Holika 2026: क्या 2 मार्च को होगा होलिका दहन? जानिए सही तिथि और मुहूर्त

WD Feature Desk

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026 (14:49 IST)
When is Holi 2026: इस बार होलिका दहन की तारीखों को लेकर ज्योतिषाचार्यों में मतभेद स्पष्ट नजर आ रहा है। कुछ ज्योतिषियों का मानना है कि 02 मार्च को होलिका दहन करें और कुछ का मानना है कि 03 मार्च को करें। होलिका दहन 2 मार्च को करें या कि 3 मार्च को, चलिए जानते हैं सही तारीख।
 

क्यों है मतभेद?

तिथि: पूर्णिमा तिथि 02 मार्च को शाम 05:55 से प्रारंभ होकर 03 मार्च शाम 05:07 बजे समाप्त होगी।
भद्रा: 2 मार्च की शाम को 05:58 पर भद्रा प्रारंभ होगी और 3 मार्च को सुबह 05:28 समाप्त होगी।
भद्रा पुच्छ काल: 2 मार्च को रात 01:25 से 02:35 के बीच रहेगा।
चंद्र ग्रहण: 03 मार्च को दोपहर 03:21 पर चंद्र ग्रहण प्रारंभ होगा शाम 6:46 पर समाप्त होगा।
सूतक काल: 03 मार्च को सुबह 09:39 पर प्रारंभ होगा 6:46 पर पर समाप्त होगा।
 

2 मार्च को होलिका दहन करें या नहीं?

02 मार्च का समर्थन करने वाले कह रहे हैं कि पूर्णिमा तिथि में ही होलिका दहन होता है लेकिन भद्रा काल शाम 05:55 पर से प्रारंभ हो जाएगा जो अगले दिन अर्थात 03 मार्च को प्रात: 05:28 मिनट तक रहेगा। इस बीच पुच्छ काल अर्थात 2 मार्च को रात 01:25 से 02:35 के बीच होलिका दहन करके इसके बाद अगले दिन अर्थात 03 मार्च को रंगवाली होली मना सकते हैं या 04 मार्च को होली मनाएं, लेकिन कई ज्योतिषियों का मानना है कि भद्रा धरती लोक की है इसलिए इस दिन होलिका दहन नहीं करें अगले दिन चंद्र ग्रहण की समाप्ति के बाद करें।
 

03 मार्च को क्यों करें होलिका दहन?

02 मार्च को होलिका दहन रात्रि को पुच्छ काल में किया जा सकता था परंतु इस बार भद्रा का वास धरतीलोक पर है। इसलिए 2 मार्च को होलिका दहन नहीं करना ही उचित है। अगले दिन यानि 03 मार्च को सुबह से ही चंद्र ग्रहण का सूतक प्रारंभ हो जाएगा इसलिए इस दिन होली नहीं मनाना चाहिए।
 
तब क्या करें: 03 मार्च 2026 को चंद्र ग्रहण का काल और सूतक काल शाम 06:46 तक ही रहेगा। इसलिए सूतककाल के बाद दहन किया जाना शुभ है, क्योंकि इस काल में न तो भद्रा का और न ही चंद्र ग्रहण का साया रहेगा। 3 मार्च को पूर्णिमा तिथि 05 बजकर 07 मिनट पर समाप्त हो जाएगी लेकिन तब भी प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि रहेगी। ऐसे में होलिका दहन और पूजन करने में कोई हर्ज नहीं है। निर्णय सिंधु और धर्मसिंधु के अनुसार, यदि पहले दिन भद्रा का साया हो और दूसरे दिन पूर्णिमा प्रदोष काल से थोड़ा पहले समाप्त हो रही हो, तो भी दूसरे दिन भद्रा मुक्त समय को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। 
 

निष्कर्ष:

2 मार्च: पूर्णिमा की रात है और भद्रा पुच्छ का विकल्प है, लेकिन भद्रा का धरती पर वास होने के कारण जोखिम है और अगले दिन ग्रहण है।
03. मार्च: ग्रहण के बाद का समय पूर्णतः भद्रा-मुक्त और सूतक-मुक्त है। यह अधिक सुरक्षित और शास्त्रसम्मत विकल्प है।

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