बाल एकांकी: नालंदा की सुनो कहानी

प्रभुदयाल श्रीवास्तव

सोमवार, 20 अप्रैल 2026 (17:09 IST)

पात्र- तीन बच्चे आयु- 13-14 वर्ष 

 
{मंच का पर्दा धीरे-धीरे खुल रहा है तभी मंच के पीछे से मध्यम लेकिन ओज पूर्ण स्वर में आवाज आ रही है}
 

नालंदा की सुनो कहानी, नालंदा की वाणी में।

अद्भुत गूढ़ रहस्य छुपा है, इसकी कथा कहानी में।

विस्मित कर देने वाला है, सच में ही मेरा इतिहास।

सुन लो बिल्कुल सत्य बात है, नहीं हास न ये परिहास-   

 
           पर्दा पूरा खुल जाता है {मंच पर पीछे स्क्रीन पर नालंदा के खंडहरों के दृश्य दिख रहे हैं}
 
{एक बालक और एक बालिका भारतीय वेश भूषा में, बालक कुरता और पायजामे में और बालिका साड़ी में दिखाई पड़ते हैं}
 
बालक -अरे ये कैसी आवाज है, किसकी आवाज़ है, कितनी मीठी और मधुर है यह आवाज़।कौन है यहां कृपा करके सामने आएं महाशय।
 
बालिका – पर भैया यहां! यहां तो कोई नहीं है।
 
बालक- लेकिन-लेकिन यह आवाज़, आवाज़ तो है न।
 
तभी {परदे की बगल से भिक्षु वेश में एक बालक प्रवेश करते हुए} हां-हां यह आवाज़ मेरी ही थी। मैं नालंदा हूं, नालंदा, मुझे नहीं जानते आप? आपका अतीत आपका गौरव आपका इतिहास, सब कुछ भूल गए क्या!
 
बालक, बालिका एक साथ -अरे नहीं नहीं, हम अपना इतिहास कैसे भूल सकते हैं, सुना है पढ़ा है लेकिन बात पुरानी है न इसलिए थोडा विस्मरण हो गया है।अच्छा है आप ने स्मरण करा दिया।आपको सादर प्रणाम।{दोनों प्रणाम करते हैं}
 
नालंदा -प्रसन्न रहो, देश के के दीपक बनो और देश दुनिया को आलोकित करो।
 
बालक -आदरणीय आप नालंदा हैं, प्राचीन और नामचीन विश्वविद्यालय, शिक्षा और ज्ञान का केंद्र, युद्ध कला, नीति शास्त्र, विज्ञान और ज्योतिष की शिक्षा देने वाला गुरु कुल हैं आप।ठीक कह रहा हूं न मैं ? हमें अपने बारे में कुछ अधिक बताएंगे तो हम आपके आभारी होंगे।
 
नालंदा -हां बच्चो बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप लोग।मैं नालंदा ही हूं अपना इतिहास अपनी भव्यता और अपनी शान ओ शौकत, सब अपने ह्रदय में समेटे हूं, अपने अतीत को स्मरण कर प्रसन्न होता रहता हूं, सब याद है मुझे हा- हा- हा -हा {हंसता है}
 
बालिका -अब पहेलियां मत बुझाओ नालंदा।अपने बारे में विस्तार से कहो।आपका जन्म आपकी जीवनी, इतने अद्भुत थे तो अचानक कहां विलीन हो गए, सब बताओ नालंदा, बिल्कुल सच।
 
नालंदा -हां-हां क्यों नहीं, क्यों नहीं, सब कुछ बताता हूं आप को .......
 
      मैं नालंदा मैं नालंदा, मैं था सूरज मैं था चंदा।
       बोला करती तूती जग में, मैं हिम गिरी था मैं था गंगा।
 
बालक -लो अब आप तो गाने लगे, जरा ढंग से बताओ तो समझ में आए।
 
नालंदा – अच्छा तो सुनो, बात उन दिनों की है जब पांचवीं सदी के भारत में मगध में, सम्राट कुमार गुप्त का शासन था।देश में बौद्ध धर्म चरम पर था।उसी समय मेरा निर्माण किया गया।जिसमें बौद्ध अध्ययन की सारी व्यवस्थाएं और सुविधाएं थी।तीन सौ कमरों वाला विशाल परिसर था मेरा जिसमें सात बड़े हाल और नौ मंजिल का विशाल पुस्तकालय था।
 
बालिका- {आश्चर्य से} इतना विशाल, इतना बड़ा परिसर! कैसे हो सकता है?
 
नालंदा- हां हां इतना ही बड़ा था ये परिसर, जिसमें, जिसमें दो हज़ार शिक्षक थे और दस हज़ार विद्यार्थी। भिक्षुक विद्वान, ज्ञानपिपासु यहां ज्ञान प्राप्ति की आशा में देश विदेशों से आते थे।
 
बालक -विदेशों से! कहां कहां से आते थे ?
 
