दिलीप कुमार : एक्टिंग स्कूल

दिलीप कुमार फिल्म जगत की एक अजीमुश्शान (महामान्य) हस्ती हैं। उन्हें अभिनय का पर्यायवाची माना जाता है। अपनी समस्त फिल्मों में उन्होंने दिल लगाकर काम किया और अनेक किरदारों में जीवंत प्रस्तु‍ति दी। आरंभिक अनेक फिल्मों में उन्होंने निराश प्रेमी की छवि को प्रस्तु‍त किया, इसलिए उन्हें ट्रेजेडी किंग कहा गया। 
 
दर्दभरी दास्तानों को दोहराते-दोहराते उनकी यह हालत हो गई थी कि दर्द उनके अंदर तक पहुँच गया था और वे संभ्रम की स्थिति में जाने लगे थे। निराशावदी मन:स्थिति से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने अपने करियर के आरंभिक वर्षों में ही लंदन के एक मनोचिकित्सक से संपर्क करके उपचार पूछा तो उन्हें सलाह दी गई कि ट्रेजेडी के साथ ही कॉमेडी फिल्में भी करते रहें।
 
मेला, शहीद, अंदाज, जोगन, दीदार, दाग, शिकस्त, देवदास उनकी ट्रेजिक फिल्में थीं। डॉक्टर की सलाह पर उन्होंने आजाद, कोहिनूर, आन, नया दौर फिल्मों में खिलंदड़ प्रेमी की भूमिकाएँ निभाईं। 'नया दौर' फिल्म का गीत 'उड़े जब-जब जुल्फें तेरी' युवा दिलीप कुमार का सटीक चित्रण है। दर्शकों का उनके प्रति दीवानगी का यही आलम था।
 
दाग और आन, देवदास और आजाद, मुगल-ए-आजम और कोहिनूर जैसी विपरीत स्वभाव वाली उनकी फिल्में आमने-सामने ही रिलीज हुई थीं। एक तरफ वे दर्शकों को पीड़ा की सुखानुभू‍ति देते, तो दूसरी तरफ लोगों का मनोरंजन करते। किसी भी नट की यह विवशता ही होती है। ‍अपने साथ वे नाटकीयता का एक तूफान लेकर आए थे। फिल्मों में उनके नए-नए रूप देखकर दर्शक दंग रह जाते थे। अभिनय के प्रति दिलीप कुमार का रवैया सदा पूर्णतावादी रहा। युवावस्था में वे फिल्मों के प्राणाधार होते थे तो अपने दूसरे दौर की प्रौढ़ भूमिकाओं में भी उन्होंने नवीनताएँ दीं। 
 
उन्होंने पूर्णता और श्रेष्ठता के लिए नए मानदंड स्थापित किए। उनके अभिनय में सौंदर्य शास्त्रीय आनंद था। वे अभिनय के हर शिक्षार्थी के लिए प्रेरणा और आदर्श हैं। हर अभिनेत्री उनके साथ काम करने के लिए लालायित रहती थी। 
 
राम और श्याम में उन्होंने डबल रोल किया और बैराग में तीन भूमिकाएँ की। बैराग (1976) के बाद उन्होंने पाँच साल का अवकाश मनाया और मनोज कुमार की 'क्रांति' (1981) से फिल्मों में उनकी वापसी हुई। दिलीप कुमार को अभिनय का मदरसा भी कहा गया। 
 
दिलीप कुमार की पहली फिल्म बॉम्बे टॉकिज की 'ज्वार भाटा' (1944) थी, जिसके मुख्‍य नायक आगा थे और दिलीप को दूसरे नायक का दर्जा दिया गया था। तीसरी‍ फिल्म 'मिलन' (1946) ने उन्हें सितारे की मान्यता दिला दी। यह फिल्म टैगोर की कहानी 'नौका डूबी' पर आधारित थी और इसका निर्देशन नितिन बोस ने किया था। इसमें दिलीप ने अपनी विशिष्ट और स्वाभाविक शैली में अभिनय किया। 
 
