क्या वाराणसी में नरेंद्र मोदी को विपक्ष वाकई चुनौती दे रहा है?

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019 (11:07 IST)
लंबे इंतजार के बाद वाराणसी संसदीय सीट पर प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ उम्मीदवारों का संशय तो जरूर खत्म हो गया लेकिन अब ये और बड़ा सवाल बन गया है कि क्या विपक्ष वास्तव में नरेंद्र मोदी को चुनौती दे रहा है?
 
 
एक दिन पहले वाराणसी संसदीय सीट पर समाजवादी पार्टी ने शालिनी यादव को आनन-फानन में पार्टी का टिकट देकर ये स्पष्ट कर दिया कि इस सीट पर विपक्ष कोई साझा उम्मीदवार नहीं उतारेगा। अगले ही दिन कांग्रेस पार्टी ने इस आशंका को पूरी तरह से तो खारिज किया ही, ये भी साफ कर दिया कि प्रियंका गांधी वाराणसी में फिलहाल नरेंद्र मोदी को टक्कर नहीं देने जा रही हैं।
 
 
दरअसल, समाजवादी पार्टी ने बुधवार को जिस शालिनी यादव को गठबंधन का उम्मीदवार बनाया वो न सिर्फ दो दिन पहले तक कांग्रेस पार्टी में थीं और प्रियंका गांधी के साथ लगातार कांग्रेस का चुनाव प्रचार कर रही थीं बल्कि पुराने कांग्रेसी परिवार से ताल्लुक भी रखती हैं। शालिनी यादव कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे श्यामलाल यादव के बेटे अरुण यादव की पत्नी हैं।
 
 
शालिनी यादव ने पिछले साल वाराणसी में कांग्रेस के टिकट पर मेयर का चुनाव भी लड़ा था और करीब एक लाख वोट हासिल किए थे। बताया जा रहा है कि वो लोकसभा चुनाव वाराणसी से ही लड़ना चाहती थीं लेकिन जब वहां से प्रियंका गांधी की उम्मीदवारी की चर्चा होने लगी तो उन्होंने पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
 
 
वहीं कांग्रेस पार्टी ने अब उन्हीं अजय राय को दोबारा मैदान में उतारा है जो पिछले लोकसभा चुनाव यानी 2014 में नरेंद्र मोदी को टक्कर दे चुके हैं। अजय राय वाराणसी से कई बार विधायक रह चुके हैं लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में वो न सिर्फ तीसरे स्थान पर रहे थे बल्कि उनकी जमानत भी नहीं बच सकी थी। उस समय नरेंद्र मोदी के निकटतम प्रतिद्वंद्वी अरविंद केजरीवाल थे जिन्हें नरेंद्र मोदी ने करीब तीन लाख सत्तर हजार वोटों से हराया था।
 
 
उस चुनाव में अजय राय को महज पचहत्तर हजार वोट मिले थे। यही हाल चौथे और पांचवें स्थान पर रहने वाली बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों का भी था और दोनों के सम्मिलित वोट भी महज एक लाख के आस-पास थे।
 
 
भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पहली लिस्ट में ही नरेंद्र मोदी को वाराणसी से उम्मीदवार घोषित कर दिया था और तब ये चर्चाएं हो रही थीं कि विपक्ष शायद उनके खिलाफ साझा उम्मीदवार खड़ा करे, या फिर किसी पार्टी के मजबूत उम्मीदवार को अन्य दल समर्थन दें। ऐसे में भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर से लेकर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी तक का नाम जोर-शोर से चला, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
 
 
जहां तक गठबंधन और कांग्रेस के उम्मीदवारों का सवाल है तो इस बार भी यही कहा जा सकता है कि ये लोग ज्यादा से ज्यादा पिछली बार के अंतर को कुछ कम करने के लिए भले ही लड़ रहे हों, नरेंद्र मोदी को किसी तरह की चुनौती तो नहीं दिख रही है। जबकि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक साथ लड़ रहे हैं।
 
 
वाराणसी के ही रहने वाले पत्रकार अनुराग तिवारी कहते हैं, "वाराणसी में नरेंद्र मोदी का जो भी जादू 2014 में दिखा था, कमोवेश वो अभी भी बरकरार है। हां, कुछेक वर्ग में नाराजगी और बीजेपी के प्रति उदासीनता जरूर बढ़ी है लेकिन इतना भी नहीं कि उन्हें फिलहाल चुनाव हराया जा सके। हां, ये जरूर है कि यदि प्रियंका जैसी कोई बड़ी नेता चुनाव लड़तीं और दूसरे विपक्षी दल पूरा समर्थन करते, तब जरूर स्थिति लड़ाई वाली हो सकती थी। अब तो चुनौती जैसी कोई स्थिति नहीं दिख रही है।”
 
