मुद्दा सीबीआई विवाद का : आखिर विकल्प क्या था?

आलोक वर्मा की सीबीआई निदेशक पद पर बहाली के उच्चतम न्यायालय के आदेश के बाद साफ था कि सरकार पर तीखे राजनीतिक हमले होंगे और उनके खिलाफ कार्रवाई हुई तो उसे भी प्रश्नों के घेरे में लाया जाएगा इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय चयन समिति द्वारा वर्मा को पद से हटाने के बाद आ रही प्रतिक्रियाएं अनपेक्षित नहीं हैं। खासकर वर्मा के इस्तीफे के बाद तो हमला और तीखा होना ही था। 3 सदस्यों की समिति में कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे इसके पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि वर्मा को चयन समिति के सामने पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए।

 
समिति में प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश एवं विपक्ष के नेता होते हैं। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह कहते हुए अपने को समिति से अलग रखा कि मैंने ही फैसला दिया है तथा अपने प्रतिनिधि के रूप में न्यायमूर्ति एके सिकरी को भेजा। अगर न्यायमूर्ति सिकरी भी प्रधानमंत्री से सहमत थे तो मानना चाहिए कि वर्मा पर आरोप गंभीर हैं। न्यायमूर्ति सीकरी ने कहा कि वर्मा के खिलाफ जांच की जरूरत है। चयन समिति के वक्तव्य के अनुसार भ्रष्टाचार और अपने कर्तव्यों की उपेक्षा करने के आरोप में वर्मा को हटाया गया। कांग्रेस या विरोधी नेता जो भी कहें, लेकिन कोई भी सरकार होती तो फैसला यही होता।

 
वस्तुत: उच्चतम न्यायालय के फैसले की अतिवादी एकपक्षीय व्याख्या की गई। न्यायालय ने वर्मा को बहाल अवश्य किया लेकिन स्पष्ट कर दिया कि जब तक उच्चस्तरीय समिति उनके बारे में फैसला नहीं करती, वे नीतिगत निर्णय नहीं करेंगे, नई पहल भी नहीं करेंगे। चूंकि न्यायालय ने सरकार द्वारा तात्कालिक रूप से नियुक्त एल. नागेश्वर राव को भी कार्यकारी प्रमुख पद से हटाने का फैसला दे दिया था इसलिए माना गया कि केंद्र सरकार के सारे निर्णय को ही गलत माना गया है।

 
न्यायालय ने ऐसा कहा ही नहीं था। न्यायालय का कहना केवल इतना था कि किसी भी परिस्थिति में निदेशक को हटाने या नियुक्त करने की जो मान्य प्रक्रिया है, उनका पालन किया जाना चाहिए। जो स्थिति सीबीआई के अंदर पैदा हो गई थी, उसमें सरकार ने सीवीसी की सिफारिश पर यह कहते हुए आपस में लड़ रहे निदेशक वर्मा तथा विशेष निदेशक राकेश अस्थाना को छुट्टी पर भेज दिया था कि इनके बने रहते निष्पक्ष जांच संभव नहीं होगी। एक अभूतपूर्व अप्रिय स्थिति पैदा हुई थी।

 
निस्संदेह, सरकार को पहले ही हस्तक्षेप करना चाहिए था। जब स्थिति विकट हो गई तब उसने हस्तक्षेप किया और कदम उठाया। वर्मा के पक्ष में फली एस. नरीमन, कपिल सिब्बल, दुष्यंत दवे और राजीव धवन जैसे वकील तो थे ही, कॉमनकॉज की याचिका लेकर प्रशांत भूषण भी थे। तो यह नहीं कहा जा सकता कि उच्चतम न्यायालय में इनका पक्ष ठीक से नहीं रखा गया। प्रश्न तो यह भी है कि आखिर इतने बड़े वकील कैसे वर्मा के लिए आ गए? बावजूद इसके, न्यायालय ने फैसले में इतना ही कहा कि सरकार का फैसला संस्था के हित में होना चाहिए।

 
सच कहा जाए तो न्यायालय ने संस्था का सम्मान बनाए रखने के साथ सरकार की महिमा कायम रहे, इसका भी ध्यान रखा। न्यायालय ने यही कहा कि नियुक्ति, पद से हटाने और तबादले को लेकर नियम स्पष्ट हैं जिनका पालन होना चाहिए। इसका यह अर्थ तो था सरकार ने फैसला करते समय इसका पालन नहीं किया लेकिन इसका एक अर्थ यह भी था कि सरकार को फैसला करना है तो नियमों के अनुसार करे।
 
फैसले में साफ था कि वे कोई नीतिगत फैसला तब तक नहीं ले सकेंगे, जब तक कि उनके मामले पर समिति फैसला नहीं ले लेती। समिति नए सिरे से आलोक वर्मा के मामले को देखेगी। जब उच्चतम न्यायालय ने सब कुछ समिति पर छोड़ दिया था और इसमें बहुमत से फैसला हुआ है तो इस पर उठाए जा रहे प्रश्नों को राजनीति के सिवा कुछ नहीं कहा जा सकता है। मल्लिकार्जुन खड़गे तो कांग्रेस की नीति के अनुसार ही भूमिका निभाएंगे। वे कह रहे हैं कि उनको सीवीसी रिपोर्ट सहित सारे कागजात पढ़ने का पूरा मौका नहीं मिला। ध्यान रखिए कि फरवरी 2017 में आलोक वर्मा को सीबीआई का निदेशक बनाने का भी खड्गे ने विरोध किया था और अब हटाने का। उनको छुट्टी पर भेजे जाने के विरुद्ध खड़गे खड़े हुए थे और न्यायालय भी चले गए थे। इसके बाद आप खुद फैसला करिए कि इस भूमिका को कैसे देखा जाए?