नालंदा -कोरिया जापान, चीन, इंडोनेशिया, तिब्बत, ईरान, ग्रीस .....
 
बालिका अरे बस भी करो, क्यों कपोल कल्पित बातें करते हो। इतनी दूर से भला क्यों यहां पढने आएगा कोई।
 
नालंदा -क्यों आएगा हा -हा- हा- हा {जोर से हंसता है} अरे यह तो भारत वर्ष की साख थी भारत का ज्ञान था और प्रसिद्धी थी जिसकी दुनिया दीवानी थी।
 
बालक- ऐसा क्या था यहां जो दूरं देशों से लोग यहां आते थे।
 
नालंदा -यह पूछो कि क्या नहीं था सोने की चिड़िया कहलाने वाले इस देश में। सब कुछ था जो एक सुंदर सुसंस्कारित और सुव्यवस्थित देश के पास होना चाहिए।

 

ज्ञान ध्यान का केंद्र बड़ा यह, सारे जग को पाठ पढाया।

सत्य अहिंसा करुणा ममता, से सबको परिचित करवाया।

नहीं किसी से डरे दबे हम, ऊंचा रखा सदा ही झंडा।

मैं नालंदा मैं नालंदा .......

 
बालिका -अरे भाई नालंदा जी आप तो फिर गाने लगे। अब अधिक प्रतीक्षा न करवाएं और स्पष्ट बताएं कि।ऐसी क्या विशेषता थी आपमें, क्यों लोग आकर्षित होते थे हमारे देश की तरफ और आपकी तरफ।क्या पढाया जाता था, विद्यार्थी कहां रहते थे।शिक्षकों के निवास की क्या व्यवस्था थी कहां से पढ़ाने आते थे।कहां सोते थे?
 
नालंदा -अरे भाई बताता हूं, थोड़ी श्वांश तो लेने दो। {गहरी श्वांस लेता है} ...बहुत बड़ा परिसर था मेरा।सभी विद्यार्थी मेरे परिसर में निर्मित कमरों में रहते थे।बहुत कड़ा अनुशासन होता था।प्रवेश योग्यता के आधार पर ही होता था।
 
बालक-क्या पढ़ाई होती थी वहां, क्या विज्ञानं कथाएं, पंचतंत्र, सरित्सागर, हितोपदेश, महाभारत, रामायण, जातक कथाएं भी वहां पढ़ाते थे?
 
नालंदा-ज्ञान का भंडार था हमारे यहां, बड़े-बड़े विद्वान् और महान शिक्षक थे शिक्षा देने के लिए। शीलभद्र, धरमपाल, चंद्रपाल, गुनमति, स्थिरमति जैसे उद्भट विद्वान्न थे, सभी अपने -अपने विषय विशेषज्ञ।
 
बालिका -आश्चर्य, हमारे देश में इतना बड़ा विश्व विद्यालय और वह भी इतना प्राचीन! क्या विश्व विद्यालय में, कुलपति, कुलाधिपति होते थे? प्रशासन की क्या व्यवस्था थी, धन की आपूर्ति कैसे होती थी?
 
नालंदा -लो अब इतनी सी बात नहीं समझते। राजाओं और योग्य गुरुओं के रहते भला अर्थ की व्यवस्था करना कैसे कठिन हो सकता था।पहले तो गुप्त साम्राज्य के संरक्षण में सम्पूर्ण व्यवस्था होती थी, बाद में कन्नौज के राजा हर्षवर्धन ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया और मुझे अपने उत्कर्ष तक पहुंचाया।यहां महायान बौध धर्म का शिक्षा का केंद्र था लेकिन हीनयान के छात्र भी यहां पढ़ाई करते थे।।विशाल लायब्रेरी थी।रत्नोधि, रत्न सागर, रत्न रंजक इत्यादि इनके नाम थे।कुमार गुप्त के समय आचार्य सार दित्य यहां के प्रमुख थे।
 
बालक-लेकिन यह तो बताओ आपका निवास स्थान कहां है, मतलब आप कहां स्थित थे नालन्दा जी?
 
नालंदा-थे, आश्चर्य है, मैं अभी भी हूं, भले ही भग्नावस्था में हूं।मेरे अवशेष, मेरा अतीत, मेरी भव्यता, मेरी दिव्यता गवाही देने को अभी भी तत्पर है।पटना से पचासी किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व में राजगीर से साढ़े ग्यारह किलोमीटर उत्तर के एक गाँव में हूं।मुझे अलेक्सेंडर कनिघम ने खोजा था।
 
बालिका -खोजा था !क्या कह रहें आप, क्या आप खो गए थे कहीं?
 