भारत-पाक विभाजन के वर्ष में दिलीप-नूरजहाँ की 'जुगनू' प्रदर्शित हुई। इस फिल्म में मलिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ ने मोहम्मद रफी के साथ एक गाना गाया था। 'यहाँ बदला वफा का बेवफाई के सिवा क्या है।'

1948 में दिलीप की फिल्मों की मानो झड़ी लग गई। इस साल उनकी आधा दर्जन फिल्में रिलीज हुईं, जिनमें से तीन फिल्मीस्तान की थीं - 'नदिया के पार', 'शहीद' और 'शबनम'। 'नदिया के पार' एक गाँव की दुखांत प्रेमकथा थी। 'शहीद' भी स्वतंत्रता-आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी दुखांत फिल्म थी। इसी प्रकार वाडिया की 'मेला' भी मंगेतर को खोने की कहानी थी। 
 
'शबनम' बेशक ट्रेजेडी फिल्म नहीं थी और दिलीप ने इसमें कामिनी कौशल के साथ खिलंदड़ प्रेमी की भूमिका निभाई थी। 'अनोखा प्यार' की विशेषता यह थी कि इसमें नरगिस और नलिनी जयवंत ने पहली बार दिलीप के साथ काम किया। 'घर की इज्जत' गोप और मनोरमा की चुहलबाजी से भरपूर फिल्म थी और दिलीप का इसमें नपा-तुला रोल था। 
 
अंदाज का अंदाजे बयाँ और
1949 में दिलीप की एकमात्र फिल्म 'अंदाज' प्रदर्शित हुई। मेहबूब की इस ट्रेंड-सेटर फिल्म में राज कपूर समानांतर नायक थे। इनकी नायिका थीं आधुनिका नरगिस। इसमें दिलीप ने असफल प्रेमी की भूमिका शिद्‍दत से निभाई थी। 'अंदाज' में नौशाद का संगीत था और मुकेश के चार स्वर्णिम गीत, जो आज भी लोकप्रिय हैं। 
 
दिलीप कुमार की कुल 15 फिल्मों में नौशाद का संगीत उन फिल्मों की अतिरिक्त विशेषता बन जाता और नौशाद के साथ नाम जुड़ा था- शायर शकील बदायूँनी का। 'अंदाज' ने दिलीप की ट्रेजेडी किंग उपाधि पर अंतिम मुहर लगा दी। 
 
1950 में प्रदर्शित तीन फिल्मों में से एक थी 'बाबुल'। इसमें भी नौशाद का संगीत और तलत मेहमूद का गायन था। दो अन्य फिल्में 'आरजू' और 'जोगन' थीं, जिनमें दिलीप ने भावना-प्रधान दृश्य सूक्ष्मता से पेश किए। 
 
'जोगन' का निर्देशन केदार शर्मा ने किया था और इसे उस जमाने की आर्ट फिल्म कहा जाता है, जिसने सिल्वर जुबली मनाई। यह दिलीप-नरगिस जोड़ी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म मानी जाती है। यह भी प्रेम और त्याग की ही कहानी थी। इस फिल्म को एक महीने की रिकॉर्ड अवधि में पूरा कर लिया गया। 'आरजू' ऐमिली ब्रोण्ट की 'विदरिंग हाइट्‍स' पर आधारित फिल्म थी। इसके नायक के पात्र से ‍‍दिलीप को बेहद लगाव था। इसकी पटकथा इस्मत चुगताई ने लिखी थी। 
 
1951 में 'दीदार' और 'हलचल' आई। 'दीदार' में दिलीप के साथ अशोक कुमार और नरगिस की भूमिकाएँ थीं। 'हलचल' के. आसिफ ने बनाई थी और बलराज साहनी भी इसमें थे। इस फिल्म से आसिफ से दिलीप के दोस्ताना ताल्लुकात बने, जिसकी वजह से 'मुगले-आजम' जैसी कालजयी कृति भारतीय सिने दर्शकों को प्राप्त हुई। 
 
