ओम शांति ओम : अपेक्षानुरूप नहीं

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*यू/ए *18 रील
निर्माता : गौरी खान
निर्देशक : फरहा खान
संगीत : विशाल शेखर
कलाकार : शाहरुख खान, दीपिका पादुकोण, श्रेयस तलपदे, अर्जुन रामपाल, किरण खेर
रेटिंग : 3/5

फरहा के दिमाग में 1975 के आसपास बनी फिल्मों की कुछ यादें हैं। जब नायिकाएँ नखरे दिखाती थीं। हीरो शूटिंग पर घंटों देरी से पहुँचते थे। कलाकारों में एक प्रकार का घमंड था।

उन फिल्मों में माँ का अहम किरदार हुआ करता था। एक अदद दोस्त होता था जो अपनी दोस्ती के लिए जान दे देता था। स्टूडियो में लचर तकनीक के जरिये शॉट फिल्माए जाते थे।

उस दौर में भी अच्छी फिल्में बनती थीं, लेकिन फरहा को नाटकीयता से भरी फिल्में ज्यादा याद हैं। उसी दौर की जुगाली करते हुए उन्होंने अपनी ताजा फिल्म ‘ओम शांति ओम’ का तानाबाना बुना है। यह फिल्म उस दौर की एक कमजोर फिल्म जैसी लगती है।

फिल्म शुरू होती है 1977 से। ओमप्रकाश माखीजा (शाहरुख खान) एक जूनियर कलाकार है और मा‍खीजा जैसे सरनेम की वजह से हीरो नहीं बन पाता। उसकी माँ को विश्वास है कि वह एक न एक दिन जरूर फिल्मों में हीरो बनेगा। वह उस दौर की टॉप नायिका शांतिप्रिया (दीपिका पादुकोण) को मन ही मन चाहता है।

एक बार शूटिंग के दौरान वह आग से घिरी शांति को अपनी जान पर खेलकर बचाता है और वे दोस्त बन जाते हैं। एक दिन ओम चुपचाप शांति और एक फिल्म निर्माता मेहरा (अर्जुन रामपाल) की बात सुनता है। उसे पता चलता है कि शांति और मेहरा की शादी हो चुकी है और वह माँ बनने वाली है। शादी की बात उन दिनों छिपाकर रखी जाती थी, ताकि नायिका को काम मिलता रहे।

मेहरा बहुत महत्वाकांक्षी रहता है। वह एक धनवान स्टूडियो मालिक की बेटी से शादी करना चाहता है, ताकि वह स्टूडियो का मालिक बन सके। शांति को रास्ते से हटाने के लिए वह एक फिल्मी सेट पर शांति को बंद कर आग लगा देता है। ओम शांति को बचाने की कोशिश में खुद भी मारा जाता है।

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ओम अगला जन्म एक सुपर स्टार के घर में लेता है। फिल्म उद्योग में परिवारवाद बहुत चलता है और इसलिए ओम भी हीरो बन जाता है। नए जन्म में वह ओम कपूर (शाहरुख) के रूप में 2007 का एक बहुत बड़ा स्टार है।

एक बार शूटिंग के दौरान वह उसी फिल्म स्टूडियो में जाता है, जहाँ शांति को जलाकर मारा गया था। उसे पुराना घटनाक्रम याद आ जाता है। वह मेहरा से अपना बदला लेता है। शांतिप्रिया भी नया जन्म लेकर उसे मिल जाती है।

फिल्म की कहानी मनमोहन देसाई की फिल्मों जैसी लगती है और सुभाष घई की ‘कर्ज’ से भी बेहद प्रभावित है। इसे फरहा खान ने मजाकिया अंदाज में फिल्माया है। फरहा ने उस दौर की फिल्मों का और कलाकारों का मजाक उड़ाया है और अपनी फिल्म को भी उन्होंने उसी तरह फिल्माया है। फिल्म में मध्यांतर तक 1977 का दौर चलता है तब तक फिल्म अच्छी भी लगती है।