नालंदा खोया तो नहीं था लेकिन विदेशी आक्रान्ताओं के हमलों, तलवार के जोर पर धर्म परिवर्तन का भय, भाग दौड़ की आपाधापी और अपनी जानमाल की रक्षा में रत लोगों का मेरी तरफ ध्यान ही नहीं रहा। वह तो एक भयंकर दौर था स्मरण आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं धर्मान्ध नबाबों सूबेदारों के अत्याचारों से त्रस्त जन मानस किसी भी तरह भागता रहा।अपनी बिरासत को संभालना भी असम्भ्व हो गया।वह तो अंग्रेज शासकों ने खोज बीन की तब जाकर मेरा पता लगा।
 
बालक- आपका इतिहास भी तो कहीं लिखा होगा, किसी किताब में शिलालेख में?
 

नालन्दा -हां हां क्यों नहीं।..... देश विदेशों से आ आकर शिष्य यहां शिक्षा लेते थे।

                    ज्ञान अलौकिक जो मिलता था, जन-जन में वितरित करते थे

                    रहे बहाते मुक्त हस्त से, सदियों सदी ज्ञान की गंगा

                    मैं नालंदा .....

 
भारतीय तो अपना इतिहास ठीक से संजोकर नहीं रख सके लेकिन चीनी यात्री ह्वेनसांग /इत्सिंग ने अपनी भारत यात्रा के विवरण में मेरी विस्तृत जानकारी दी है।ह्वेनसांग ने तो मेरे परिसर में रहकर शिक्षा गृहण की थी।बाद शिक्षक बनकर अध्यापन भी कराया।बौद्ध सारिपुत्र का जन्म भी यहीं पर हुआ था।
 
बालिका -आप तो बहुत अच्छा गाते हैं नालंदा, खैर आप यह बताओ, आपका परिसर कितना बड़ा था, बनावट कैसी थी?
 
नालंदा -मेरा परिसर स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना था।विशाल दीवार से घिरा था सारा परिसर।एक बड़ा प्रवेश द्वार था।उत्तर से दक्षिण तक मठों की कतार थी।सामने स्तूप मंदिर थे और मंदिरों में बुद्ध भगवान की मूर्तियाँ थीं।सात बड़े कक्षों में व्याख्यान होते थे।कमरों में सोने के लिए पत्थर की चौकियां थीं।पुस्तकें रखने के लिए आले थे।दीपकों को रखने के लिए भी अलग जगह थी।प्रत्येक मठके आंगन में कुआँ था।पानी की सुदृढ़ व्यवस्था थी आठ विशाल बड़े भवन थे।
 
बालक -लेकिन नालंदा इतना बड़ा विश्वविद्यालय इतने सारे विद्यार्थी, शिक्षक इनका प्रबंधन कैसे होता था? कार्य को सुचारू रूप से चलाने की क्या व्यवस्था थी?
 
नालंदा- यहां पर प्रत्येक कार्य पूर्ण व्यवस्थित ढंग से होता था, निष्पक्ष और बिना किसी भेद भाव के।यहां पढने वाले भिक्षु ही कुलपति और प्रमुख आचार्यों का चुनाव करते थे।कुलपति दो चुनाव परामर्श दात्री समितियों से परामर्श लेकर प्रशासन के कार्य संपन्न कराते थे।एक समिति के ऊपर शिक्षा पाठ्यक्रम का दायित्य था तो दूसरी समिति आर्थिक/वित्तीय और प्रशासनिक कार्य देखती थी।।इसके अतिरिक्त हमे दौ सौ गांव उपहार में प्राप्त हुए थे।उनमें उपलब्ध खेतों में उगाई जाने वाली फसल की आय से विश्वविद्यालय के आर्थिक प्रबंध होते थे।
 
बालक -वाह! भाई नालंदा जी, आश्चर्य किन्तु सत्य भी।इतना नामचीन, अद्भुत शिक्षा का केंद्र कैसे विलुप्त हो गया, इतिहास की गर्त में समा गया यह सच में ही समझ से परे है।
 
नालंदा -यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि धर्मों नस्लों और पंथों के संघर्ष ने बड़े-बड़े ज्ञान ध्यान के केन्द्रों और आस्था और उपासना स्थलों को मिटटी में मिलाकर नेस्नाबूद कर दिया।नालंदा भी उसी का शिकार हुआ।
 
बालक -कैसे नालंदा, कैसे, कैसे हुआ यह सब इतना घोर अत्याचार? देश के महान शासक कहां थे? कहां थे देश के वीर सेनानी, कहां थी देश भक्त प्रजा।राम और कृष्ण के देश की यह दुर्दश !
 
