इंदौर में प्रस्तावित 6.50 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड रोड को लेकर अब तक कोई स्थिति साफ नहीं हो सकी है। इस परियोजना की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं। पहले यह परियोजना कई साल तक रूकी रही, फिर एक दिन अचानक इसका भूमि पूजन कर दिया गया। वहीं मूल और अनुमानित लागत में भी अंतर आ रहा है।
वेबदुनिया ने ट्रैफिक इंजीनियरिंग के विशेषज्ञ अतुल सेठ से इस बारे में चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह परियोजना लगातार लंबी और महंगी होती जा रही है। उन्होंने इसके तकनीकी पहलुओं पर भी चर्चा की। बता दें कि 11 मार्च को हाईकोर्ट में एलिवेटेड कॉरिडर को लेकर याचिका पर सुनवाई है। जिसमें राज्य सरकार को इंदौर विकास प्राधिकरण और पीडब्ल्यूडी को जवाब देना है।
ट्रैफिक एक्सपर्ट अतुल शेठ ने बताया कि साल 2019 में इस परियोजना की शुरूआत लगभग 6.50 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड रोड के रूप में हुई थी, जो शहर के आठ चौराहों को पार करता। उस समय इस परियोजना की जीएडी (General Arrangement Drawing) तैयार की गई और लगभग 250 करोड़ रुपए का टेंडर जारी हुआ। जीएडी किसी भी सरकारी निर्माण कार्य की मूल आत्मा मानी जाती है, क्योंकि उसी के आधार पर पूरा प्रोजेक्ट बनाया जाता है।
बाद में 3 अतिरिक्त भुजाएं जोड़ी : उन्होंने बताया कि लेकिन जब इस परियोजना की उपयोगिता पर सवाल उठे और बताया गया कि इसका वास्तविक उपयोग 2% से भी कम रहेगा, तब योजना में बदलाव करते हुए इसमें तीन अतिरिक्त भुजाएं जोड़ दी गईं—
एक शिवाजी वाटिका से एग्रीकल्चर कॉलेज की ओर।
दूसरी गीताभवन से मधुमिलन चौराहे की ओर।
तीसरी गीता चौराहे से साकेत की ओर।
पहले थमी परियोजना फिर हुआ भूमि पूजन : यह दावा किया गया कि इन बदलावों के बाद इस एलिवेटेड रोड की उपयोगिता 40% से अधिक हो जाएगी। हालांकि इस पर भी आपत्तियां उठीं और इसे अब भी अनुपयोगी बताया गया, जिसके चलते यह परियोजना लगभग 4–5 साल तक रुकी रही। फिर अचानक एक दिन इसका ऑनलाइन भूमिपूजन कर दिया गया।
कहा था— उपयोगी नहीं है एलिवेटेड पुल : इस परियोजना का पहली बार सर्वे हुआ और कुछ समय बाद फिर यह बात पुख्ता सामने आई कि यह एलिवेटेड पुल व्यावहारिक रूप से उपयोगी नहीं है, इसलिए घोषणा की गई कि इसे नहीं बनाया जाएगा और अलग-अलग चौराहों पर आवश्यकता अनुसार सुधार कार्य किए जाएंगे। इसके बाद फिर एक सर्वे हुआ और चरणबद्ध तरीके से चौराहों के विकास की योजना बनाई गई।
मूल और अनुमानित लागत में अंतर : लेकिन इसके कुछ समय बाद ही अचानक फिर से एलिवेटेड रोड बनाने की घोषणा कर दी गई। इस बार इसे दो भुजाओं और तीन रोटरी के साथ बनाया जा रहा है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 600 करोड़ रुपए बताई जा रही है, जबकि मूल परियोजना केवल 250 करोड़ रुपए की थी। इतना ही नहीं, इस परियोजना में शहर की लाइन शिफ्टिंग और अन्य कार्यों के लिए लगभग 200 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च भी अनुमानित है। यानी कुल लागत और भी बढ़ने की संभावना है।
सबसे गंभीर बात यह है कि मूल टेंडर की जीएडी को पूरी तरह अलग रखकर एक नया प्रोजेक्ट तैयार किया जा रहा है। इसके बावजूद शहर की जनता को स्थायी असुविधा और आर्थिक नुकसान झेलना पडेगा। इतिहास में शायद यह पहला ऐसा उदाहरण होगा, जहां एक परियोजना बार-बार बदलते निर्णयों के कारण लागत, आकार और विवाद तीनों में लगातार बढ़ती चली जा रही है।
Edited By: Naveen R Rangiyal