मंगल महात्म्य : महाराष्ट्र के अमलनेर में मंगलदेव के साथ विराजित हैं विश्व की प्रथम भू माता प्रतिमा

नमस्ते स्नेहीजनों! मंगल ग्रह देवता संस्थान द्वारा विश्व के पहले 'भूमाता' और 'पंचमुखी हनुमान' मंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया है। देवताओं की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा हो चुकी है। इसी संदर्भ  में सभी को जानकारी देने का उद्देश्य है।
 
संपूर्ण भारतवर्ष का हिन्दू समाज हमारे देश की जमीन (भूभाग) को 'भारतमाता' का संबोधन करता है अर्थात जिस मिट्टी में हमारा जन्म हुआ है, जहां हम पले-बढ़े और जिस जगह हमें काम और भोजन मिलता है, उसी मिट्टी को 'माता' का संबोधन देना- यह हमारे सनातन धर्म का संस्कार है।
 
वेद, उपनिषद, पुराण और धर्मग्रंथ के संदर्भ-साक्षी से संपूर्ण पृथ्वी को 'भूमाता' का रूप-स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। मंगल ग्रह देवता संस्थान (अमलनेर, जि. जलगांव, महाराष्ट्र) ने इसी धारणा को मंदिर का मूर्तरूप देने का प्रयास किया है।
 
क्या है यह प्रयास? इस प्रश्न का जवाब स्पष्ट होना जरूरी है। हमारे वेद, उपनिषद, पुराणों में भूमाता का उल्लेख कई कथाओं में आता है। धरती देवी के लिए संस्कृत नाम 'पृथ्वी' है और उन्हें भूदेवी या देवी भूमि भी कहा जाता है। वे भगवान विष्णु भी पत्नी हैं। लक्ष्मी के 2 रूप माने जाते हैं- भूदेवी और श्रीदेवी। भूदेवी धरती की देवी हैं और श्रीदेवी स्वर्ग की देवी। पहली उर्वरा (उपजाऊ भूमि) से जुड़ी हैं व दूसरी महिमा व शक्ति से।
 
भूदेवी सोने और अन्न के रूप में वर्षा करती हैं। दूसरी शक्तियां, समृद्धि और पहचान देती हैं। भूदेवी सरल और सहयोगी पत्नी हैं, जो अपने पति विष्णु की सेवा करती हैं। विष्णु की पत्नी के रूप में पृथ्वी देवतास्वरूप थीं किंतु उसका रूप अत्यल्प था। पृथ्‍वी पर समुद्र का पानी भरा था। जमीन बहुत अल्प थी। अगर पृथ्वी पर जमीन या धरा को बढ़ाना है तो समुद्र  मंथन करना जरूरी है। यह विचार विष्णु ने सृष्टि के निर्माता ब्रह्मा से कहा। फिर देवता और असुर मिलकर समुद्र मंथन के लिए तैयार हुए। समुद्र मंथन के लिए मंदार पर्वत को मथनी और वासुकि नाग को रस्सा बनाया गया। समुद्र मंथन करने समय मंदार पर्वत को पानी में निचले आधार की जरूरत थी। फिर भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण किया  अर्थात इस कथा में लक्ष्मी के क्षीरसागर में खोज का भी उपकथानक है। उसके पश्चात समुद्र मंथन का निर्णय हुआ।
अन्य और कथानुसार समुद्र मंथन विषयी जानकारी उपलब्‍ध होती है। भूमाता के जन्म संबंधी और भी संदर्भ हैं, जैसे एक कथानुसार नगलागढू के ग्राम प्रधान गौरीशंकर के अनुसार ऋषि मार्कंडेयजी ने अपने संकल्प से धरती की रचना की। दूसरी कथानुसार गरुड़ी ने अंडा रखा था और वह गिरकर टूट गया। उसका एक भाग धरती बना और दूसरा आकाश। यह अंडा सोने का था और जल में से निकला था। पुराण कथानुसार मधु और कैटभ नामक दैत्यों के मेद से पृथ्वी उत्पन्न हुई। इसी कारण धरती को मेदिनी कहा जाता है। ब्रह्मा की सृष्टि होने के कारण धरती ब्रह्मा की बेटी है।
 