नालंदा -शासक भी थे और देश के वीर सेनानी और देश भक्त प्रजा भी यहीं थी लेकिन निजी स्वार्थ, सत्ता के टकराव और आपस की वैमनस्यता ने देश को तोड़कर रखा दिया।सत्ता की हवस अपने राज्य का विस्तार और धन की लालसा ने राजाओं जागीरदारों को अंधा कर दिया।विदेशी आक्रान्ता देश पर हमले करते रहे और हमारी आपसी फूट का लाभ उठाकर हमे, हमारी संस्कृति, हमारे बल को नष्ट करते रहे।
 
बालिका -लेकिन नालंदा जी आपको मतलब नालंदा विश्वविद्यालय को किसने नष्ट किया?
 
नालंदा -और कौन करेगा, विदेशी आक्रान्ताओं के अतिरिक्त।वैसे तो मेरे उदय के साथ ही शत्रुओं की दृष्टि हम पर पड़ चुकी थी।छोटे मोटे हमले होते रहे लेकिन हम अपना अस्तित्व बचाए रहे।किन्तु बारहवीं सदी में बख्तियार खिलजी नामक एक तुर्क सेनापति ने विश्वविद्यालय को आग के हवाले कर दिया।
 
बालिका -उफ़! लेकिन क्यों, क्यों किया उसने ऐसा, क्या गुनाह किया था विश्वविद्यालय ने?
 
नालंदा -गुनाह, गुनाह बस यही था कि बौद्ध शिक्षा का यह विशाल अद्भुत और अनोखा केंद्र मानवता के लिए समर्पित था।एक धर्म विशेष के अनुयायी यह नहीं चाहते थे।कोई भी शिक्षा का केंद्र उनके धर्म के अतिरिक्त किसी अन्य धर्म की शिक्षा दे, यह उन्हें स्वीकार नहीं था।इसलिए इसे आग के हवाले कर नष्ट कर दिया और हजारों बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला।
 
बालक -घोर अन्याय हुआ है हमारे संस्थानों पर, कितना अपमान कितनी हिंसा, अब क्या बचा है वहां अवशेष, खंडहर, मिटटी पत्थरों के ढेर, यादें सिर्फ यादें।
 
नालंदा -नहीं बच्चो नहीं, नालंदा आज भी जिन्दा है।सरकारी प्रयासों से इसे पुनर्जीवित किया गया है। पुराने खंडहरों से कुछ दूरी पर नए निर्माण किये गए हैं।जिसमें पर्याप्त मात्रा में भवनों की व्यवस्था की गई है ताकि अधिक से अधिक तादात में शिक्षक और छात्र बैठ सकें।
 
बालिका -नालंदा जी अभी वहां किस तरह की पढाई हो रही है।क्या पुराने विषय पढाये जा रहे है?
 
नालंदा -हां चूंकि विश्व विद्यालय प्राचीन का ही नया रूप है इसलिए प्राचीन विषय तो शामिल करना ही होंगे।लेकिन उतनी ही सीमा तक जितने हमें आज के सन्दर्भ में आवश्यक होंगे।ऐतिहासिक, पारिस्थितिक, पर्यावरण, बौद्ध दर्शन, धर्म, भाषा साहित्य, मानविकी, प्रबंधन, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध ये विषय विभिन्न क्षेत्रों में शामिल किये गए हैं।चीन थाईलेंड ऑस्ट्रेलिया लाओस जैसे देशों का सहयोग भी इस कार्य में किया गया है।
 

बालक और बालिका -वाह,वाह मजा आ गया कहानी सुनने में {दोनों गाते हैं}

         नालंदा अब भी जीवित है बसा हुआ है यादों में।

         हैं सुगंध अब भी कुछ बाकि, दृश्य झूमता आंखों में।

         जब तक चंदा तारे नभ में जब तक है धरती आकाश।

         नहीं मिटेगा नालंदा का दिव्य भव्य और अमर प्रकाश।

        अब तो नालंदा के नभ में लहराता है रोज तिरंगा।

नालंदा - { पास में आकर} मैं नालंदा मैं नालंदा, मैं हूं सूरज मैं हूं चंदा .............

 
         {फिर तीनों बच्चे थोड़ा आगे आकर आपस में हाथ मिलाकर ऊपर करते हैं और गाते हैं} 
 

          हम नालंदा हम नालंदा, हम ही हिम गिरी हम हैं गंगा -----

          हम हैं सूरज हम हैं चंदा, सांस- सांस में है नालंदा।

          हमें देश आगे ले जाना, चलना मिला- मिलाकर कन्धा।

          हम नालंदा हम ....................

     {धीरे-धीरे पर्दा बंद हो रहा है}

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