मध्यांतर के बाद कहानी 2007 में आ जाती है, लेकिन उसका ट्रीटमेंट 1977 वाला ही लगता है। फिल्म के नाम पर फरहा ने खूब छूट ली है और कई बातें पचती नहीं हैं। बेशक‍ फिल्म लार्जर देन लाइफ है, लेकिन लॉजिक को बहुत ज्यादा दरकिनार कर दिया गया है। मध्यांतर के बाद फिल्म का मूड गंभीर होना था, लेकिन इसे सतही तौर पर निपटा दिया गया है।

कहानी के साथ-साथ फिल्म का क्लाइमैक्स भी कमजोर है। शाहरुख जैसे सशक्त नायक को अपनी हीरोगीरी दिखाने का ज्यादा मौका नहीं दिया गया। फरहा ने जिस ‘टॉरगेट ऑडियंस’ के लिए यह फिल्म बनाई है, उन्हें यह बात जरूर अखरेगी।

फिल्म की कहानी के पहले हिस्से में शाहरुख का एकतरफा प्यार दिखाया गया है। शाहरुख और दीपिका के बीच प्यार की तीव्रता दिखाकर दोनों को मारा जाता तो फिल्म का प्रभाव और बढ़ता तथा दर्शकों की सहानुभूति भी दोनों के प्रति पैदा होती। साथ ही उनका दूसरा जन्म लेना भी सार्थक लगता।

फिल्म की कहानी की पृष्ठभूमि बॉलीवुड है, इसलिए इसके ज्यादातर मजाक भी उन लोगों को ज्यादा समझ में आएँगे जो बॉलीवुड को नजदीकी से जानते हैं। आम आदमी अधिकांश मजाकों को समझ नहीं पाएगा। लगता है कि‍ फिल्म बनाते समय फरहा ने अपने बॉलीवुड के दोस्तों का खयाल ज्यादा रखा है।

फरहा ने कुछ शॉट उम्दा फिल्माए हैं। दीपिका का ‘एंट्री सीन’। शाहरुख का दक्षिण भारतीय कलाकार बनकर फाइटिंग करना। अर्जुन रामपाल द्वारा स्टूडियो में आग लगाए जाने वाला दृश्य। फिल्म फेअर पुरस्कार समारोह में ‘नॉमिनेशन’ के लिए अभिषेक, शाहरुख और अक्षय वाले दृश्य सिनेमाघर में बैठे दर्शकों को रोमांचित कर देते हैं।

अभिनय में शाहरुख ने पूरी फिल्म का भार अपने ऊपर उठाया है। 2007 के ओम की तुलना में वे 1977 वाले ओम के रूप में ज्यादा अच्छे लगे हैं।

दीपिका में फूलों-सी ताजगी है। वे सुंदर होने के साथ प्रतिभाशाली भी हैं। अपनी पहली फिल्म में उन्होंने बड़े आत्मविश्वास के साथ अभिनय किया है।

हालाँकि उन्हें ज्यादा दृश्य नहीं मिले हैं। खलनायक के रूप में अर्जुन रामपाल अपना प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं। श्रेयस तलपदे, किरण खेर और जावेद खान ने भी अपने किरदार अच्छी तरह निभाए हैं।

एक ही गाने में बॉलीवुड के तमाम बड़े कलाकारों को लेकर शाहरुख और फरहा ने बॉलीवुड में अपने प्रभाव को दर्शाया है। विशाल-शेखर का संगीत बेहद उम्दा है और ‘दर्दे‍ डिस्को’ ‘ओम शांति ओम’ और ‘आँखों में तेरी’ लोकप्रिय हो चुके हैं।

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वी. मनिकानंद ने कैमरे के जरिये फिल्म को भव्यता प्रदान की है। संदीप चौटा का बैकग्राउंड संगीत बेहद सशक्त है और 70 के दशक को ध्यान में रखकर बनाया गया है। शिरीष कुंदर का संपादन अच्छा है, लेकिन शायद फरहा ने उन्हें फिल्म छोटी नहीं करने दी होगी। फिल्म पर जबरदस्त पैसा खर्च किया गया है और यह हर फ्रेम में नजर आता है।

कुल मिलाकर ‘ओम शांति ओम’ देखकर उतना मजा नहीं आता, जितनी अपेक्षाएँ लेकर दर्शक जाता है।