 
दरअसल, यदि प्रियंका गांधी वाराणसी से चुनाव लड़तीं, और समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी का उन्हें समर्थन मिलता तो वाराणसी सीट के जातीय समीकरण को देखते हुए ये कहा जा सकता था कि वो नरेंद्र मोदी को चुनौती बढ़िया दे सकती थीं। ऐसा इसलिए, क्योंकि माना जा रहा है कि प्रियंका की वजह न सिर्फ युवा मतदाता कांग्रेस की ओर आकर्षित होते बल्कि उस मतदाता समूह में भी सेंध लग सकती थी जो परंपरागत रूप से बीजेपी के समझे जाते हैं।
 
 
वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में सत्रह लाख मतदाता हैं जिनमें सबसे ज्यादा संख्या पिछड़े मतदाताओं की है जो करीब पांच लाख हैं। इसके बाद करीब तीन लाख मुस्लिम मतदाता, करीब ढाई लाख ब्राह्मण मतदाता, दो लाख वैश्य मतदाता, एक लाख राजपूत और करीब इतनी ही भूमिहार मतदाताओं की संख्या है। यहां दलित मतदाताओं की संख्या करीब एक लाख है।
 
 
जहां तक विपक्षी उम्मीदवारों का सवाल है तो गठबंधन के उम्मीदवार की पहचान भी अब तक कांग्रेसी ही रही है और कांग्रेस के अजय राय इससे पहले समाजवादी पार्टी से भी चुनाव लड़ चुके हैं। जहां तक बात अजय राय की है तो कई बार विधायक रहने और पिछली बार मोदी के मुकाबले खड़े होने के चलते वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में उनकी अच्छी खासी पहचान है लेकिन शालिनी यादव पुराने कांग्रेसी परिवार से आती जरूर हैं लेकिन राजनीति में महज उन्हें अभी कुछ साल ही हुए हैं और इसी दौरान उन्होंने पार्टी भी बदल ली।
 
 
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेंद्र यादव कहते हैं, "गठबंधन ने जो उम्मीदवार उतारा है उससे साफ पता चल रहा है कि वो मोदी की जीत को कितना ज्यादा आसान बना देना चाहते थे। यदि ऐसा ही था तो उम्मीदवार न ही उतारते। जहां तक मेरा मानना है, मोदी से मुकाबला अजय राय का ही होगा और कांग्रेस के अजय राय 2014 के मुकाबले कहीं अच्छा चुनाव लड़ेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि तब मुख्य प्रतिद्वंद्वी अरविंद केजरीवाल थे। गठबंधन ने दिखा दिया है कि वह चुनाव को लेकर गंभीर नहीं है। इतने कठिन उम्मीदवार के मुकाबले इतना हल्का उम्मीदवार।”
 
 
हालांकि समाजवादी पार्टी के नेता शालिनी यादव को न तो कमजोर उम्मीदवार मान रहे हैं और न ही ये मानने को तैयार हैं कि इससे पार्टी की गंभीरता पर कोई फर्क पड़ा है। समाजवादी पार्टी के नेता राजेंद्र चौधरी की मानें तो गठबंधन के उम्मीदवार के तौर पर शालिनी नरेंद्र मोदी को कड़ी टक्कर दे रही हैं और ‘पिछड़े-दलित, अल्पसंख्यक और समाज के अन्य सभी वर्गों के मतदाताओं के समर्थन से वो चुनाव जीत जाएंगी।' राजेंद्र चौधरी इसके पीछे ये भी तर्क देते हैं कि ‘वाराणसी की जनता ये जानती है कि मोदी सरकार ने पिछले पांच साल में क्या किया?'
 
 
वाराणसी लोकसभा क्षेत्र में पांच विधानसभा सीटें आती हैं जिनमें से वाराणसी उत्तर, वाराणसी दक्षिण और कैंट शहरी इलाके की हैं जबकि सेवापुरी और रोहनिया में ग्रामीण इलाके भी शामिल हैं। कभी कांग्रेस का गढ़ कही जाने वाली इस सीट पर 1991 से लेकर अब तक हुए सात लोकसभा चुनावों में बीजेपी को छह बार और कांग्रेस को एक बार जीत हासिल हुई है और इसी वजह से अब इसे बीजेपी के गढ़ के रूप में जाना जाने लगा है। साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने यहां से चुनाव लड़ने का फैसला किया था तब यही कहा गया था कि सबसे ‘सुरक्षित' सीट होने के अलावा इस सीट से मोदी पूर्वांचल की करीब 25 सीटों को तो प्रभावित करेंगे ही, बिहार तक इसका असर होगा।
 
 
साल 2004 में कांग्रेस उम्मीदवार राजेश कुमार मिश्र यहां से जीते थे जबकि 2009 में वो बीजेपी के मुरली मनोहर जोशी से हार गए थे। 2014 में नरेंद्र मोदी ने बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर यहां से जीत हासिल की। कांग्रेस और बीजेपी के अलावा यहां से सीपीएम, भारतीय लोकदल और जनता दल के उम्मीदवार भी एक-एक बार चुनाव जीत चुके हैं।
 
 
रिपोर्ट समीरात्मज मिश्र
 

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