 
वर्मा ने अपने इस्तीफे में जो भी कहा हो, सच यह है कि सीबीआई निदेशक पद पर बहाली को उन्होंने पूर्व के समान स्वयं को पूर्ण अधिकार प्राप्त निदेशक के रूप में लिया एवं उसी अनुसार फैसला करना आरंभ किया। दूसरे दिन ही वर्मा ने जांच एजेंसी के 5 बड़े अधिकारियों का स्थानांतरण कर दिया। इनमें 2 संयुक्त निदेशक, 2 उपमहानिरीक्षक और 1 सहायक निदेशक शामिल हैं। उन्होंने अंतरिम निदेशक एल. नागेश्वर राव के ज्यादातर स्थानांतरण आदेशों को रद्द कर दिया था।

 
राव ने वर्मा की टीम के 10 सीबीआई अधिकारियों के स्थानांतरण किए थे। वर्मा ने कुछ और निर्णय कर दिए। उन्होंने एसपी मोहित गुप्ता को राकेश अस्थाना के खिलाफ लगे आरोपों की जांच का जिम्मा सौंपा। इसके अलावा अनीश प्रसाद को डिप्टी डायरेक्टर (एडमिनिस्ट्रेशन) बनाए रखने और केआर चौरसिया को स्पेशल यूनिट-1 (सर्विलांस) की जिम्मेदारी सौंपी गई। ऐसा लगा जैसे वे इस बीच हुए सारे निर्णयों को पलटकर उस स्थिति में लाना चाहते हैं, जहां से वे छोड़कर गए थे।

 
वर्मा भूल गए कि उच्चतम न्यायालय ने नागेश्वर राव के बारे में भी कहा था कि केवल रूटीन का काम देखेंगे लेकिन बाद में उनके फैसले को सीलबंद लिफाफे में मांगकर देखा था तथा उस पर कोई विरोधी टिप्पणी नहीं की थी। इसका अर्थ हुआ कि न्यायालय ने राव के निर्णयों को गलत नहीं माना था। वर्मा को हटाने के निर्णय पर तूफान खड़ा करने की कोशिश में लगे लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उच्चतम न्यायालय ने सीवीसी की जांच की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एके पटनायक को नियुक्त किया था। उनकी देखरेख में हुई जांच में वर्मा के आचरण को संदेहों के घेरे में माना गया है। उसमें अपराध संहिता के तहत मामले चलाने की संभावना तक व्यक्त की गई है।

 
सीवीसी की रिपोर्ट में वर्मा पर 8 आरोप लगाए गए। सीवीसी ने कहा है कि मांस कारोबारी मोईन कुरैशी के मामले की जांच कर रही सीबीआई टीम हैदराबाद के कारोबारी सतीश बाबू सना को आरोपी बनाना चाहती थी लेकिन वर्मा ने मंजूरी नहीं दी। सीवीसी रिपोर्ट में रॉ द्वारा फोन पर पकड़ी गई बातचीत का भी जिक्र है। सना अस्थाना के खिलाफ दर्ज मामले में भी शिकायतकर्ता है। उसने बिचौलियों को दी गई रिश्वत के बारे में जानकारी दी थी। उसने रॉ के दूसरे शीर्ष अधिकारी सामंत गोयल के नाम पर भी जिक्र किया जिन पर बिचौलिये मनोज प्रसाद को बचाने का आरोप अस्थाना के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी में है।

 
सीबीआई द्वारा गुडगांव में भूमि अधिग्रहण के मामले में वर्मा द्वारा आरोपियों को बचाने का आरोप है। सीवीसी ने इस मामले में विस्तृत जांच की सिफारिश की थी। सीवीसी का यह भी कहना है कि वर्मा पूर्व केंद्रीय मंत्री लालू प्रसाद से जुड़े आईआरसीटीसी मामले में आरोपियों को बचाने का प्रयास कर रहे थे। ये सारे आरोप गहरे जांच की मांग करते हैं और सीबीआई को ही यह करना है। प्रश्न यह भी है कि अगर एक ही आरोप वर्मा एवं अस्थाना पर है और सीवीसी की जांच दोनों पर चल रही है तो एक व्यक्ति को कैसे पद पर बहाल किया जा सकता है और दूसरे को नहीं?

 
बहरहाल, मामले का एक बड़ा अध्याय यहां समाप्त हो गया, पर दोनों पर आरोपों की जांच चल रही है। सीबीआई इस सरकार के कार्यकाल में एक भी मामले को अंतिम परिणति में नहीं पहुंचा पाई। ऐसा लगता रहा है कि बड़े से बड़े मामलों को स्पर्श करके फिर फाइल को बंद करके रख दिया जाता था। क्यों? इसका जवाब मिलना चाहिए। बहरहाल, तत्काल यह मामला 2 अधिकारियों तथा उसके कुछ मातहतों के बीच अवश्य दिखा, लेकिन यह सीबीआई की साख, विश्वसनीयता तथा कार्यकुशला के व्यापक आयाम तक विस्तारित है। शीर्ष एजेंसी को इसकी कल्पना के अनुरूप भूमिका में लाने के लिए काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है।
 

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