से पंजाब, सौराष्ट्र, मथुरा, नासिक और उज्जैन तक इन्होंने अपना शासन विस्तार कर लिया था। उन्होंने ही शक संवत की शुरुआत की थी।
 

विक्रम संवत क्या है?

शक संवत से 135 साल पहले उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने 57 ईस्वी पूर्व में भारत के लिए एक सर्वमान्य कैलेंडर को स्थापित करने के लिए विद्वानों की एक टीम से एक ऐसा कैलेंडर बनने का आदेा दिया जो संपूर्ण भारत में मान्य हो। महान ज्योतिषियों और खगोलविदों ने मिलकर भारत के सभी पंचांग और कैलेंडर की तिथि, व्रत और त्योहारों को जानकर नक्षत्र, चंद्र और सूर्य की गति पर आधारित एक कैलेंडर बनाया गया जिसका नाम 'कृत कैलेंडर रखा गया। इसके बाद जब उज्जैन के सम्राट का एकछत्र शासन समाप्त हो गया तो इस कैलेंडर को 'मालव कैलेंडर' कहा जाने लगा और अंत में गुप्त काल में इसे 'विक्रम संवत' नाम दिया गया।

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