Saint Surdas Jayanti: संत सूरदास कौन थे, जानें उनके जीवन की 5 अनसुनी बातें

वेबदुनिया धर्म-ज्योतिष टीम

सोमवार, 20 अप्रैल 2026 (10:57 IST)
unknown facts about Surdas: संत सूरदास हिंदी साहित्य के 'सूर्य' माने जाते हैं। वे भक्ति काल के एक ऐसे महान कवि थे जिन्होंने अपनी बंद आंखों से श्री कृष्ण के उस रूप का वर्णन किया, जिसे देख पाना खुली आंखों वाले विद्वानों के लिए भी संभव नहीं था। संत सूरदास का जन्म 1478 ई. में हुआ था।ALSO READ: लिंगायत समाज के संस्थापक बसवेश्वर महाराज के बारे में 6 रोचक बातें

उनके जन्म की याद में वैशाख शुक्ल पंचमी को सूरदास जयंती मनाई जाती है। यह वर्ष 2026 में सूरदास जयंती 21 अप्रैल, दिन मंगलवार को मनाई जा रही है। इस अवसर पर उनके भक्त भजन गाते तथा उनके पदों का पाठ करते हैं। साथ ही इस दिन भगवान श्री कृष्ण के मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
 
यहां उनके जीवन से जुड़ी 5 अनसुनी और महत्वपूर्ण बातें दी गई हैं:
 

1. दिव्य दृष्टि का प्रताप

कहा जाता है कि सूरदास जन्म से अंधे थे, लेकिन उनके काव्य में श्री कृष्ण की बाल-लीलाओं और प्रकृति का इतना सूक्ष्म और जीवंत वर्णन मिलता है कि कई विद्वान हैरान रह जाते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि जो व्यक्ति रंगों और चेष्टाओं का इतना सटीक वर्णन कर सके, वह जन्म से अंधा नहीं हो सकता। हालांकि, लोक मान्यताओं के अनुसार वे 'जन्मांध' ही थे और यह उनकी दिव्य दृष्टि का प्रताप था।
 

2. वल्लभाचार्य से मुलाकात और 'सूरसागर' की रचना

सूरदास पहले दीनता के पद गाया करते थे। जब उनकी मुलाकात महाप्रभु वल्लभाचार्य से हुई, तो उन्होंने सूरदास से कहा- 'सूर होकर ऐसो घिघियात काहे को हो, कछु भगवत्-लीला वर्णन करो।' इसके बाद ही सूरदास ने श्री कृष्ण की लीलाओं का गान शुरू किया और कालजयी ग्रंथ 'सूरसागर' की रचना की।
 

3. अष्टछाप के जहाज

सूरदास को 'पुष्टिमार्ग का जहाज' कहा जाता है। वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने कृष्ण भक्त कवियों का एक समूह बनाया था जिसे 'अष्टछाप' कहा जाता है। सूरदास इस समूह के सबसे प्रभावशाली और अग्रणी कवि थे।
 

4. अकबर से भेंट का प्रसंग

सूरदास की ख्याति इतनी फैली कि मुगल सम्राट अकबर भी उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। कहा जाता है कि तानसेन के माध्यम से अकबर की मुलाकात सूरदास से हुई थी। अकबर ने जब उनसे अपनी प्रशंसा में कुछ गाने को कहा, तो सूरदास ने स्पष्ट मना कर दिया और कहा कि उनके हृदय में केवल 'नंदनंदन' यानी कृष्ण का वास है।
 

5. मृत्यु के समय का अंतिम पद

सूरदास का निधन मथुरा के गोवर्धन के समीप पारसौली/पारसोली नामक ग्राम में हुआ था। अपनी मृत्यु के समय उन्होंने अपनी भक्ति को सिद्ध करते हुए एक प्रसिद्ध पद गाया था— 'खंजन नैन रूप रस माते', जो श्रीकृष्ण के चंचल और सुंदर नेत्रों का वर्णन करता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन श्री कृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया और अंत समय में भी वे पूर्णतः कृष्णमय थे।
 
संत सूरदास भारतीय भक्ति साहित्य के महान कवि और भक्त माने जाते हैं। वे जन्म से ही दृष्टिहीन थे, लेकिन उनके कवि हृदय और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम ने उन्हें भारतीय साहित्य और भक्ति आंदोलन में अमर बना दिया। उनकी रचनाएं मुख्य रूप से ब्रज भाषा में हैं और इनमें कृष्ण की लीलाओं का अद्वितीय वर्णन मिलता है।
 
अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: Vaishakh maas 2026: वैशाख मास प्रारंभ, जानें इस विशेष माह की 10 खास बातें

वेबदुनिया पर पढ़ें

सम्बंधित जानकारी