रामायण में माता सीता की उत्पत्ति भू माता से होने का संदर्भ मिलता है। चंद्र और मंगल ग्रह की उत्पत्ति भी भू माता से मानी जाती है। इस बात को खगोलशास्त्र भी मान्यता देता है। अब वास्तविकता के दर्पण में देखें तो भू माता का रूप अति विशाल हो जाता है। हम जिसे भारत माता कहते हैं वो वास्तव में पृथ्वी माता है। इसीलिए हम भू माता का संबोधन दे रहे हैं। 
 
भू माता का संबोधन देने का पश्चात प्रश्न यही था कि भू माता की प्रतिमा या मूर्ति का रूप-स्वरूप कैसा होगा? भारत माता की प्रतिमा या मूर्ति कलाकारों/ मूर्तिकारों ने रूप -स्वरूप निश्चित दिया है। किंतु भू माता की प्रतिमा के संदर्भ में वेद, पुराणों में संदर्भ नहीं मिलता है। यहां तक कि भारत माता की प्रतिमा का भी कहीं पर भी सुनिश्चित रूप-स्वरूप नहीं है। कहीं पर भारत माता की प्रतिमा चार भुजाओं वाली है। कहीं प्रतिमा के साथ सिंह है। किसी प्रतिमा की मात्र दो भुजाएं हैं। कहीं माता के हाथ में भगवा ध्वज है। कहीं त्रिशूल है। एक बात निश्चित रूप से समान मिलती है कि भू माता के पार्श्व में भारत भूमि का नक्षा अवश्य मिलता है। भारत माता प्रतिमा की यह अपनी स्वतंत्र पहचान है। रूप स्वरूप से भी ऊपर है हमारी भारत माता के प्रति सच्ची श्रद्धा, यही वजह है कि हर भारतीय हिन्दू के लिए भारत माता वंदनीय है। उनका अस्तित्व पवित्र है। 
 
भारत माता की प्रतिमा और भू माता की प्रतिमा के निश्चितीकरण में कुछ बातें धर्म पंडित तथा साधू संत के विचार और मार्गदर्शन के समावेश से तय होना जरूरी था। इस कार्य की जिम्मेदारी को अमलनेर स्थित वाडी संस्थान के प्रमुख संत श्रीमान प्रसाद महाराज जी ने मूर्त स्वरूप दिया। विष्णु के अवतार माने जाने वाले पंढरपुर स्थित भगवान विट्ठल तथा विठू  माऊली (यह भी माता का संबोधन है) के परम भक्त गण से चर्चा के बाद समुद्र मंथन का संदर्भ सामने आया। 
 
इस कथा का संदर्भ लेकर भू माता की मूर्ति का निर्माण कार्य किया गया है। भू-माता की मूर्ति में कछुए की पीठ पर पृथ्वी का गोल है और उस पर माता की प्रतिमा है।
इस प्रकार से विश्व की पहली भू माता प्रतिमा का निर्माण कार्य संपन्न हुआ है। 10 जनवरी 2021 को प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा की गई। इस मंग ल पावन अवसर पर विधिवत होम, हवन, मूर्ति स्थापना और महाप्रसाद का आयोजन भी किया गया। और अस तरह मंगल ग्रह देवता के निवास के सान्निध्य में भू माता भी निवास कर रही हैं। अमलनेर में पुत्र और माता के स्नेह मिलन की जीवंत और चैतन्य प्रतिमा के दर्शन करने और दर्शन से विलक्षण अनुभूति व आनंद प्राप्त करने के लिए सभी मंगलदेवता भक्त और स्नेहीजन आमंत्रित हैं। जय मंगल भवतु!!

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