1952 में दिलीप ने पहली बार मधुबाला के साथ काम किया और दोनों की मोहब्बत शुरू हुई- फिल्म थी 'तराना', जिसमें तलत मेहमूद ने बहुत मीठे गीत गाए थे। इसमें दिलीप ने आँखों के जरिये अभिनय का करिश्मा दिखाया था। 1952 की दो अन्य फिल्में हैं मेहबूब की 'आन' और 'दाग'। 
 
'दाग' का निर्देशन दिलीप के पहले डायरेक्टर अमिय चक्रवर्ती ने किया था। 'नशा मुक्ति' को लेकर बनी यह फिल्म बहुत सुलझे हुए कथानक पर आधारित थी और आज भी प्रासंगिक है। इसमें भी तलत का गायन था। इस फिल्म के लिए दिलीप कुमार को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पहला फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला।

'आन' भारत की पहली सोलह एमएम में शूट की गई रंगीन फिल्म थी और लंदन में प्रदर्शित की गई। इसकी कहानी भी 'शहीद' की तरह समसामयिक माहौल पर आधारित थी। इसमें दिलीप अत्याचारी राजा (प्रेमनाथ) का खात्मा करते हैं। नौशाद का संगीत और मोहम्मद रफी के गीत इसकी विशेषता थे।
 
इस फिल्म की इंदौर में लालबाग तथा नौलखा पुल पर शूटिंग की गई थी। 'मान मेरा अहसान, अरे नादान कि मैंने तुझसे किया है प्यार' इस फिल्म में दिलीप की दबंगता के अनुकूल गीत था। इसकी नायिका नादिरा थी और यह उनकी पहली फिल्म थी। इस फिल्म में मेहबूब नरगिस को लेना चाहते थे, लेकिन राज कपूर ने 'आवारा' की योजना को ध्यान में रखते हुए उन्हें नरगिस देने से इनकार कर दिया। बाद में वे 'मदर इंडिया' के लिए नरगिस को राज कपूर से 'अमानत' के रूप में लाए तो नरगिस सुनील दत्त से विवाह करके राज कपूर से बिछड़ गईं। 
 
1953 में 'संगदिल', 'फुटपाथ' और शिकस्त फिल्में आईं। इनमें 'शिकस्त' अपने समय से आगे की कहानी थी, जिसमें दिलीप को अपने बचपन की दोस्त नलिनी जयवंत से विवाह करने से रोक दिया जाता है और वह गाँव छोड़कर चला जाता है। सात साल बाद वह फिर से गाँव लौटता है तो नलिनी को एक बच्चे की विधवा माँ के रूप में पाता है। लेकिन दोनों समाज के बंधन तोड़ने का साहस नहीं कर पाते।' अभिनय के छात्रों के लिए यह फिल्म खासतौर पर दर्शनीय है। इसमें दिलीप ने एक समाजसेवी डॉक्टर की भूमिका को सजीव कर दिखाया। 
 
चार्लोट ब्रोण्ट के उपन्यास पर आधारित 'संगदिल' दिलीप-मधुबाला की रोमांटिक फिल्म थी, जिसमें अभिनेत्री शम्मी और कुलदीप कौर ने भी सहायक भूमिकाएँ निभाईं। 'फुटपाथ' में मीना कुमारी ने पहली बार दिलीप कुमार के साथ जोड़ी बनाई।
 
'अमर' दिलीप कुमार की मेहबूब खान के साथ तीसरी और अंतिम फिल्म थी, इसमें मधुबाला और निम्मी थीं और नौशाद का संगीत। 'इन्साफ का मंदिर है ये भगवान का घर है' 'मोहम्मद रफी का अमर गीत इसी फिल्म से है। 1954 में बनी इस फिल्म के साथ ही दिलीप कुमार की अभिनय-यात्रा का पहला दौर समाप्त हो गया।
 
1955 से दिलीप कुमार के अभिनय का दूसरा दौर शुरू हुआ, जब वे बिमल रॉय के संपर्क में आए। 'देवदास', 'आजाद', 'इंसानियत', और 'उड़न खटोला' इसी वर्ष प्रदर्शित हुईं। बिमल रॉय की 'देवदास' को शरत बाबू के उपन्यास का सर्वश्रेष्ठ फिल्मी रूपांतरण माना जाता है। 
 
'इंसानियत' फिल्म से दिलीप कुमार ने दक्षिण भारतीय फिल्मोद्‍योग की तरफ रुख किया। इस फिल्म की नायिका बीना रॉय थीं, जो बाद में प्रेमनाथ की पत्नी बनीं। एसएस वासन की इस फिल्म के द्वितीय नायक देव आनंद थे, जिन्होंने बाद में कभी दिलीप कुमार के साथ काम नहीं किया और न कभी पलटकर मद्रास गए। इस फिल्म के एक दृश्य में दिलीप कुमार के हाथों देव आनंद को एक चाँटा रसीद कराया गया था, जिसे देव के प्रशंसकों ने पसंद नहीं किया। 
 
नया दौर (1957), मधुमती (1958), यहूदी (1958), पैगाम (1959), मुगल-ए-आजम (1960), कोहिनूर (1960), गंगा-जमना (1961) ये सब दिलीप कुमार के उत्कर्ष काल की फिल्में हैं। 'नया दौर' में दिलीप ने मधुबाला की जगह वैजयंतीमाला को रिप्लेस किया।
 
'मुगल-ए-आजम' उनका चरमोत्कर्ष थी, जिसके लिए दिलीप-मधुबाला ने आपसी अनबन के बावजूद साथ में काम किया। 'गंगा-जमना' का निर्माण स्वयं दिलीप कुमार ने किया और इसके निर्देशक नितिन बोस थे। यह पूरबी (भाषा) में बनी पहली फिल्म थी और बाद में इसकी तर्ज पर 'भोजपुरी' फिल्मों के निर्माण का एक नया सिलसिला ही चल पड़ा।
 
'गंगा-जमना' की भाषा सीखने के लिए दिलीप कुमार ने पूर्वी उत्तरप्रदेश का गहन दौरा किया और वैजयंतीमाला को भी भाषा के सबक दिए। 'गंगा-जमना' को पास करने के लिए सेंसर बोर्ड ने आपत्ति की कि इसमें डाकुओं को महिमा मंडित किया गया है। इससे दिलीप कुमार बहुत दुःखी हुए। तब श्रीमती गाँधी की मदद से दिलीप ने पंडित नेहरू से मुलाकात की। दिलीप ने नेहरूजी से कहा कि सेंसर बोर्ड तो शेक्सपीयर के 'हेमलेट' और मीरा के भजन (तेरे अंग से अंग लगा के मैं भी हो गई काली) में भी खोट देखता है। इस मौके पर दिलीप ने सेंसर बोर्ड के फच्चरों के अनेक उदाहरण इकट्‍ठे करके उजागर किए थे। 
 
'गंगा-जमना' में दिलीप कुमार ने अपने अनुज नासिर खान को द्वितीय नायक की भूमिका दी थी। इसकी कहानी भी स्वयं दिलीप कुमार ने लिखी थी। बाद में फिल्मालय की 'लीडर' की कहानी भी दिलीप कुमार की थी। दिलीप कुमार की डायलॉग-डिलीवरी का अपना एक अलग अंदाज था। जिसका अनुसरण कई लोगों ने किया। कुछ लोगों को उनकी फुसफुसाने की शैली से शिकायत भी रही।

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